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पुराने समय में बिना घड़ी के लोग समय का पता कैसे लगाते थे? जानिए समय मापने के पुराने तरीके

Neelam Saini 2026-09-10 18:27:22
पुराने समय में बिना घड़ी के लोग समय का पता कैसे लगाते थे? जानिए समय मापने के पुराने तरीके

घड़ी आने से पहले लोग सूरज की छाया, तारों, चांद और पानी के बहाव से समय का अंदाजा लगाते थे। मिस्र समेत कई प्राचीन सभ्यताओं में धूपघड़ी और जलघड़ी जैसे उपकरण इस्तेमाल होते थे।

पुराने समय में बिना घड़ी के लोग समय का पता कैसे लगाते थे?

आज हमारे लिए समय जानना बेहद आसान है। मोबाइल फोन, स्मार्टवॉच और दीवार पर लगी घड़ी कुछ ही सेकंड में बता देती है कि अभी कितना बजा है। लेकिन उस दौर की कल्पना कीजिए जब न घड़ी थी, न मोबाइल और न ही सटीक समय बताने वाली आधुनिक मशीनें। तब लोग आखिर कैसे जानते थे कि सुबह हो गई है, दोपहर बीत रही है या रात का कौन-सा पहर चल रहा है? इतिहास बताता है कि इंसान ने समय को समझने के लिए सबसे पहले प्रकृति का सहारा लिया। सूरज की स्थिति, उसकी छाया, चांद के चरण और रात में तारों की स्थिति समय के महत्वपूर्ण संकेत थे। बाद में अलग-अलग सभ्यताओं ने धूपघड़ी और जलघड़ी जैसे उपकरण विकसित किए, जिनसे समय के अंतराल को पहले की तुलना में अधिक व्यवस्थित तरीके से मापा जा सका। 

सूरज था सबसे पुरानी ‘घड़ी’

दिन के समय समय का अंदाजा लगाने का सबसे आसान तरीका सूरज था। सुबह सूरज पूर्व दिशा में दिखाई देता था और दिन बढ़ने के साथ आकाश में उसकी स्थिति बदलती रहती थी। दोपहर के आसपास उसकी स्थिति सबसे ऊंची होती थी और इसके बाद वह पश्चिम की ओर बढ़ता दिखाई देता था। इंसान ने यह भी देखा कि किसी खड़ी वस्तु की छाया दिनभर लगातार बदलती रहती है। इसी प्राकृतिक घटना को समय मापने के लिए इस्तेमाल किया गया और आगे चलकर धूपघड़ी का विकास हुआ। धूपघड़ी में एक खड़ी छड़ या सूचक होता था, जिसे वैज्ञानिक भाषा में ग्नोमोन कहा जाता है। सूरज की रोशनी पड़ने पर इसकी छाया एक निश्चित दिशा में जाती थी। सतह पर बने निशानों के आधार पर समय का अनुमान लगाया जा सकता था। 

प्राचीन मिस्र में धूपघड़ी और छाया घड़ी

प्राचीन मिस्र में समय मापने की व्यवस्था काफी विकसित थी। द मेट्रोपॉलिटन म्यूज़ियम ऑफ आर्ट के अनुसार, नए साम्राज्य के समय तक मिस्र में धूपघड़ी, छाया घड़ी और जलघड़ी के इस्तेमाल के प्रमाण मिलते हैं। मिस्र में दिन और रात को मिलाकर चौबीस घंटों की व्यवस्था का इस्तेमाल किया जाता था। दिन के बारह घंटे और रात के बारह घंटे माने जाते थे, हालांकि उस समय ‘घंटे’ की लंबाई आज की तरह हर मौसम में समान नहीं थी। इससे पता चलता है कि समय को मापने की इंसानी कोशिश हजारों वर्ष पुरानी है और इसके लिए खगोलीय घटनाओं का बारीकी से निरीक्षण किया जाता था।

रात में तारों से समय का अंदाजा

सूरज डूबने के बाद समय जानना ज्यादा मुश्किल था। ऐसे में रात का आसमान महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था।प्राचीन मिस्र में कुछ तारों के समूहों की रात के आकाश में गति का इस्तेमाल रात के समय को समझने के लिए किया जाता था। इन तारों के समूहों को ‘डेकान’ के नाम से जाना जाता था। समुद्री यात्राओं में भी आकाश का महत्व रहा। नाविक दिशा और समय से जुड़े अनुमान लगाने के लिए सूर्य और तारों का निरीक्षण करते थे। अमेरिकी राष्ट्रीय उद्यान सेवा के अनुसार, तारों की मदद से दिशा और दिन के समय से जुड़ी जानकारी हासिल करने की परंपरा हजारों साल पुरानी है। 

जलघड़ी ने बदला समय मापने का तरीका

धूपघड़ी की सबसे बड़ी सीमा यह थी कि उसे सूरज की रोशनी चाहिए थी। बादल, रात और बंद स्थानों में इसका इस्तेमाल मुश्किल था। इसी समस्या ने पानी से समय मापने जैसे तरीके को जन्म दिया। जलघड़ी में पानी को एक पात्र से दूसरे पात्र में नियंत्रित गति से बहने दिया जाता था। पानी के स्तर में होने वाले बदलाव को समय के अंतराल से जोड़ा जाता था। प्राचीन मिस्र में जलघड़ियों के प्रमाण मिलते हैं। द मेट के संग्रह में चौथी शताब्दी ईसा पूर्व की मिस्र से संबंधित एक जलघड़ी का नमूना मौजूद है, जिसमें पानी एक छोटे छेद से नियंत्रित तरीके से निकलता था। एक अन्य मिस्री जलघड़ी का काल लगभग ६६४ से ३० ईसा पूर्व के बीच माना गया है। 

जलघड़ियां सिर्फ मिस्र तक सीमित नहीं थीं

समय मापने के लिए पानी का इस्तेमाल दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में किया गया। बाद के दौर में मुस्लिम दुनिया के वैज्ञानिकों ने भी जलघड़ी और यांत्रिक उपकरणों को विकसित किया। तेरहवीं शताब्दी के इंजीनियर अल-जज़री ने कई जटिल यांत्रिक उपकरणों का वर्णन किया। उनके ग्रंथ में विभिन्न प्रकार की जलघड़ियों के डिजाइन शामिल थे। इनमें ऐसी घड़ियां भी थीं जो समय के साथ ध्वनि और चलने वाली आकृतियों जैसी यांत्रिक गतिविधियां प्रदर्शित करती थीं। यह उस दौर की इंजीनियरिंग और समय मापने की तकनीक की उन्नति को दिखाता है।

क्या लोग चांद देखकर भी समय और तारीख समझते थे?

हां, चांद लंबे समय से समय और कैलेंडर समझने का महत्वपूर्ण प्राकृतिक संकेत रहा है। चांद के घटने-बढ़ने के चक्र को देखकर महीनों और मौसमों की गणना करने की परंपरा कई प्राचीन समाजों में रही। प्राचीन मिस्र में भी कैलेंडर को चंद्र चक्र और कृषि मौसमों से जोड़कर देखा जाता था। हालांकि चांद को देखकर किसी खास मिनट या घंटे का पता लगाना संभव नहीं था। इसलिए इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से लंबी समयावधियों और कैलेंडर संबंधी गणना में ज्यादा उपयोगी था।

दिनचर्या भी समय का संकेत देती थी

घड़ी के अभाव में लोग केवल वैज्ञानिक उपकरणों पर निर्भर नहीं थे। रोजमर्रा की जिंदगी भी प्राकृतिक चक्रों के साथ जुड़ी हुई थी।सूर्योदय का मतलब दिन की शुरुआत, सूर्य की ऊंचाई से दोपहर का अनुमान और सूर्यास्त के बाद रात की शुरुआत समझी जा सकती थी। कृषि समाजों में काम का समय भी सूरज की रोशनी और मौसम के अनुसार तय होता था। इस व्यवस्था में हर काम के लिए मिनट और सेकंड की जरूरत नहीं थी। खेती, पशुपालन, यात्रा और घरेलू कामकाज जैसे अधिकांश कार्य प्राकृतिक समय-चक्र के अनुसार चलते थे।

समय मापने की जरूरत क्यों बढ़ी?

जैसे-जैसे शहरों, व्यापार, धार्मिक संस्थानों, प्रशासन और लंबी दूरी की यात्राओं का विकास हुआ, वैसे-वैसे अधिक व्यवस्थित समय मापने की जरूरत भी बढ़ी। धूपघड़ी दिन में उपयोगी थी, लेकिन रात और खराब मौसम में सीमित थी। जलघड़ी ने इस कमी को कुछ हद तक दूर किया। आगे चलकर यांत्रिक घड़ियों के विकास ने समय को अधिक नियमित अंतराल में मापना संभव बनाया। इसके बाद समय केवल सूरज की स्थिति का अनुमान लगाने वाली चीज नहीं रहा, बल्कि सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।

क्या प्राचीन लोग बिल्कुल सटीक समय जानते थे?

यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। आज हम घंटे, मिनट और सेकंड तक समय मापते हैं, लेकिन प्राचीन समाजों में हर जगह ऐसी सटीकता मौजूद नहीं थी। द मेट के अनुसार, प्राचीन मिस्र में घंटे और समय के हिस्सों की अवधारणा थी, लेकिन मिनट और सेकंड के लिए आज जैसी समय-मापन व्यवस्था के प्रमाण नहीं मिलते। इसलिए यह कहना ज्यादा सही होगा कि पुराने लोग समय के अंतराल और दिन के अलग-अलग हिस्सों का अनुमान लगाते थे, न कि हर स्थिति में आधुनिक घड़ी जैसी सटीकता से समय बताते थे।

घड़ी से पहले इंसान ने प्रकृति को पढ़ना सीखा

पुराने समय की समय-व्यवस्था हमें यह भी बताती है कि इंसान ने अपने आसपास की प्रकृति को कितनी बारीकी से समझा। सूरज की छाया से लेकर रात के तारों तक, पानी के बहाव से लेकर चांद के चक्र तक—प्राकृतिक घटनाएं ही शुरुआती समय-मापन की आधारशिला बनीं। आज मोबाइल की स्क्रीन पर एक सेकंड में समय दिखाई देता है, लेकिन कभी यही जानकारी हासिल करने के लिए इंसान को आसमान की ओर देखना पड़ता था। यानी घड़ी के आने से बहुत पहले इंसान ने समय को देखना, समझना और मापना प्रकृति से ही सीखा था।

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Neelam Saini

Neelam Saini

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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