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ईरान अमेरिका से बातचीत को तैयार, लेकिन भरोसा नहीं; राष्ट्रपति पेजेशकियन ने रखी शर्त

Shah Times 2026-08-29 12:44:47
ईरान अमेरिका से बातचीत को तैयार, लेकिन भरोसा नहीं; राष्ट्रपति पेजेशकियन ने रखी शर्त

ईरान और अमेरिका के बीच महीनों से जारी सैन्य और आर्थिक तनाव के बीच तेहरान ने बातचीत का दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं किया है। ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने कहा है कि ईरान अमेरिका के साथ बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन वॉशिंगटन को लेकर उसकी सतर्कता बरकरार है। पेजेशकियन ने कहा कि ईरान अपनी प्रतिबद्धताओं का सम्मान तभी करेगा, जब दूसरा पक्ष भी उसी तरह अपनी प्रतिबद्धताओं को पूरा करे। उनके मुताबिक बातचीत के जरिए आगे बढ़ने की गुंजाइश है, लेकिन इसके लिए दोनों पक्षों की ओर से पारस्परिक और समान कार्रवाई जरूरी होगी। ईरानी राष्ट्रपति की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब अमेरिका की ओर से तेहरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाया जा रहा है और जून में हुए समझौते को दोबारा लागू करने को लेकर दोनों पक्षों के बीच गतिरोध बना हुआ है। मध्यस्थ देशों की ओर से कूटनीतिक प्रयास भी जारी हैं।


तेहरान, ईरान|29 अगस्त 2026|शाह टाइम्स

By Mohd Haris


जून समझौते को फिर लागू करने की बात

पेजेशकियन ने एक टेलीविजन इंटरव्यू में जून में ईरान और अमेरिका के बीच हुए शांति समझौते के ज्ञापन का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि अगर दोनों पक्ष पहले से तय प्रतिबद्धताओं का पालन करें तो बातचीत आगे बढ़ सकती है। जून में हुए समझौते के तहत अमेरिका की ओर से ईरान पर लगी नौसैनिक नाकेबंदी और तेल तथा पेट्रोकेमिकल प्रतिबंधों को हटाने तथा ईरानी जमी हुई संपत्तियों को जारी करने की व्यवस्था की गई थी। इसके बदले व्यापक युद्धविराम और आगे की बातचीत का रास्ता तैयार किया गया था।

समझौते के तहत दोनों देशों को 60 दिनों के भीतर अंतिम समझौते की दिशा में बातचीत आगे बढ़ानी थी। यह समयसीमा 17 अगस्त को समाप्त हो चुकी है, लेकिन अंतिम समझौता नहीं हो सका। पिछले महीने दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ने के बाद प्रक्रिया और जटिल हो गई।

ईरान ने तेल निर्यात का दिया हवाला

पेजेशकियन ने कहा कि जून के समझौते के लागू रहने की अवधि में ईरान ने करीब 90 मिलियन बैरल तेल का निर्यात किया था। उनका कहना था कि समझौते की प्रतिबद्धताओं का पालन होने से ईरान को आर्थिक राहत मिली। ईरानी राष्ट्रपति के मुताबिक अब मुख्य सवाल यह है कि पहले से लिखी गई शर्तों को दोनों पक्ष किस तरह लागू करते हैं। उन्होंने संकेत दिया कि बातचीत के दौरान दोनों देशों के बीच सभी मुद्दों पर सहमति बनना जरूरी नहीं है, लेकिन पारस्परिक कार्रवाई से प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है।

अमेरिका पर भरोसा क्यों नहीं

ईरान का अमेरिका पर अविश्वास मौजूदा संकट का सबसे बड़ा कूटनीतिक अवरोध बना हुआ है। तेहरान का कहना है कि पिछले समझौतों के टूटने और अमेरिकी सैन्य तथा आर्थिक दबाव ने भरोसे की स्थिति को कमजोर किया है। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने भी हाल में कहा कि कूटनीति को दोबारा पटरी पर लाना असंभव नहीं है, लेकिन इसके लिए अमेरिका को यह समझना होगा कि दबाव की नीति काम नहीं करती। दूसरी तरफ अमेरिकी प्रशासन का रुख फिलहाल अलग है। वॉशिंगटन ने ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की नीति अपनाई है और अमेरिकी अधिकारियों ने कहा है कि बातचीत तभी सार्थक होगी जब तेहरान गंभीरता से वार्ता की मेज पर आए।

होर्मुज़ बना सबसे बड़ा विवाद

ईरान-अमेरिका विवाद में होर्मुज़ जलडमरूमध्य सबसे अहम मुद्दों में शामिल है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है और युद्ध शुरू होने के बाद यहां जहाजों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई है। ईरान इस जलमार्ग को खोलने के लिए अमेरिकी नाकेबंदी हटाने और अन्य शर्तों पर जोर देता रहा है। अमेरिका इसे अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग मानता है और वहां वाणिज्यिक जहाजों की स्वतंत्र आवाजाही चाहता है। मध्यस्थ देशों की कोशिश फिलहाल इसी मुद्दे को सुलझाने पर भी केंद्रित है। कतर, पाकिस्तान और ओमान ने ईरान-अमेरिका के बीच संवाद बहाल कराने में सक्रिय भूमिका निभाई है।

कतर और पाकिस्तान की मध्यस्थता

कतर के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुलरहमान अल थानी ने हाल में तेहरान में ईरानी नेतृत्व से मुलाकात की। बातचीत में होर्मुज़ की स्थिति और क्षेत्रीय स्थिरता पर चर्चा हुई। ईरानी विदेश मंत्री अराघची ने कतर के साथ बातचीत को रचनात्मक बताया है। पाकिस्तान और ओमान भी अलग-अलग स्तर पर कूटनीतिक प्रयासों में शामिल हैं। इन प्रयासों का उद्देश्य तत्काल किसी व्यापक समझौते की घोषणा से ज्यादा संवाद की प्रक्रिया को फिर शुरू करना है। मौजूदा स्थिति में यही सबसे व्यावहारिक कूटनीतिक रास्ता दिखाई दे रहा है।

ईरान के भीतर आर्थिक दबाव

ईरान की बातचीत की इच्छा को घरेलू आर्थिक परिस्थितियों से अलग करके भी नहीं देखा जा सकता। अमेरिकी प्रतिबंधों और युद्ध के असर से ईरान की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा है। रॉयटर्स के मुताबिक पेजेशकियन ने बताया है कि अमेरिकी प्रतिबंधों और नौसैनिक नाकेबंदी के कारण ईरान का विदेशी व्यापार करीब 35 प्रतिशत घटा है। तेल बिक्री और समुद्री व्यापार पर असर ने आर्थिक दबाव को और बढ़ाया है। ईरान के सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई ने भी सरकार से महंगाई, बेरोजगारी, कीमतों और बाजार प्रबंधन से जुड़े आर्थिक तथा आजीविका संबंधी मुद्दों पर गंभीर ध्यान देने को कहा है।

ईरानी नेतृत्व में अलग-अलग रुख

ईरान में बातचीत को लेकर पूरी राजनीतिक व्यवस्था का रुख एक जैसा नहीं है। राष्ट्रपति पेजेशकियन कूटनीतिक समाधान की संभावना पर जोर दे रहे हैं, जबकि सुरक्षा और सैन्य प्रतिष्ठान से जुड़े कुछ प्रभावशाली नेता अमेरिका के प्रति ज्यादा सख्त रुख रखते हैं। इस अंतर का असर बातचीत की गति पर पड़ सकता है। पेजेशकियन के पास विदेश नीति पर पूरी स्वतंत्रता नहीं है और सर्वोच्च नेता की भूमिका ईरानी राजनीतिक व्यवस्था में निर्णायक बनी हुई है। इसलिए राष्ट्रपति का बयान बातचीत की राजनीतिक इच्छा का संकेत जरूर है, लेकिन इसे तत्काल अमेरिका-ईरान वार्ता शुरू होने की घोषणा मानना सही नहीं होगा।

अमेरिका का रुख भी अहम

अमेरिका फिलहाल ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की रणनीति पर आगे बढ़ रहा है। वॉशिंगटन ने नए प्रतिबंधों और आर्थिक अलगाव की नीति को तेहरान पर दबाव बनाने के प्रमुख साधन के तौर पर इस्तेमाल किया है। अमेरिकी प्रशासन ने ईरान से जुड़ी आर्थिक गतिविधियों में शामिल देशों और संस्थाओं पर भी दबाव बढ़ाने की चेतावनी दी है। इससे बातचीत के लिए माहौल और जटिल हो गया है। दूसरी तरफ ईरान का कहना है कि आर्थिक दबाव से वह अपनी स्थिति नहीं बदलेगा और बातचीत तभी संभव होगी जब अमेरिका सैन्य तथा आर्थिक दबाव कम करे।

आगे क्या होगा

फिलहाल सबसे अहम सवाल यह है कि पेजेशकियन के बयान के बाद अमेरिका क्या प्रतिक्रिया देता है। अगर वॉशिंगटन और तेहरान जून के समझौते की शर्तों पर दोबारा चर्चा के लिए तैयार होते हैं, तो मध्यस्थ देशों को बातचीत की नई रूपरेखा तैयार करने का मौका मिल सकता है। लेकिन होर्मुज़, प्रतिबंध, जमी हुई ईरानी संपत्तियां और सुरक्षा गारंटी जैसे मुद्दे अभी भी गंभीर अड़चन हैं। इन सवालों पर समझौता हुए बिना व्यापक शांति समझौते की राह मुश्किल रहेगी। ईरानी राष्ट्रपति का ताजा बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि युद्ध और आर्थिक दबाव के बीच तेहरान ने बातचीत की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया है। लेकिन उनका संदेश उतना ही स्पष्ट है कि ईरान बिना भरोसे और पारस्परिक कार्रवाई के अमेरिका के साथ आगे नहीं बढ़ना चाहता। अब गेंद वॉशिंगटन के पाले में है। अगर अमेरिका और ईरान दबाव और सैन्य टकराव के बजाय व्यावहारिक कूटनीतिक रास्ते पर लौटते हैं, तो क्षेत्रीय तनाव कम करने की संभावना बन सकती है। फिलहाल यह संभावना खुली है, लेकिन दोनों पक्षों के बीच अविश्वास गहरा है और किसी ठोस समझौते की राह आसान नहीं दिखती। 

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Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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