हिरोशिमा में 81वीं परमाणु बरसी पर मेयर ने nuclear deterrence की आलोचना की। वैश्विक तनाव और हथियारों की दौड़ के बीच यह संदेश दुनिया के लिए चेतावनी है कि शांति और disarmament अभी भी अधूरी चुनौती है।
📍 हिरोशिमा, जापान
📰 6 अगस्त 2026
✍️ By Mohd Haris
यह समारोह हर साल की तरह पीस मेमोरियल पार्क में हुआ, जहां हजारों लोग, survivors और अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधि शामिल हुए। इस बार करीब 120 देशों की मौजूदगी ने इसे वैश्विक महत्व का मंच बना दिया।
6 अगस्त 1945 को अमेरिका ने “लिटिल बॉय” नाम का परमाणु बम हिरोशिमा पर गिराया था।
इस हमले में तत्काल करीब 70-80 हजार लोगों की मौत हुई, जबकि साल के अंत तक यह संख्या लाखों तक पहुंच गई।
कुछ ही दिनों बाद नागासाकी पर दूसरा बम गिराया गया, जिसने द्वितीय विश्व युद्ध का अंत तय किया।
इस साल के भाषण में मेयर मात्सुई ने nuclear deterrence की नीति को खतरनाक बताया।
उनका कहना था कि देश अपने सुरक्षा तर्क के लिए nuclear हथियारों को सही ठहराते हैं, लेकिन यही सोच भविष्य में बड़े विनाश का कारण बन सकती है।
उन्होंने चेताया कि अगर यही रुख जारी रहा तो हिरोशिमा जैसी त्रासदी दोहराई जा सकती है।
यह संदेश ऐसे समय आया है जब दुनिया में geopolitical तनाव बढ़ रहा है।
चीन, उत्तर कोरिया और पश्चिमी देशों के बीच हथियारों की होड़ तेज हो रही है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर nuclear arsenals फिर से बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं और arms control frameworks कमजोर पड़ रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र ने भी इस मौके पर चेतावनी दी कि दुनिया फिर nuclear जोखिम की तरफ बढ़ रही है।
यूएन का कहना है कि भरोसे की कमी और बढ़ती प्रतिस्पर्धा global security architecture को कमजोर कर रही है।
जापान की स्थिति इस पूरे मुद्दे में जटिल है।
एक तरफ वह nuclear हमले का शिकार देश है, दूसरी तरफ वह अमेरिका की nuclear सुरक्षा umbrella पर निर्भर है।
हाल के संकेत बताते हैं कि जापान अपने non-nuclear सिद्धांतों में कुछ लचीलापन लाने पर विचार कर रहा है।
यह कदम घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों स्तर पर विवाद पैदा कर सकता है।
हिरोशिमा के बचे हुए लोग, जिन्हें “हिबाकुशा” कहा जाता है, लगातार यह चेतावनी देते रहे हैं कि दुनिया इतिहास से सबक नहीं ले रही।
उनकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि उनकी संख्या तेजी से घट रही है और उनके अनुभव धीरे-धीरे खत्म हो रहे हैं।
एक पक्ष मानता है कि nuclear deterrence ने बड़े युद्धों को रोका है और यह सुरक्षा का जरूरी साधन है।
दूसरा पक्ष कहता है कि यह नीति सिर्फ डर और अनिश्चितता पर आधारित है, जो किसी भी समय विनाश का कारण बन सकती है।
हिरोशिमा का संदेश साफ तौर पर दूसरे दृष्टिकोण को मजबूती देता है।
deterrence समर्थक देशों का तर्क है कि nuclear balance ने विश्व युद्ध को रोका।
लेकिन आलोचक कहते हैं कि accidental launch, miscalculation और rogue actors का खतरा बढ़ रहा है।
हिरोशिमा की ऐतिहासिक घटना इस बहस को नैतिक और मानवीय संदर्भ देती है।
यह मुद्दा global diplomacy का अहम हिस्सा बन चुका है।
nuclear disarmament पर सहमति लगातार कमजोर हो रही है।
कई देश अपने defense budget और हथियारों के modernization पर जोर दे रहे हैं।
nuclear कार्यक्रमों पर भारी खर्च global economy पर दबाव डालता है।
साथ ही, यह संसाधनों को health, education और climate जैसे सेक्टर से दूर ले जाता है।
हिरोशिमा का यह आयोजन सिर्फ स्मरण नहीं, बल्कि global policy message है।
यह दुनिया को याद दिलाता है कि nuclear हथियारों का उपयोग मानवता के लिए catastrophic परिणाम लाता है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि arms control agreements को मजबूत करना जरूरी है।
dialogue, diplomacy और trust-building measures को प्राथमिकता देनी होगी।
अन्यथा nuclear risk और बढ़ सकता है।
हिरोशिमा परमाणु स्मरण सिर्फ अतीत की याद नहीं है।
यह वर्तमान की चेतावनी और भविष्य की चुनौती है।
जब तक nuclear हथियार मौजूद हैं, तब तक यह खतरा भी बना रहेगा।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।