सोने और चांदी की कीमतों में 17 अगस्त को तेजी रही। कमजोर अमेरिकी डॉलर और फेड की दरों को लेकर नरम उम्मीदों ने बुलियन को सहारा दिया। भू-राजनीतिक अनिश्चितता भी सुरक्षित निवेश की मांग बढ़ा रही है। आगे फेड मिनट्स, डॉलर और वैश्विक तनाव कीमतों की दिशा तय करेंगे।
Date: 17 अगस्त 2026
By Mohd Naved
सोने और चांदी की कीमतों में सोमवार को तेजी दर्ज हुई। अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्पॉट गोल्ड करीब 0.4 प्रतिशत बढ़कर 4,391.49 डॉलर प्रति औंस पहुंचा, जबकि चांदी करीब 1.4 प्रतिशत की बढ़त के साथ 65.57 डॉलर प्रति औंस पर पहुंची। बाजार में इस तेजी के पीछे कमजोर अमेरिकी डॉलर, अमेरिकी आर्थिक आंकड़ों और फेडरल रिजर्व की ब्याज दर नीति को लेकर बदलती उम्मीदें प्रमुख वजहों में शामिल हैं।
आईएएनएस की रिपोर्ट भी वैश्विक अनिश्चितता के बीच सोने और चांदी में तेजी की ओर इशारा करती है। ऐसे माहौल में बुलियन मार्केट की चाल केवल स्थानीय मांग से तय नहीं होती, बल्कि डॉलर, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, ब्याज दरों और भू-राजनीतिक जोखिम का भी सीधा असर पड़ता है। आईएएनएस रिपोर्ट
17 अगस्त के कारोबार में सोने को कमजोर अमेरिकी डॉलर से सहारा मिला। डॉलर इंडेक्स में करीब 0.2 प्रतिशत की गिरावट ने दूसरी मुद्राओं में सोने को अपेक्षाकृत सस्ता बनाया। इससे बुलियन की मांग को समर्थन मिला।
रॉयटर्स के मुताबिक अमेरिकी आर्थिक आंकड़ों ने सितंबर में फेडरल रिजर्व की ब्याज दर बढ़ोतरी की आशंका को भी कमजोर किया है। बाजार में सितंबर में दर बढ़ने की संभावना लगभग 30 प्रतिशत आंकी जा रही थी, जो एक महीने पहले करीब 47 प्रतिशत थी।
सोने पर ब्याज दरों का असर महत्वपूर्ण होता है। जब ब्याज दरों में बढ़ोतरी की उम्मीद घटती है, तब बिना ब्याज देने वाली संपत्ति के रूप में सोने का अवसरगत खर्च कम होता है। इससे निवेशकों के लिए बुलियन अधिक आकर्षक हो जाता है।
सोने की कीमत केवल महंगाई के डर से नहीं बढ़ती। इसमें कई वैश्विक कारक एक साथ काम करते हैं। डॉलर की दिशा, अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड, केंद्रीय बैंकों की खरीद, भू-राजनीतिक तनाव और निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता इसकी कीमत पर असर डालते हैं।
सोमवार की तेजी में अमेरिकी मौद्रिक नीति का पहलू खास रहा। फेडरल रिजर्व के कैलेंडर के मुताबिक जुलाई की बैठक के मिनट्स 19 अगस्त को जारी होने हैं। बाजार अब इन्हीं मिनट्स से आगे की दर नीति के संकेत तलाश रहा है।
2026 में कीमती धातुओं का बाजार पहले भी तेज उतार-चढ़ाव देख चुका है। जनवरी में बढ़ती भू-राजनीतिक और आर्थिक अनिश्चितता के बीच सोना रिकॉर्ड स्तरों के करीब पहुंचा था। रॉयटर्स ने उस दौर में सुरक्षित निवेश की मांग को तेजी की प्रमुख वजह बताया था।
इसके बाद बाजार में सुधार के दौर भी आए। जून में मजबूत डॉलर और फेड की अपेक्षाकृत सख्त नीति की आशंकाओं ने सोने पर दबाव डाला था। इससे साफ होता है कि बुलियन का रुझान एकतरफा नहीं है।
अब बाजार फिर से दरों में नरमी की संभावनाओं, डॉलर की कमजोरी और वैश्विक जोखिमों को साथ रखकर कीमतों का आकलन कर रहा है।
फेडरल रिजर्व की आगामी मिनट्स बाजार के लिए प्रमुख संकेतक हैं। निवेशक यह देखेंगे कि जुलाई की बैठक में अधिकारियों ने महंगाई, रोजगार और ब्याज दरों को लेकर किस तरह का आकलन किया था।
भारत में मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज यानी एमसीएक्स सोने और चांदी के वायदा कारोबार का प्रमुख मंच है। एमसीएक्स के मुताबिक सोना और चांदी ऐसे कमोडिटी अनुबंध हैं जिनकी कीमतों पर आर्थिक, महंगाई और भू-राजनीतिक घटनाक्रम असर डालते हैं।
इसका मतलब है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाला बदलाव भारतीय बुलियन बाजार तक पहुंचता है। रुपये की विनिमय दर इस प्रभाव को और बढ़ा या घटा सकती है।
17 अगस्त के अंतरराष्ट्रीय कारोबार में स्पॉट गोल्ड 0.4 प्रतिशत ऊपर था। चांदी ने उससे बेहतर प्रदर्शन किया और लगभग 1.4 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की। यह अंतर बताता है कि दोनों धातुओं की कीमत एक जैसे कारकों से प्रभावित होने के बावजूद उनकी बाजार संरचना अलग है।
चांदी में निवेश मांग के अलावा औद्योगिक मांग भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। एमसीएक्स खुद चांदी की कीमतों को औद्योगिक वृद्धि, वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों, महंगाई और भू-राजनीतिक घटनाओं से जोड़ता है।
सोने के मामले में केंद्रीय बैंक और निवेश मांग लंबे समय से महत्वपूर्ण आधार बने हुए हैं। मॉर्गन स्टैनली के अनुसार वैश्विक अनिश्चितता, कम वास्तविक ब्याज दरें और केंद्रीय बैंकों की खरीद सोने की मांग को समर्थन देने वाले प्रमुख कारक हैं।
अगर डॉलर में कमजोरी बनी रहती है और फेड की दर नीति नरम होती है, तो सोने और चांदी को आगे भी समर्थन मिल सकता है। इसके विपरीत डॉलर में तेज मजबूती या अमेरिकी यील्ड में उछाल बुलियन पर दबाव डाल सकता है।
भारत में इसका असर आयात लागत और घरेलू बुलियन कीमतों पर भी पड़ता है। रुपये में कमजोरी होने पर अंतरराष्ट्रीय कीमत स्थिर रहने के बावजूद भारत में सोना महंगा हो सकता है।
खरीदारों के लिए इसका अर्थ यह है कि अंतरराष्ट्रीय तेजी का सीधा मतलब घरेलू बाजार में उसी अनुपात की तेजी नहीं होता। कर, आयात लागत, रुपया और स्थानीय प्रीमियम भी अंतिम कीमत को प्रभावित करते हैं।
इस समय बुलियन बाजार के लिए सबसे अहम नीतिगत कारक अमेरिकी फेडरल रिजर्व है। 19 अगस्त को जारी होने वाले मिनट्स से बाजार को जुलाई की बैठक में अधिकारियों के रुख का अधिक स्पष्ट अंदाजा मिलेगा।
इसके अलावा पश्चिम एशिया में जारी तनाव और ऊर्जा बाजार की अस्थिरता वैश्विक मुद्रास्फीति की उम्मीदों को प्रभावित कर सकती है। ऐसे हालात में निवेशक सुरक्षित परिसंपत्तियों की ओर झुकाव बढ़ा सकते हैं।
भारत में सोना निवेश के साथ-साथ आभूषण बाजार से भी जुड़ा है। कीमतों में तेज वृद्धि से निवेशकों को फायदा दिख सकता है, लेकिन ऊंची कीमतें आभूषण खरीदने वालों पर दबाव डालती हैं।
चांदी का मामला थोड़ा अलग है। इसका इस्तेमाल निवेश के अलावा औद्योगिक क्षेत्रों में भी होता है। इसलिए इसकी कीमत पर आर्थिक गतिविधि और औद्योगिक मांग का असर सोने की तुलना में अधिक प्रत्यक्ष हो सकता है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना डॉलर में कारोबार करता है। इसलिए डॉलर की चाल वैश्विक बुलियन बाजार का एक केंद्रीय कारक बनी रहती है।
रॉयटर्स के अनुसार 17 अगस्त को डॉलर कमजोर हुआ और इससे सोने को समर्थन मिला। साथ ही बाजार सितंबर की अमेरिकी दर नीति को लेकर अधिक नरम उम्मीदें बना रहा है।
भारत जैसे बड़े सोना उपभोक्ता बाजार में इसका प्रभाव आयात, रुपये और घरेलू मांग के जरिए दिखाई देता है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि फेडरल रिजर्व सितंबर की बैठक के लिए किस दिशा में बढ़ेगा। दूसरा सवाल डॉलर की अगली चाल से जुड़ा है।
तीसरा सवाल भू-राजनीतिक तनाव का है। अगर वैश्विक जोखिम बढ़ते हैं, तो सुरक्षित निवेश की मांग और मजबूत हो सकती है। लेकिन तनाव कम होने और निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता बढ़ने पर बुलियन में मुनाफावसूली भी देखने को मिल सकती है।
चांदी के मामले में औद्योगिक मांग और निवेश मांग के बीच संतुलन आगे की दिशा के लिए महत्वपूर्ण रहेगा।
19 अगस्त को आने वाले फेड मिनट्स बाजार के लिए तत्काल प्रमुख ट्रिगर हैं। इसके बाद अमेरिकी महंगाई, रोजगार और डॉलर से जुड़े आंकड़े सोने-चांदी की दिशा पर असर डालेंगे।
भारतीय बाजार में निवेशकों को अंतरराष्ट्रीय कीमत के साथ रुपये की चाल और एमसीएक्स वायदा बाजार पर भी नजर रखनी होगी। केवल एक दिन की तेजी को लंबी अवधि के रुझान का संकेत मानना जोखिमपूर्ण होगा।
सोने-चांदी की मौजूदा तेजी के पीछे एक ही कारण नहीं है। कमजोर अमेरिकी डॉलर, अमेरिकी ब्याज दरों को लेकर बदलती उम्मीदें और वैश्विक अनिश्चितता ने मिलकर बुलियन को सहारा दिया है। 17 अगस्त के कारोबार में चांदी की तेजी सोने से अधिक रही।
आगे की दिशा फेडरल रिजर्व के संकेतों, डॉलर, अमेरिकी यील्ड और भू-राजनीतिक जोखिम पर निर्भर रहेगी। इसलिए मौजूदा तेजी को समझने के लिए केवल घरेलू भाव नहीं, बल्कि पूरे वैश्विक कमोडिटी बाजार का जायज़ा लेना जरूरी है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।