मंडी सांसद कंगना रनौत ने हिमाचल में आरएसएस से जुड़े स्कूलों की पैरवी की। उन्होंने भाजपा सरकार बनने पर ऐसी शैक्षणिक पहल शुरू करने की इच्छा जताई।
लोकेशन
मंडी, हिमाचल प्रदेश
Date
7/9/26
By
Mohd Naved
मंडी से भाजपा सांसद कंगना रनौत ने हिमाचल प्रदेश में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े स्कूलों और शैक्षणिक पहलों को बढ़ावा देने की पैरवी की है। उनका कहना है कि अगर राज्य में भाजपा की सरकार बनती है तो पश्चिम बंगाल में प्रस्तावित मॉडल की तर्ज पर हिमाचल में भी ऐसी योजनाएं शुरू की जानी चाहिए। कंगना का यह बयान राज्य की शिक्षा व्यवस्था में गैर-सरकारी और वैचारिक संगठनों की भूमिका को लेकर नई सियासी बहस को जन्म दे सकता है।
कहां और किस संदर्भ में दिया बयान
कंगना रनौत ने यह टिप्पणी मंडी में जिला विकास समन्वय एवं निगरानी समिति की बैठक की अध्यक्षता करने के बाद मीडिया से बातचीत के दौरान की। उन्होंने पश्चिम बंगाल में आरएसएस से जुड़े शिक्षा संगठन विद्या भारती के प्रस्तावित विस्तार का उल्लेख करते हुए कहा कि इसी तरह की पहल हिमाचल प्रदेश में भी शुरू होनी चाहिए।
कंगना ने इस पहल को अच्छा कदम बताया और कहा कि राज्य में भाजपा की सरकार बनने के बाद ऐसी योजनाओं को लागू करने की दिशा में काम होना चाहिए। उनका बयान किसी मौजूदा सरकारी योजना की घोषणा नहीं है, बल्कि भविष्य में सत्ता परिवर्तन की स्थिति में ऐसी पहल शुरू करने के उनके राजनीतिक समर्थन के तौर पर सामने आया है।
पश्चिम बंगाल का संदर्भ क्यों आया
कंगना का बयान पश्चिम बंगाल में विद्या भारती से जुड़े संस्थानों के विस्तार को लेकर सामने आए प्रस्ताव के बाद आया। रिपोर्टों के मुताबिक पश्चिम बंगाल में ऐसे संस्थानों की संख्या बढ़ाने की योजना पर चर्चा हुई है। इस प्रस्ताव को लेकर राज्य में राजनीतिक विरोध और शिक्षा के वैचारिकरण को लेकर सवाल भी उठे हैं।
इसी राजनीतिक संदर्भ को आधार बनाकर कंगना ने हिमाचल में भी ऐसी शैक्षणिक पहल दोहराने की इच्छा जाहिर की। उनके बयान का केंद्रीय बिंदु यह था कि ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों के विद्यार्थियों तक शिक्षा के अवसर पहुंचाने के लिए संघ से जुड़े शैक्षणिक प्रयासों को इस्तेमाल किया जा सकता है।
आरएसएस की शैक्षणिक भूमिका पर कंगना का नजरिया
कंगना ने आरएसएस को राष्ट्रीय गौरव का स्रोत बताते हुए उसके शैक्षणिक और सामाजिक कार्यों की सराहना की। उन्होंने दावा किया कि संगठन से जुड़े संस्थानों और कार्यक्रमों के जरिए विद्यार्थियों को आगे बढ़ने के अवसर मिलते हैं।
उन्होंने ग्रामीण और दुर्गम इलाकों में विद्यार्थियों के लिए शिक्षा से जुड़े कार्यक्रमों का भी उल्लेख किया। हालांकि, इन कार्यक्रमों को लेकर कंगना का बयान उनके राजनीतिक दृष्टिकोण को दर्शाता है। इसे हिमाचल प्रदेश सरकार की घोषित शिक्षा नीति या किसी स्वीकृत सरकारी योजना के रूप में पेश करना सही नहीं होगा।
यहीं से असल बहस शुरू होती है
हिमाचल में आरएसएस से जुड़े स्कूलों की चर्चा केवल स्कूल खोलने तक सीमित नहीं रहेगी। इसके साथ पाठ्यक्रम, प्रशासन, वित्तीय ढांचा, मान्यता, शिक्षक नियुक्ति और शिक्षा में वैचारिक निष्पक्षता जैसे सवाल भी जुड़ते हैं।
भारत में निजी और गैर-सरकारी संस्थाओं की शिक्षा के क्षेत्र में मौजूदगी पहले से है। लेकिन जब किसी संगठन की स्पष्ट वैचारिक पहचान हो और उसके शैक्षणिक नेटवर्क को सरकारी समर्थन या राज्य स्तर पर विस्तार देने की बात हो, तब पारदर्शिता और नियामकीय ढांचे पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
इसी वजह से हिमाचल में ऐसी किसी संभावित योजना पर चर्चा होने की स्थिति में यह देखना अहम होगा कि संस्थानों की मान्यता किस व्यवस्था के तहत होगी, पाठ्यक्रम कौन तय करेगा और सरकारी सहायता मिलने पर जवाबदेही किसकी होगी।
विपक्ष की आपत्ति और राजनीतिक विवाद
पश्चिम बंगाल में विद्या भारती संस्थानों के विस्तार के प्रस्ताव के बाद विपक्षी दलों ने शिक्षा के कथित भगवाकरण को लेकर सवाल उठाए हैं। आम आदमी पार्टी के दिल्ली प्रमुख सौरभ भारद्वाज ने भी इस तरह के प्रस्ताव की आलोचना करते हुए सवाल किया था कि सरकार और आरएसएस से जुड़े स्कूलों के बीच किस तरह का संबंध बनाया जाएगा।
कंगना ने इन आलोचनाओं का जवाब देते हुए तृणमूल कांग्रेस पर राजनीतिक लाभ के लिए देश में विभाजनकारी भावनाओं को बढ़ावा देने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि जो दल राष्ट्रीय हित को लेकर सवालों के घेरे में हैं, उनसे देशहित में काम करने की उम्मीद नहीं की जा सकती। ये आरोप कंगना के राजनीतिक बयान का हिस्सा हैं और इन्हें तथ्य के रूप में स्थापित आरोप नहीं माना जा सकता।
हिमाचल की शिक्षा व्यवस्था के सामने असली सवाल
हिमाचल प्रदेश में शिक्षा को लेकर ग्रामीण और दुर्गम क्षेत्रों की जरूरतें महत्वपूर्ण हैं। पहाड़ी भौगोलिक परिस्थितियों के कारण स्कूलों तक पहुंच, शिक्षक उपलब्धता और बुनियादी सुविधाएं लंबे समय से नीति-निर्माताओं के लिए अहम मुद्दे रहे हैं।
ऐसे में आरएसएस से जुड़े स्कूलों की प्रस्तावित भूमिका पर बहस केवल राजनीतिक विचारधारा के आधार पर नहीं होनी चाहिए। मूल सवाल यह रहेगा कि इससे विद्यार्थियों को क्या शैक्षणिक लाभ मिलेगा और क्या इससे सरकारी शिक्षा व्यवस्था की कमियां दूर होंगी।
अगर भविष्य में राज्य सरकार इस तरह की किसी योजना पर विचार करती है तो उसे स्पष्ट नीति, सार्वजनिक मानदंड और कानूनी प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ाना होगा। शिक्षा के क्षेत्र में किसी भी संस्थान की उपयोगिता का आकलन उसके परिणाम, पहुंच, गुणवत्ता और जवाबदेही के आधार पर किया जाना जरूरी होगा।
कंगना के बयान का राजनीतिक महत्व
कंगना रनौत मंडी लोकसभा सीट से भाजपा सांसद हैं। हिमाचल प्रदेश में मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधी प्रतिस्पर्धा से जुड़ा हुआ है। ऐसे में भाजपा सरकार बनने के बाद किसी विशेष संगठन से जुड़े स्कूलों को बढ़ावा देने की बात राजनीतिक संदेश भी रखती है।
कंगना ने फिलहाल किसी निश्चित संख्या में स्कूल खोलने, बजट आवंटित करने या समयसीमा की घोषणा नहीं की है। इसलिए उनके बयान को नीति की अंतिम घोषणा के बजाय राजनीतिक समर्थन और प्रस्ताव के रूप में देखना अधिक सटीक होगा।
आगे क्या होगा
अब निगाह इस बात पर रहेगी कि भाजपा का राज्य संगठन या पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व हिमाचल में आरएसएस से जुड़े स्कूलों को लेकर कोई औपचारिक नीति सामने रखता है या नहीं। इसी तरह राज्य सरकार और विपक्ष की प्रतिक्रिया भी इस मुद्दे को आगे राजनीतिक बहस का विषय बना सकती है।
अगर भविष्य में ऐसी योजना प्रस्तावित होती है तो उसके तहत स्कूलों की मान्यता, पाठ्यक्रम, शिक्षक नियुक्ति, वित्तीय सहायता और प्रशासनिक निगरानी से जुड़े नियम सार्वजनिक किए जाने की जरूरत होगी।
फिलहाल तथ्य इतना है कि कंगना रनौत ने हिमाचल में आरएसएस से जुड़े शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना का समर्थन किया है और भाजपा की सरकार बनने की स्थिति में ऐसी पहल शुरू करने की इच्छा जताई है। यह कोई लागू सरकारी योजना नहीं है। इसके आगे की दिशा राजनीतिक फैसले, सरकारी नीति और नियामकीय प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।