ट्रंप की ईरान को सरेंडर की चेतावनी, MOU खत्म
ईरान पर ट्रंप का दबाव बढ़ा, होर्मुज़ पर नया संकट
60 दिन की डेडलाइन खत्म, अमेरिका-ईरान वार्ता अटकी
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान से सरेंडर करने को कहा, जबकि दोनों देशों के बीच 60 दिन की MOU वार्ता अवधि खत्म हो गई। होर्मुज़ जलडमरूमध्य विवाद वार्ता की सबसे बड़ी अड़चन बना है। ईरान ने कूटनीति विफल होने पर सैन्य रुख सख्त करने का संकेत दिया है। क्षेत्रीय तनाव बढ़ा है।
वॉशिंगटन/तेहरान | 18 अगस्त 2026 | शाह टाइम्स
By Mohd Haris
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान से आत्मसमर्पण करने की मांग की है। यह बयान ऐसे वक्त आया जब अमेरिका और ईरान के बीच जून में हुए समझौते के तहत तय 60 दिन की वार्ता अवधि खत्म हो गई और किसी स्थायी समझौते पर सहमति नहीं बन सकी। अल जज़ीरा के मुताबिक ट्रंप ने ईरान से “व्हाइट फ्लैग” उठाने की बात कही, जबकि वॉशिंगटन ने अंतरिम समझौते को आगे बढ़ाने से इनकार किया। इस घटनाक्रम ने अमेरिका-ईरान टकराव को नए मोड़ पर ला दिया है। अब विवाद केवल परमाणु कार्यक्रम या प्रतिबंधों तक सीमित नहीं है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही, अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी, ईरान की सुरक्षा चिंताएं और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन इस संकट के मुख्य केंद्र बन चुके हैं।
17 जून को अमेरिका और ईरान के बीच एक मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग यानी MOU हुआ था। इसका मकसद युद्ध को रोकना और व्यापक समझौते की दिशा में बातचीत के लिए समय देना था। समझौते में अंतिम डील के लिए अधिकतम 60 दिन की समयसीमा रखी गई थी, जिसे दोनों पक्षों की सहमति से बढ़ाया जा सकता था।
इस MOU का एक अहम पहलू होर्मुज़ जलडमरूमध्य था। यह जलमार्ग वैश्विक ऊर्जा कारोबार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है और इसके जरिए तेल तथा गैस की बड़ी मात्रा अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचती है। संघर्ष के दौरान यहां जहाजों की आवाजाही में भारी गिरावट ने पहले ही वैश्विक ऊर्जा बाजार में चिंता बढ़ा दी है।
लेकिन समझौते के बाद भी बुनियादी विवाद खत्म नहीं हुए। अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर ठोस सीमाएं चाहता है, जबकि तेहरान अमेरिकी प्रतिबंधों, सैन्य दबाव और होर्मुज़ पर अमेरिकी कार्रवाई को लेकर अलग रुख रखता है।
ट्रंप ने साफ संकेत दिया है कि वॉशिंगटन मौजूदा MOU को आगे बढ़ाने में दिलचस्पी नहीं रखता। रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने कहा कि ईरान ऐसा समझौता स्वीकार नहीं कर रहा है जिसे अमेरिकी प्रशासन जरूरी मानता है। ट्रंप ने यह भी दोहराया कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना अमेरिका की प्राथमिकता है। ट्रंप की भाषा इस बार कूटनीतिक दबाव से आगे जाती दिखी। ईरान से सरेंडर की मांग का सीधा मतलब है कि वॉशिंगटन बातचीत को बराबरी की बातचीत के बजाय अधिकतम दबाव की रणनीति के तहत आगे बढ़ाना चाहता है। हालांकि इसका दूसरा पहलू भी है। ऐसी कठोर सार्वजनिक बयानबाजी ईरानी नेतृत्व के लिए पीछे हटना और मुश्किल बना सकती है। किसी भी बातचीत में घरेलू राजनीतिक दबाव महत्वपूर्ण होता है और ईरान में अमेरिकी मांगों के सामने झुकना नेतृत्व के लिए गंभीर राजनीतिक कीमत पैदा कर सकता है।
रिपोर्ट की रिपोर्ट के मुताबिक एक वरिष्ठ ईरानी अधिकारी ने कहा कि कूटनीतिक प्रयासों के गतिरोध के कारण ईरान अपने रुख को रक्षात्मक से “फुली ऑफेंसिव” दिशा में ले जाने की तैयारी कर रहा है। अधिकारी ने यह संकेत भी दिया कि अगर कूटनीति विफल रहती है तो होर्मुज़ में सैन्य कार्रवाई का जोखिम बढ़ सकता है।
यह बयान केवल अमेरिकी दबाव का जवाब नहीं है। तेहरान के लिए होर्मुज़ राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक रणनीति दोनों का सवाल है। ईरान का तर्क है कि जब तक उस पर अमेरिकी सैन्य और आर्थिक दबाव बना रहेगा, तब तक जलडमरूमध्य को लेकर किसी समझौते पर पहुंचना आसान नहीं होगा।
इस स्थिति में दोनों पक्ष एक-दूसरे से पहले रियायत की उम्मीद कर रहे हैं। अमेरिका दबाव कम करने से पहले ईरान से ठोस कदम चाहता है, जबकि ईरान प्रतिबंध और नाकाबंदी हटने को आगे की बातचीत की बुनियादी शर्त मानता है। यही गतिरोध MOU की सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुआ।
होर्मुज़ इस पूरे संकट का रणनीतिक केंद्र है। ईरान और ओमान के बीच इस जलमार्ग को लेकर अलग बातचीत चल रही है, जिसका मकसद वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही बहाल करना है। एसोसिएटेड प्रेस के मुताबिक ईरान और ओमान किसी व्यवस्था को अंतिम रूप देने के करीब थे, लेकिन अमेरिकी दबाव ने इस प्रक्रिया को और जटिल कर दिया। ट्रंप ने ओमान को लेकर भी कड़ा बयान दिया और चेतावनी दी कि अगर वह ईरान से जुड़े किसी ऐसे प्रयास में बाधा बनता है जिसे अमेरिका अपने हितों के खिलाफ मानता है, तो वॉशिंगटन सैन्य कार्रवाई कर सकता है। रॉयटर्स और गार्डियन दोनों ने इस बयान को क्षेत्रीय तनाव बढ़ाने वाला घटनाक्रम बताया। ओमान की भूमिका इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह लंबे समय से अमेरिका और ईरान के बीच संवाद के लिए मध्यस्थ रहा है। ऐसे में मस्कट पर दबाव बढ़ना क्षेत्रीय डिप्लोमेसी के लिए भी गंभीर संकेत है।
अमेरिकी प्रशासन सार्वजनिक रूप से ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने को अपनी प्राथमिकता बताता है। लेकिन मौजूदा संकट में परमाणु मुद्दे के साथ कई दूसरे सवाल जुड़ चुके हैं। इनमें अमेरिकी प्रतिबंध, ईरान की तेल आय, सैन्य उपस्थिति, नौसैनिक नाकाबंदी और होर्मुज़ में जहाजों की आवाजाही शामिल हैं। इस वजह से किसी संभावित शांति समझौते को केवल परमाणु कार्यक्रम पर केंद्रित रखना मुश्किल हो गया है। एसोसिएटेड प्रेस के अनुसार जून के समझौते में होर्मुज़ को फिर से खोलने और अमेरिकी नाकाबंदी हटाने जैसे महत्वपूर्ण प्रावधान थे, लेकिन इन पर अमल नहीं हो सका। दोनों पक्ष समझौते के टूटने के लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।
राजनयिक दृष्टि से MOU की 60 दिन की समयसीमा खत्म हो चुकी है। लेकिन इसका अर्थ अपने आप यह नहीं है कि बातचीत हमेशा के लिए समाप्त हो गई है।
समझौते में समयसीमा को आपसी सहमति से बढ़ाने की गुंजाइश थी। फिलहाल वॉशिंगटन विस्तार के पक्ष में नहीं दिख रहा, जबकि क्षेत्रीय मध्यस्थ बातचीत का रास्ता खुला रखने की कोशिश कर रहे हैं। रॉयटर्स ने भी बताया है कि कूटनीतिक प्रयास पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं, हालांकि प्रगति बेहद सीमित है। इसलिए मौजूदा स्थिति को “युद्ध और बातचीत के बीच अंतिम फैसला” कहना जल्दबाजी होगी। अधिक सटीक तस्वीर यह है कि औपचारिक समयसीमा खत्म हो चुकी है, भरोसा कमजोर है और दोनों पक्षों की सार्वजनिक भाषा अधिक सख्त हो गई है।
होर्मुज़ संकट का असर केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं है। तेल की कीमतों पर इसका सीधा प्रभाव पड़ रहा है क्योंकि जहाजों की आवाजाही में भारी गिरावट से वैश्विक सप्लाई को लेकर जोखिम बढ़ गया है। रॉयटर्स के अनुसार 17 अगस्त को ब्रेंट क्रूड 90.87 डॉलर प्रति बैरल पर बंद हुआ, जबकि वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट 84.50 डॉलर तक पहुंचा। रिपोर्ट के मुताबिक शनिवार को होर्मुज़ से केवल पांच जहाज गुजरे और रविवार को कोई जहाज नहीं गुजरा। 18 अगस्त को भी तेल बाजार में दबाव बना रहा। रॉयटर्स के मुताबिक ब्रेंट 91.49 डॉलर और डब्ल्यूटीआई 85.25 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचा। अगर जलडमरूमध्य में व्यवधान लंबे समय तक रहता है, तो ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक महंगाई का दबाव बढ़ सकता है। भारत समेत एशिया के ऊर्जा आयातक देशों के लिए यह स्थिति खास अहम है। लंबे समय तक ऊंची तेल कीमतें आयात बिल, परिवहन लागत और घरेलू महंगाई पर दबाव डाल सकती हैं।
मौजूदा बयानों से सैन्य तनाव बढ़ने का जोखिम साफ दिखाई देता है। ट्रंप का सरेंडर वाला बयान, ईरान का आक्रामक सैन्य रुख अपनाने का संकेत और होर्मुज़ में जहाजों की कम आवाजाही तीनों एक ही दिशा में इशारा करते हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि बड़े पैमाने पर नए सैन्य अभियान का फैसला हो चुका है। दोनों पक्षों के पास सैन्य विकल्प मौजूद हैं, लेकिन उनके आर्थिक और रणनीतिक खर्च भी बड़े हैं। अमेरिका के लिए लंबा संघर्ष ऊर्जा कीमतों और क्षेत्रीय स्थिरता का सवाल खड़ा करता है। ईरान के लिए लंबे संघर्ष का मतलब आर्थिक दबाव, तेल निर्यात पर असर और सैन्य संसाधनों पर अतिरिक्त बोझ है।
ओमान इस संकट में एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक चैनल बना हुआ है। अगर अमेरिका और ओमान के संबंधों में तनाव बढ़ता है, तो इसका असर केवल होर्मुज़ तक सीमित नहीं रहेगा। ओमान लंबे समय से अमेरिका और ईरान के बीच संवाद का माध्यम रहा है। इसलिए मस्कट की मध्यस्थ भूमिका कमजोर पड़ना भविष्य की बातचीत के लिए नुकसानदेह हो सकता है। गार्डियन ने भी ट्रंप की धमकी को इस व्यापक कूटनीतिक संदर्भ में देखा है। दूसरी तरफ, अमेरिका का रुख यह है कि होर्मुज़ में किसी ऐसी व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया जा सकता जो अमेरिकी नौसैनिक और व्यापारिक हितों को सीमित करे। यही अंतर दोनों पक्षों के बीच बातचीत को कठिन बना रहा है।
अगले चरण में तीन रास्ते दिखाई देते हैं। पहला, मध्यस्थ देशों की मदद से नई बातचीत शुरू हो। दूसरा, अमेरिका आर्थिक और सैन्य दबाव बढ़ाए। तीसरा, होर्मुज़ में सैन्य टकराव बढ़े और दोनों पक्ष फिर व्यापक संघर्ष की ओर जाएं। इनमें से किसी एक को निश्चित भविष्य बताना सही नहीं होगा। फिलहाल उपलब्ध संकेत बताते हैं कि कूटनीतिक रास्ता कमजोर जरूर हुआ है, लेकिन पूरी तरह बंद नहीं हुआ। ईरान और ओमान के बीच होर्मुज़ को लेकर जारी बातचीत एक संभावित संपर्क बिंदु है। यदि यहां सीमित समझौता भी बनता है, तो उससे बड़े राजनीतिक समझौते के लिए कुछ जगह तैयार हो सकती है। इसके विपरीत, अगर जहाजों पर हमले या सैन्य कार्रवाई बढ़ती है, तो बातचीत की गुंजाइश तेजी से कम हो सकती है।
ईरान को ट्रंप की सरेंडर की चेतावनी ऐसे समय आई है जब अमेरिका-ईरान MOU की 60 दिन की समयसीमा खत्म हो चुकी है और कोई स्थायी समझौता नहीं बन पाया। स्थापित तथ्य यह है कि वार्ता गंभीर गतिरोध में है और होर्मुज़ जलडमरूमध्य इसका सबसे कठिन मुद्दा बना हुआ है। अनिश्चितता अब इस बात को लेकर है कि दोनों पक्ष दबाव की मौजूदा रणनीति से आगे बढ़कर बातचीत के लिए नई जमीन तैयार करेंगे या सैन्य टकराव को और बढ़ने देंगे। ईरान का आक्रामक रुख और अमेरिका का MOU विस्तार से इनकार हालात को अधिक संवेदनशील बनाता है। इस संकट का असर वॉशिंगटन और तेहरान से बाहर भी है। होर्मुज़ में लंबे समय तक व्यवधान तेल कीमतों, वैश्विक शिपिंग और एशियाई ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है। इसलिए अब सवाल केवल यह नहीं है कि ईरान सरेंडर करेगा या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या दोनों पक्ष सैन्य दबाव को एक नए कूटनीतिक समझौते में बदलने का रास्ता तलाश पाएंगे।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।