हंगरी की संसद ने 17वां संवैधानिक संशोधन पारित कर राष्ट्रपति तमास शुल्योक को हटाने का रास्ता तैयार कर दिया है। नई सरकार का कहना है कि यह संस्थागत सुधार का हिस्सा है, जबकि विपक्ष इसे सत्ता के केंद्रीकरण की कोशिश बता रहा है। आने वाले दिनों में राष्ट्रपति के अगले कदम पर सबकी नजर रहेगी।
📍 Location: बुडापेस्ट, हंगरी
📰 Date: 14 जुलाई 2026
✍️ Apurva Choudhary
हंगरी की राजनीति में बड़ा संवैधानिक मोड़
हंगरी की संसद ने सोमवार को संविधान का 17वां संशोधन पारित कर राष्ट्रपति तमास शुल्योक को पद से हटाने की प्रक्रिया का मार्ग प्रशस्त कर दिया। यह निर्णय प्रधानमंत्री पीटर माज्यार के नेतृत्व वाली तिस्ज़ा पार्टी के दो-तिहाई बहुमत से पारित हुआ और इसे नई सरकार का अब तक का सबसे बड़ा राजनीतिक कदम माना जा रहा है।
संशोधन में क्या प्रावधान हैं?
संशोधन के तहत राष्ट्रपति तमास शुल्योक और संवैधानिक न्यायालय के प्रमुख पीटर पोल्ट का कार्यकाल समाप्त करने का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा 70 वर्ष से अधिक आयु के संवैधानिक न्यायाधीशों को पद छोड़ना होगा और संसद में लगातार तीन कार्यकाल पूरे कर चुके सांसदों के दोबारा चुनाव लड़ने पर भी रोक लगाने का प्रस्ताव शामिल है।
राष्ट्रपति के सामने क्या विकल्प हैं?
हंगरी के संविधान के अनुसार राष्ट्रपति के पास संशोधन पर हस्ताक्षर करने या उसे संवैधानिक न्यायालय के पास भेजने के लिए पांच दिन का समय है। प्रधानमंत्री पीटर माज्यार ने संकेत दिया है कि यदि संशोधन को न्यायालय भेजा जाता है तो राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। सरकार ने संवैधानिक संकट से बचने के लिए राष्ट्रपति से इस्तीफा देने की भी अपील की है।
विपक्ष ने क्यों जताया विरोध?
पूर्व सत्तारूढ़ फिदेस्ज़ पार्टी ने मतदान से पहले संसद से बहिर्गमन किया। पार्टी का आरोप है कि सरकार इस संशोधन के माध्यम से सार्वजनिक पदाधिकारियों को हटाने की व्यापक शक्तियां अपने हाथ में लेना चाहती है। विपक्ष का कहना है कि यह कदम लोकतांत्रिक संस्थाओं के संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
राजनीतिक पृष्ठभूमि
अप्रैल 2026 के चुनाव में तिस्ज़ा पार्टी ने विक्टर ओर्बान की फिदेस्ज़ पार्टी को हराकर सत्ता हासिल की थी। ओर्बान के लंबे शासनकाल के दौरान कई संवैधानिक संस्थाओं में व्यापक बदलाव किए गए थे। नई सरकार का दावा है कि वर्तमान संशोधन संस्थागत सुधार और जवाबदेही सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लाया गया है।
विशेषज्ञों की राय
संवैधानिक मामलों के जानकारों का मानना है कि यह संशोधन हंगरी की राजनीति में दूरगामी प्रभाव छोड़ सकता है। समर्थकों का तर्क है कि इससे संस्थागत सुधार होंगे, जबकि आलोचकों का कहना है कि इससे राजनीतिक ध्रुवीकरण और बढ़ सकता है।
आगे क्या होगा?
अब सबकी निगाहें राष्ट्रपति तमास शुल्योक के अगले कदम पर हैं। यदि वे संशोधन पर हस्ताक्षर करते हैं तो नए संवैधानिक प्रावधान तुरंत प्रभावी हो सकते हैं। वहीं यदि मामला संवैधानिक न्यायालय पहुंचता है तो देश में नया संवैधानिक विवाद खड़ा हो सकता है।
हंगरी संवैधानिक संशोधन केवल राष्ट्रपति पद से जुड़ा मामला नहीं है, बल्कि यह देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं, संवैधानिक व्यवस्था और राजनीतिक भविष्य पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है। आने वाले दिनों में राष्ट्रपति और संवैधानिक न्यायालय की भूमिका इस पूरे घटनाक्रम की दिशा तय करेगी।