कृति सेनन के रक्षाबंधन विज्ञापन पर कंगना रनौत की टिप्पणी के बाद विवाद बढ़ा। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि अपनी बात रखने की आजादी के साथ असहमति और आलोचना का अधिकार भी मौजूद है।
नई दिल्ली, भारत | 27 अगस्त 2026 | शाह टाइम्स
By Mohd Haris
अभिनेत्री और भाजपा सांसद कंगना रनौत की अभिनेत्री कृति सेनन के रक्षाबंधन विज्ञापन पर की गई टिप्पणी अब सियासी बहस का हिस्सा बन गई है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कंगना के बयान का बचाव करते हुए कहा है कि अगर किसी व्यक्ति को अपनी पसंद के मुताबिक कपड़े पहनने और अपनी राय रखने की आजादी है, तो दूसरे व्यक्ति को उससे असहमति जताने और उसकी आलोचना करने का भी अधिकार है। रिजिजू ने यह टिप्पणी एक टीवी इंटरव्यू में की। उन्होंने अभिव्यक्ति की आजादी को एकतरफा अधिकार मानने से इनकार किया और कहा कि अपनी बात कहने की स्वतंत्रता के साथ दूसरे पक्ष की असहमति भी उसी स्वतंत्रता का हिस्सा है।
क्या है पूरा विवाद
विवाद एक ज्वेलरी ब्रांड के रक्षाबंधन विज्ञापन से शुरू हुआ। विज्ञापन में कृति सेनन इंडो-वेस्टर्न परिधान में नजर आई थीं। उनके पहनावे में ब्रालेट-स्टाइल ब्लाउज, केप और ड्रेप्ड स्कर्ट शामिल थे। विज्ञापन के एक दृश्य में राखी बांधने का प्रसंग भी दिखाया गया था। इस प्रस्तुति पर सोशल मीडिया पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कुछ लोगों ने इसे पारंपरिक त्योहार की गरिमा और सांस्कृतिक प्रतीकों के अनुरूप नहीं माना। इसी बहस के बीच कंगना रनौत ने विज्ञापन पर तीखी टिप्पणी की और सवाल उठाया कि रक्षाबंधन जैसे त्योहार के मौके पर इस तरह के पहनावे का इस्तेमाल क्यों किया गया। कंगना की टिप्पणी के बाद बहस केवल विज्ञापन तक सीमित नहीं रही। सोशल मीडिया पर एक तरफ सांस्कृतिक परंपराओं और विज्ञापनों में उनके चित्रण को लेकर सवाल उठे, तो दूसरी तरफ महिलाओं के पहनावे और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को लेकर कंगना की टिप्पणी की आलोचना भी हुई।
कृति सेनन ने दिया जवाब
कृति सेनन ने विवाद पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि त्योहारों का सार कपड़ों से ज्यादा भावनाओं और परंपराओं में होता है। उन्होंने इस बहस को महिलाओं के पहनावे पर समाज की लगातार टिप्पणी से भी जोड़ा। कृति का तर्क था कि किसी महिला के पहनावे को उसकी संस्कृति या परंपरा के प्रति सम्मान का पैमाना नहीं बनाया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि उनके लिए रक्षाबंधन का महत्व पारिवारिक भावनाओं और रिश्तों से जुड़ा है।
उनकी प्रतिक्रिया के बाद विवाद और तेज हो गया। सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने कृति के समर्थन में व्यक्तिगत स्वतंत्रता का पक्ष रखा, जबकि आलोचकों ने कहा कि विज्ञापन में किसी त्योहार को प्रस्तुत करते समय सांस्कृतिक संदर्भ और दर्शकों की संवेदनशीलता का ध्यान रखना चाहिए।
रिजिजू ने किस बात का बचाव किया
केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू से जब कंगना की टिप्पणी को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने कंगना को निशाना बनाए जाने पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि अगर किसी व्यक्ति को अपनी पसंद के मुताबिक अभिव्यक्ति की आजादी हासिल है, तो दूसरे व्यक्ति को उससे असहमति जताने या उसका विरोध करने से रोका नहीं जाना चाहिए। रिजिजू ने मूल बहस को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में रखा। उनके मुताबिक किसी कलाकार को अपनी पसंद के कपड़े पहनने की स्वतंत्रता और उस चुनाव की सार्वजनिक आलोचना, दोनों लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा हैं। यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि आलोचना का अधिकार किसी टिप्पणी को स्वतः सही या गलत साबित नहीं करता। यह केवल यह बताता है कि सार्वजनिक विमर्श में किसी व्यक्ति की राय के जवाब में असहमति दर्ज करने की भी गुंजाइश रहती है।
कंगना के निजी बयान पर भी सफाई
इंटरव्यू के दौरान रिजिजू से यह भी पूछा गया कि क्या भाजपा नेताओं को सार्वजनिक बयानों में ज्यादा संयम बरतना चाहिए। इस पर उन्होंने कहा कि संसदीय कार्य मंत्री के तौर पर वह सांसदों को संसद की कार्यवाही और प्रक्रियाओं के बारे में मार्गदर्शन दे सकते हैं। संसद के बाहर कोई सांसद क्या बयान देता है, इस पर वह उसी तरह नियंत्रण नहीं रखते। उन्होंने कंगना के संसद से बाहर दिए गए बयान को उनका निजी विचार बताया। इसका मतलब यह है कि रिजिजू ने कंगना की टिप्पणी का राजनीतिक समर्थन घोषित करने के बजाय उनके अभिव्यक्ति के अधिकार का बचाव किया।
इस बयान की अहमियत इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि कंगना भाजपा की सांसद हैं और उनके सार्वजनिक बयानों को अक्सर राजनीतिक नजरिये से भी देखा जाता है।
त्योहार और विज्ञापन की बहस
इस पूरे विवाद ने विज्ञापन में धार्मिक और सांस्कृतिक प्रतीकों के इस्तेमाल पर भी सवाल खड़े किए हैं। भारत में त्योहारों से जुड़े विज्ञापन अक्सर भावनात्मक और पारिवारिक छवियों पर आधारित होते हैं। ऐसे में किसी अभियान में आधुनिक फैशन और पारंपरिक प्रतीकों का मेल दर्शकों के बीच अलग-अलग प्रतिक्रियाएं पैदा कर सकता है। रक्षाबंधन भाई-बहन के रिश्ते से जुड़ा त्योहार है। इसलिए विज्ञापन में इसके प्रतीकों और दृश्यों की प्रस्तुति को लेकर दर्शकों की अपेक्षाएं भी अलग हो सकती हैं। दूसरी तरफ विज्ञापन और मनोरंजन उद्योग में कलाकारों की पोशाक को व्यक्तिगत अभिव्यक्ति और रचनात्मक प्रस्तुति का हिस्सा माना जाता है। यही अंतर इस विवाद का केंद्रीय बिंदु बन गया है। एक पक्ष सांस्कृतिक संवेदनशीलता को प्राथमिकता दे रहा है, जबकि दूसरा व्यक्तिगत स्वतंत्रता और महिलाओं के पहनावे पर बाहरी टिप्पणी के खिलाफ तर्क दे रहा है।
ब्रांड ने क्या किया
विवाद बढ़ने के बाद संबंधित ज्वेलरी ब्रांड ने विज्ञापन वापस ले लिया। ब्रांड ने अपने फैसले को भारतीय संस्कृति, परंपराओं और त्योहारों के प्रति सम्मान से जोड़ा। विज्ञापन हटाए जाने से यह स्पष्ट हुआ कि विवाद का असर केवल कलाकारों और सोशल मीडिया बहस तक सीमित नहीं रहा। ब्रांड के लिए भी सार्वजनिक प्रतिक्रिया और सांस्कृतिक संवेदनशीलता कारोबारी निर्णय का हिस्सा बन गई। हालांकि विज्ञापन हटाने का फैसला अपने आप में यह साबित नहीं करता कि आलोचना में उठाए गए सभी आरोप सही थे। यह ब्रांड का अपना निर्णय था, जिसे उसने सांस्कृतिक सम्मान के संदर्भ में समझाया।
कंगना ने बाद में क्या कहा
कंगना रनौत ने बाद में अपने रुख की व्याख्या करते हुए कहा कि उनकी आलोचना व्यक्तिगत तौर पर कृति सेनन के खिलाफ नहीं थी। उन्होंने इसे त्योहारों के व्यापक सांस्कृतिक संदर्भ से जोड़ा और कहा कि त्योहारों को केवल बाहरी सौंदर्य या विज्ञापन की प्रस्तुति तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। इस स्पष्टीकरण के बाद बहस का फोकस पहनावे से आगे बढ़कर त्योहारों की सार्वजनिक प्रस्तुति, विज्ञापन की जिम्मेदारी और सांस्कृतिक प्रतीकों के इस्तेमाल तक पहुंच गया।
सियासी रंग क्यों आया
विवाद में किरेन रिजिजू के शामिल होने से इसे राजनीतिक आयाम भी मिला है। कंगना भाजपा सांसद हैं और रिजिजू केंद्र सरकार में मंत्री हैं। हालांकि रिजिजू ने कंगना के बयान को पार्टी की आधिकारिक स्थिति के तौर पर पेश नहीं किया। उन्होंने संसद के बाहर कंगना की टिप्पणियों को उनका निजी विचार बताया। इसलिए इस मामले में दो अलग पहलुओं को अलग रखना जरूरी है। पहला, कंगना और कृति के बीच विज्ञापन और पहनावे को लेकर सार्वजनिक बहस। दूसरा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर रिजिजू की टिप्पणी।
आलोचना और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन
यह विवाद एक व्यापक सवाल भी सामने लाता है कि सार्वजनिक जीवन में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक-सांस्कृतिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन कैसे कायम किया जाए। किसी कलाकार को अपने पहनावे का चुनाव करने की स्वतंत्रता है। उसी तरह दर्शकों को किसी विज्ञापन या सार्वजनिक प्रस्तुति पर अपनी राय रखने का अधिकार है। लेकिन आलोचना और व्यक्तिगत अपमान के बीच फर्क बनाए रखना भी सार्वजनिक संवाद की बुनियादी जरूरत है। सोशल मीडिया ने इस तरह के विवादों को तेजी से व्यापक बना दिया है। किसी विज्ञापन पर कुछ घंटों में हजारों प्रतिक्रियाएं आने के बाद ब्रांड के लिए भी प्रतिक्रिया देना और अपनी रणनीति बदलना आसान या कठिन दोनों हो सकता है।
अब आगे क्या
फिलहाल इस विवाद का केंद्र कृति सेनन का विज्ञापन नहीं, बल्कि उससे जुड़े अलग-अलग नज़रिये बन चुके हैं। कंगना ने सांस्कृतिक संदर्भ पर सवाल उठाया, कृति ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और महिलाओं के पहनावे पर बहस को सामने रखा, जबकि रिजिजू ने असहमति और आलोचना के अधिकार को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़ा है। इस पूरे प्रकरण से एक बात साफ है कि त्योहारों से जुड़े व्यावसायिक विज्ञापनों में रचनात्मक स्वतंत्रता के साथ सांस्कृतिक संवेदनशीलता भी महत्वपूर्ण मुद्दा बनी हुई है। साथ ही, सार्वजनिक बहस में असहमति दर्ज करने का अधिकार और व्यक्तिगत गरिमा, दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है। फिलहाल विज्ञापन वापस लिया जा चुका है और विवाद पर अलग-अलग पक्ष अपनी बात रख रहे हैं। आने वाले दिनों में यह बहस इस सवाल पर केंद्रित रह सकती है कि भारतीय त्योहारों की आधुनिक विज्ञापन प्रस्तुति में परंपरा, व्यक्तिगत पसंद और कारोबारी रचनात्मकता के बीच सही संतुलन आखिर कैसे तय किया जाए।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।