ट्रंप ने ईरान से बातचीत नकारी, तेहरान का पलटवार
ईरान-अमेरिका बातचीत पर फिर टकराए दावे, होर्मुज़ केंद्र में
होर्मुज़ पर बढ़ा तनाव, ट्रंप और तेहरान आमने-सामने
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ बातचीत से इनकार किया है, जबकि तेहरान का कहना है कि वॉशिंगटन दबाव में है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर दोनों पक्षों के विरोधी दावे कूटनीतिक गतिरोध को गहरा कर रहे हैं। इसका असर तेल कीमतों, शिपिंग और क्षेत्रीय सुरक्षा पर पड़ रहा है।
वॉशिंगटन/तेहरान | 19 अगस्त 2026 |शाह टाइम्स
By Mohd Haris
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ किसी मौजूदा या निर्धारित बातचीत से इनकार किया है। इसके उलट तेहरान की तरफ से संकेत दिया गया है कि अमेरिका दबाव में है और ईरान अपनी शर्तों के साथ कूटनीतिक रास्ता खुला रखना चाहता है। इस विरोधाभास ने छह महीने से चल रहे संघर्ष के बीच किसी संभावित समझौते की उम्मीद को फिर कमजोर किया है।
सबसे बड़ा विवाद होर्मुज़ जलडमरूमध्य को लेकर है। ट्रंप का कहना है कि यह महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग खुला और संचालित है, जबकि ईरानी पक्ष का दावा है कि जलडमरूमध्य तब तक पूरी तरह नहीं खुलेगा, जब तक अमेरिका जून में हुए अंतरिम समझौते की शर्तें पूरी नहीं करता। यह सिर्फ दो देशों के बीच बयानबाज़ी का मामला नहीं है। होर्मुज़ दुनिया के अहम ऊर्जा मार्गों में शामिल है। युद्ध से पहले दुनिया के कारोबार किए जाने वाले तेल और एलएनजी का करीब पांचवां हिस्सा इस मार्ग से गुजरता था। इसलिए यहां लंबे समय तक व्यवधान का असर ऊर्जा कीमतों, शिपिंग लागत और वैश्विक महंगाई पर पड़ सकता है।
अमेरिकी प्रशासन और ईरानी नेतृत्व पिछले कई महीनों से कूटनीतिक संपर्क को लेकर अलग-अलग तस्वीर पेश करते रहे हैं। जुलाई और अगस्त में भी वॉशिंगटन ने वार्ता की संभावना या प्रगति का संकेत दिया, जबकि तेहरान ने प्रत्यक्ष बातचीत से इनकार करते हुए मध्यस्थ देशों के जरिए संदेशों के आदान-प्रदान की बात कही थी। 19 अगस्त की मौजूदा स्थिति में ट्रंप का रुख अधिक स्पष्ट है। उन्होंने कहा है कि ईरान के साथ कोई बातचीत चल नहीं रही और न ही ऐसी बातचीत निर्धारित है। दूसरी ओर, ईरान की तरफ से यह नैरेटिव आगे बढ़ाया जा रहा है कि सैन्य और आर्थिक दबाव के बावजूद वॉशिंगटन को क्षेत्रीय संकट से निकलने के लिए कूटनीति की जरूरत है। यहां एक अहम संपादकीय सावधानी जरूरी है। तेहरान का यह दावा कि अमेरिका बातचीत के लिए दबाव में है, एक राजनीतिक दावा है। उपलब्ध रिपोर्टिंग इसे स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य के रूप में पेश नहीं करती। इसी तरह ट्रंप के इस बयान से भी यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि भविष्य में कोई बैक-चैनल डिप्लोमेसी नहीं होगी।
17 जून को अमेरिका और ईरान के बीच एक अंतरिम मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग हुआ था। इसका उद्देश्य सैन्य कार्रवाई रोकना और 60 दिनों के भीतर व्यापक समझौते की दिशा में आगे बढ़ना था। इसमें ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम, अमेरिकी प्रतिबंधों और होर्मुज़ जलडमरूमध्य के भविष्य जैसे मुद्दे शामिल थे। समझौते की सबसे कठिन शर्त समुद्री मार्ग से जुड़ी रही। ईरान ने जलडमरूमध्य के संचालन और जहाजों की आवाजाही में अपनी भूमिका पर जोर दिया, जबकि अमेरिका और उसके साझेदारों ने मुक्त और सुरक्षित समुद्री आवाजाही को प्राथमिकता दी। समझौते की 60 दिन की अवधि अगस्त में समाप्त हो गई। इसके बाद दोनों पक्ष एक-दूसरे पर समझौते के टूटने की जिम्मेदारी डालते रहे। ट्रंप ने पहले ही समझौते को समाप्त मानने का संकेत दिया था, जबकि ईरान ने इसे निलंबित बताया।
होर्मुज़ संकट अब बातचीत का केंद्रीय मुद्दा बन चुका है। ईरानी संसद के स्पीकर और प्रमुख वार्ताकार मोहम्मद बाक़ेर क़ालीबाफ ने कहा है कि जलडमरूमध्य तब तक बंद रहेगा, जब तक अमेरिका अंतरिम समझौते से जुड़ी शर्तों को पूरा नहीं करता। ईरानी शर्तों में अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी हटाना, तेल प्रतिबंधों में राहत, ईरानी फ्रीज़ की गई संपत्तियों को जारी करना और सैन्य कार्रवाई तथा धमकियों को समाप्त करना शामिल है। अमेरिका इन मांगों को स्वीकार करने की स्थिति में दिखाई नहीं देता। वॉशिंगटन के लिए होर्मुज़ पर ईरान की निर्णायक भूमिका स्वीकार करना रणनीतिक और सुरक्षा दोनों स्तरों पर गंभीर सवाल खड़े करेगा। यही वजह है कि मौजूदा गतिरोध को केवल युद्धविराम का तकनीकी विवाद समझना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे समुद्री नियंत्रण, ऊर्जा सुरक्षा, ईरान की परमाणु नीति, प्रतिबंध और क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन जैसे कई मुद्दे जुड़े हैं।
यह सवाल भी अब विवाद के केंद्र में है। ट्रंप का कहना है कि होर्मुज़ खुला है और अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी लागू है। लेकिन शिपिंग डेटा और स्वतंत्र रिपोर्टों में सामान्य स्तर की आवाजाही दिखाई नहीं देती। रिपोर्ट के मुताबिक, 18 अगस्त को जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही बेहद कम रही और शुरुआती आंकड़ों में पारगमन की संख्या एकल अंक तक पहुंच गई थी। एसोसिएटेड प्रेस ने भी बताया कि जहाजों की आवाजाही में तेज गिरावट आई है। उसके अनुसार एक शिपिंग डेटा प्लेटफॉर्म ने पिछले सप्ताह पुष्टि किए गए पारगमन में करीब 19.5 प्रतिशत गिरावट दर्ज की थी।
इसलिए यहां दो अलग अवधारणाओं को अलग करना जरूरी है। किसी समुद्री मार्ग का कानूनी तौर पर खुला होना और उसका व्यावहारिक रूप से सामान्य वाणिज्यिक आवाजाही के लिए सुरक्षित होना एक ही बात नहीं है।
कूटनीतिक गतिरोध का सबसे तेज असर ऊर्जा बाजार में दिखाई दे रहा है। 19 अगस्त को ब्रेंट क्रूड शुरुआती कारोबार में 91.28 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया, जबकि अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट 85.31 डॉलर पर था। दोनों कीमतों में लगातार चौथे कारोबारी दिन बढ़त दर्ज हुई।
18 अगस्त को ब्रेंट 91.02 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ था। संघर्ष के दौरान यह कीमत 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच चुकी है, जो युद्ध से पहले के स्तर से लगभग 75 प्रतिशत अधिक थी। हालांकि बाजार ने कुछ वैकल्पिक व्यवस्थाओं के कारण तत्काल आपूर्ति संकट की आशंका को सीमित किया है। सऊदी अरामको ने समुद्र के रास्ते वैकल्पिक लोडिंग व्यवस्था शुरू की है और चीन की कुछ बड़ी शिपिंग कंपनियां होर्मुज़ तथा बाब अल-मंदेब से बचने के लिए मार्ग बदल रही हैं। इराक ने भी सितंबर से कच्चे तेल के निर्यात के लिए वैकल्पिक मार्गों और नई व्यवस्थाओं को मंजूरी दी है। इसका मकसद होर्मुज़ पर निर्भरता के जोखिम को कम करना है।
कूटनीतिक गतिरोध के बीच सैन्य जोखिम भी बरकरार है। रॉयटर्स के मुताबिक, 18 अगस्त को संयुक्त अरब अमीरात ने ईरान से दागी गई दो बैलिस्टिक मिसाइलों का पता चलने की जानकारी दी। ईरान ने इस आरोप को खारिज किया और इसे बेबुनियाद बताया।
उसी दिन ब्रिटेन की यूके मैरीटाइम ट्रेड ऑपरेशंस एजेंसी को एक जहाज के होर्मुज़ से बाहर निकलते समय अज्ञात प्रोजेक्टाइल से प्रभावित होने की सूचना मिली। जहाज के इंजन कक्ष को नुकसान और एक चालक दल के सदस्य के हताहत होने की जानकारी दी गई। इस घटना की जिम्मेदारी तत्काल स्पष्ट नहीं हुई। इस तरह समुद्री सुरक्षा और कूटनीति एक-दूसरे से सीधे जुड़ गए हैं। जब तक व्यापारी जहाजों को सुरक्षित मार्ग का भरोसा नहीं मिलता, तेल और माल ढुलाई बाजार पूरी तरह सामान्य होने की संभावना कमजोर रहेगी।
इस पूरे मुआमले में ओमान की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है। ईरान और ओमान होर्मुज़ में समुद्री आवाजाही को लेकर अलग व्यवस्था पर बातचीत कर रहे हैं। इससे ओमान एक संभावित मध्यस्थ और व्यावहारिक समुद्री साझेदार, दोनों भूमिकाओं में सामने आया है।
रिपोर्टिंग के अनुसार, ट्रंप ने ओमान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की धमकी भी दी है, क्योंकि वॉशिंगटन तेहरान और मस्कट के बीच समुद्री व्यवस्था को लेकर चल रही कोशिशों से असहज है। इस दावे को ओमान की तरफ से सार्वजनिक रूप से उसी स्तर पर पुष्ट नहीं किया गया है, इसलिए इसे अमेरिकी राष्ट्रपति के कथित बयान और मीडिया रिपोर्टिंग के संदर्भ में ही देखा जाना चाहिए। ओमान के लिए चुनौती बेहद कठिन है। उसे ईरान के साथ भौगोलिक और कूटनीतिक संबंध बनाए रखते हुए अमेरिकी सुरक्षा साझेदारी को भी संभालना है।
मौजूदा हालात बताते हैं कि दोनों पक्ष अभी उस बिंदु पर नहीं पहुंचे हैं जहां समझौते के लिए जरूरी राजनीतिक रियायतें देने की तैयारी दिखे। अमेरिका आर्थिक प्रतिबंध और सैन्य दबाव को बातचीत में leverage के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। ईरान दूसरी तरफ होर्मुज़ और क्षेत्रीय सुरक्षा को अपने वार्ता प्रभाव के हिस्से के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है। यह धारणा भी जांच के दायरे में है कि सैन्य दबाव अपने आप ईरान को समझौते के लिए मजबूर कर देगा। अल जज़ीरा से बात करने वाले विशेषज्ञों ने इस आकलन पर सवाल उठाए थे और अमेरिकी सैन्य क्षमता, मिसाइल इंटरसेप्टर भंडार तथा लंबे युद्ध की आर्थिक लागत जैसे कारकों की ओर इशारा किया था। दूसरी तरफ ईरान की आर्थिक स्थिति भी दबाव में है। लंबे संघर्ष, प्रतिबंध और ऊर्जा निर्यात में व्यवधान से तेहरान पर आर्थिक दबाव बढ़ता है। इसलिए दोनों पक्षों के पास दबाव झेलने की क्षमता है, लेकिन दोनों की सीमाएं भी मौजूद हैं।
निकट भविष्य में तीन संभावनाएं दिखाई देती हैं। पहली, मध्यस्थ देशों के जरिए सीमित बातचीत दोबारा शुरू हो और होर्मुज़ के लिए अंतरिम समुद्री व्यवस्था तैयार हो। दूसरी, गतिरोध लंबा खिंचे और तेल तथा शिपिंग बाजार में जोखिम प्रीमियम बना रहे। तीसरी, किसी समुद्री घटना या सैन्य जवाबी कार्रवाई से संघर्ष फिर तेज हो जाए। इनमें से किसी भी संभावना को निश्चित परिणाम के रूप में पेश करना जल्दबाजी होगी। मौजूदा संकेतों में सबसे स्पष्ट बात यह है कि अमेरिका और ईरान के सार्वजनिक बयान एक-दूसरे से मेल नहीं खाते और विश्वास का संकट गहरा है।
ईरान वार्ता इस समय केवल कूटनीतिक संपर्क का सवाल नहीं है। इसके साथ होर्मुज़ जलडमरूमध्य का नियंत्रण, ऊर्जा सुरक्षा, अमेरिकी प्रतिबंध, ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम और क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन सीधे जुड़े हुए हैं। स्थापित तथ्य यह है कि ट्रंप ने बातचीत से इनकार किया है, जबकि ईरान बातचीत की संभावना को पूरी तरह बंद नहीं कर रहा। यह भी स्पष्ट है कि होर्मुज़ से सामान्य शिपिंग प्रभावित है और इसका असर तेल बाजार पर पड़ रहा है।
अनिश्चितता इस बात को लेकर है कि दोनों पक्ष बंद दरवाजों के पीछे कितना संवाद कर रहे हैं और क्या कोई नया मध्यस्थता प्रयास आकार ले रहा है। फिलहाल ईरान वार्ता का सबसे बड़ा परीक्षण यही है कि क्या होर्मुज़ पर समझौते का कोई ऐसा फार्मूला तैयार होता है, जिसे वॉशिंगटन और तेहरान दोनों राजनीतिक रूप से स्वीकार कर सकें।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।