अरुणाचल प्रदेश की लोहित नदी को ‘रक्त नदी’ भी कहा जाता है। बारिश के दौरान आयरन युक्त मिट्टी और तलछट नदी में पहुंचने से कुछ हिस्सों का पानी लाल-भूरा दिखाई दे सकता है।
लोहित नदी का पानी लाल क्यों दिखाई देता है? जानिए क्या है सच
भारत विविध भौगोलिक परिस्थितियों वाला देश है। हिमालय से निकलने वाली नदियों से लेकर प्रायद्वीपीय नदियों तक, यहां नदियों का स्वरूप और व्यवहार अलग-अलग दिखाई देता है। इन्हीं में अरुणाचल प्रदेश की लोहित नदी भी शामिल है, जिसे अपने कुछ हिस्सों में दिखाई देने वाले लाल-भूरे रंग के कारण बेहद दिलचस्प माना जाता है। भारी बारिश या मानसून के दौरान नदी में आसपास की मिट्टी और तलछट की मात्रा बढ़ सकती है। खासकर आयरन युक्त मिट्टी और खनिजों के नदी में पहुंचने से पानी का रंग कुछ स्थानों पर लाल, नारंगी या लाल-भूरा दिखाई दे सकता है। इसे किसी रहस्यमय घटना के बजाय भूगर्भीय और पर्यावरणीय प्रक्रिया के संदर्भ में समझना ज्यादा उचित है।
कहां बहती है लोहित नदी?
लोहित नदी पूर्वोत्तर भारत के अरुणाचल प्रदेश से होकर बहती है और आगे असम में ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र का हिस्सा बनती है। इसका प्रवाह पूर्वी हिमालय के दुर्गम और पहाड़ी क्षेत्रों से होकर गुजरता है। नदी का जलग्रहण क्षेत्र भारी वर्षा, तीखी ढलानों और सक्रिय भू-क्षरण वाले क्षेत्रों से जुड़ा है। ऐसी भौगोलिक परिस्थितियों में बारिश के दौरान मिट्टी और चट्टानों से निकले बारीक कण नदी में पहुंच सकते हैं। यही वजह है कि नदी का रूप मौसम और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार बदलता हुआ दिखाई दे सकता है।
क्या सचमुच नदी साल में एक बार लाल हो जाती है?
यहां एक जरूरी तथ्य समझना महत्वपूर्ण है। यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि पूरी लोहित नदी हर साल एक निश्चित दिन या एक निश्चित अवधि में पूरी तरह लाल हो जाती है। दरअसल, नदी के कुछ हिस्सों में भारी बारिश के बाद पानी का रंग लाल या लाल-भूरा दिखाई दे सकता है। यह प्रभाव बारिश की तीव्रता, नदी के बहाव, मिट्टी की प्रकृति और तलछट की मात्रा जैसी परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इसलिए “साल में एक बार रंग बदलने वाली नदी” कहना इस प्राकृतिक घटना का आकर्षक वर्णन तो हो सकता है, लेकिन वैज्ञानिक रूप से इसे निश्चित वार्षिक रंग परिवर्तन के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है।
लाल रंग के पीछे क्या है विज्ञान?
जब किसी इलाके में तेज बारिश होती है तो पानी जमीन की ऊपरी परत को काटते हुए अपने साथ मिट्टी और खनिजों के बारीक कण बहाकर नदी तक ले जाता है। यदि इस मिट्टी में आयरन युक्त खनिज मौजूद हों, तो नदी के पानी में उनके कणों की मात्रा बढ़ सकती है। आयरन ऑक्साइड से युक्त तलछट पानी को लाल, नारंगी या भूरा रंग देने में योगदान कर सकती है। भारी बारिश के बाद नदी का तेज बहाव नदी तल और आसपास के क्षेत्रों में जमा तलछट को भी हिला सकता है। इससे पानी में निलंबित कणों की मात्रा बढ़ जाती है और नदी का रंग सामान्य दिनों की तुलना में काफी अलग दिखाई दे सकता है।
फिर इसे ‘रक्त नदी’ क्यों कहा जाता है?
लोहित नदी के साथ “रक्त” से जुड़ा नाम केवल उसके पानी के रंग से संबंधित नहीं है। इस क्षेत्र में नदी और आसपास के प्राकृतिक स्थलों से जुड़ी स्थानीय धार्मिक एवं सांस्कृतिक मान्यताएं भी मौजूद हैं। इसी वजह से नदी के प्राकृतिक लाल-भूरे रंग और स्थानीय परंपराओं ने मिलकर इसके साथ “रक्त नदी” जैसी पहचान को लोकप्रिय बनाया है। उपलब्ध विवरणों में प्राकृतिक भूगोल और स्थानीय मान्यताओं, दोनों का उल्लेख मिलता है।
क्या लाल पानी किसी खतरे का संकेत है?
सिर्फ लाल या लाल-भूरा दिखाई देना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि नदी का पानी जहरीला है या प्रदूषित है। पानी के रंग में बदलाव के पीछे प्राकृतिक तलछट भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। हालांकि, किसी नदी के पानी की वास्तविक गुणवत्ता केवल देखकर तय नहीं की जा सकती। इसके लिए पानी की वैज्ञानिक जांच जरूरी होती है। यही वजह है कि किसी नदी का रंग देखकर तुरंत उसे प्रदूषित या सुरक्षित घोषित करना उचित नहीं है।
सिर्फ लोहित ही नहीं, कई नदियों का रंग बदल सकता है
नदियों के पानी का रंग मौसम, तलछट, खनिज, शैवाल, जल प्रवाह और आसपास की भौगोलिक परिस्थितियों के कारण बदल सकता है।उदाहरण के तौर पर मेघालय की लुखा नदी में सर्दियों के दौरान नीला या गहरा नीला रंग दिखाई देने की वैज्ञानिक रूप से जांच की गई है। अध्ययन में नदी के पानी की रासायनिक परिस्थितियों, तलछट और प्रकाश के प्रकीर्णन जैसे कारकों को इस दृश्य प्रभाव से जोड़ा गया है। इसी तरह 2021 में वाराणसी क्षेत्र में गंगा के पानी के हरे दिखाई देने की घटना के संबंध में वैज्ञानिकों ने शैवाल की वृद्धि को संभावित कारणों में शामिल किया था।
नदी का रंग हमें क्या बताता है?
नदी के रंग में अचानक या मौसमी बदलाव वैज्ञानिकों के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत हो सकते हैं। पानी में तलछट की मात्रा, आसपास के भू-क्षरण, वर्षा और नदी के प्रवाह में होने वाले बदलावों को समझने में ऐसे प्राकृतिक संकेत मदद कर सकते हैं। खासकर पहाड़ी क्षेत्रों में तेज बारिश और भू-क्षरण का नदी पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए नदी के रंग में बदलाव को केवल “कुदरत का चमत्कार” कहकर छोड़ने के बजाय उसके पीछे मौजूद पर्यावरणीय प्रक्रिया को समझना जरूरी है।
सोशल मीडिया के दावों से रहें सावधान
लाल रंग का पानी देखकर सोशल मीडिया पर कई बार इसे “खून की नदी” या किसी रहस्यमय घटना से जोड़ दिया जाता है। लेकिन किसी वायरल तस्वीर या वीडियो के आधार पर वैज्ञानिक निष्कर्ष निकालना सही नहीं है। लोहित नदी के मामले में उपलब्ध जानकारी यह बताती है कि लालिमा का संबंध कई स्थानों पर आयरन युक्त मिट्टी, तलछट, बारिश और भू-क्षरण जैसी प्राकृतिक प्रक्रियाओं से हो सकता है। स्थानीय मान्यताएं इसके सांस्कृतिक महत्व को अलग आयाम देती हैं।
निष्कर्ष
अरुणाचल प्रदेश की लोहित नदी प्रकृति, भूगोल और स्थानीय संस्कृति के अनोखे मेल का उदाहरण है। मानसून और भारी बारिश के दौरान इसके कुछ हिस्सों में पानी का लाल-भूरा दिखाई देना किसी रहस्य से ज्यादा प्राकृतिक भूगर्भीय प्रक्रिया से जुड़ा है। इसलिए यह कहना अधिक सटीक होगा कि लोहित नदी का रंग कुछ मौसमों और परिस्थितियों में बदलता हुआ दिखाई दे सकता है, न कि हर साल निश्चित रूप से पूरी नदी एक ही समय पर लाल हो जाती है। यही फर्क रोचक तथ्य और वैज्ञानिक तथ्य के बीच जरूरी है।