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यूएन के नए विश्व मानचित्र पर भारत की आपत्ति, अरुणाचल और अक्साई चिन के चित्रण पर उठाए सवाल

Harish Qureshi • 2026-09-09 12:50:34
यूएन के नए विश्व मानचित्र पर भारत की आपत्ति, अरुणाचल और अक्साई चिन के चित्रण पर उठाए सवाल

संयुक्त राष्ट्र के नए विश्व मानचित्र में अरुणाचल प्रदेश और अक्साई चिन के चित्रण पर भारत ने आपत्ति दर्ज कराई है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि समान क्षेत्रफल वाले मानचित्रों का समर्थन किसी खास नक्शे की मंजूरी नहीं है।


नई दिल्ली | 9 सितंबर 2026

Mohd Haris


नई दिल्ली। संयुक्त राष्ट्र के नए विश्व मानचित्र में अरुणाचल प्रदेश और अक्साई चिन के चित्रण को लेकर भारत ने आपत्ति दर्ज कराई है। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में समान क्षेत्रफल वाले विश्व मानचित्रों के सिद्धांत का समर्थन किया था, लेकिन इसका अर्थ किसी खास मानचित्र या उसके सीमांकन को स्वीकार करना नहीं है।


विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि भारत ने मानचित्र में सामने आई विसंगतियों को संबंधित पक्षों के सामने उठाया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संयुक्त राष्ट्र महासभा का प्रस्ताव किसी निजी संस्था या किसी विशेष मानचित्र का समर्थन नहीं करता।


नए मानचित्र में क्या दिखा


संयुक्त राष्ट्र की ओर से जारी किए गए जिस मानचित्र को लेकर विवाद उठा है, वह पहली बार 1 जुलाई को सामने आया था। रिपोर्ट के मुताबिक, इस मानचित्र में अरुणाचल प्रदेश को भारत के हिस्से के बजाय अलग क्षेत्र के तौर पर दिखाया गया है। इसमें अरुणाचल की नागालैंड के साथ सीमा भी नहीं दिखाई गई है।


मानचित्र में अक्साई चिन को भी अलग क्षेत्र के रूप में दर्शाया गया है। उसके पश्चिमी हिस्से को भारत और पूर्वी हिस्से को चीन से जुड़ा हुआ दिखाया गया है। संयुक्त राष्ट्र की ओर से इस चित्रण में बदलाव की वजह सार्वजनिक तौर पर स्पष्ट नहीं की गई है।


भारत का आधिकारिक रुख


भारत लंबे समय से अरुणाचल प्रदेश को अपने अभिन्न क्षेत्र का हिस्सा बताता रहा है। नई दिल्ली अक्साई चिन को भी लद्दाख का हिस्सा मानती है और जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख को लेकर अपने आधिकारिक क्षेत्रीय दावे पर कायम है।


विदेश मंत्रालय ने इस पूरे मामले में एक अहम अंतर स्पष्ट किया है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में समान क्षेत्रफल वाले मानचित्रों के सिद्धांत का समर्थन किया, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारत ने संयुक्त राष्ट्र के सामने उपलब्ध हर मानचित्र को स्वीकार कर लिया है।


रणधीर जायसवाल ने कहा कि प्रस्ताव का मकसद दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों को उनके वास्तविक सापेक्ष क्षेत्रफल के आधार पर अधिक संतुलित तरीके से दिखाना है। भारत ने इसी सिद्धांत का समर्थन किया था।


संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव क्या है


संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 4 सितंबर को अफ्रीकी समूह की ओर से समर्थित ‘करैक्ट द मैप’ नाम के प्रस्ताव को मंजूरी दी। इसका प्रमुख उद्देश्य विश्व के विभिन्न क्षेत्रों, विशेष रूप से अफ्रीका, के अधिक समान और संतुलित मानचित्रण को बढ़ावा देना है। भारत ने भी इस प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया था।


यह प्रस्ताव बाध्यकारी प्रकृति का नहीं है। इसका केंद्र मानचित्र प्रक्षेपण से जुड़ा मुद्दा है, न कि भारत और चीन के बीच किसी क्षेत्रीय विवाद का फैसला करना। इसलिए प्रस्ताव के समर्थन और किसी खास मानचित्र के सीमांकन को स्वीकार करने के बीच अंतर रखना जरूरी है।


मानचित्र विवाद की पृष्ठभूमि


पारंपरिक विश्व मानचित्रों में लंबे समय से मर्केटर प्रक्षेपण का इस्तेमाल होता रहा है। इस पद्धति में भूमध्य रेखा से दूर स्थित क्षेत्रों का आकार वास्तविक सापेक्ष क्षेत्रफल की तुलना में बड़ा दिखाई दे सकता है।


समान क्षेत्रफल वाले नए मानचित्र प्रक्षेपण इसी समस्या को कम करने का प्रयास करते हैं। वर्ष 2018 में पेश किए गए इक्वल अर्थ प्रक्षेपण में महाद्वीपों के क्षेत्रफल को अधिक वास्तविक अनुपात में दिखाने पर जोर दिया गया है। इसके बदले महाद्वीपों की आकृति में कुछ बदलाव दिखाई दे सकते हैं।


जम्मू-कश्मीर को लेकर क्या है स्थिति


नए मानचित्र में जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में एक बिंदीदार रेखा भी दिखाई गई है। संयुक्त राष्ट्र के फुटनोट में इसे भारत और पाकिस्तान के बीच सहमत नियंत्रण रेखा का लगभग प्रतिनिधित्व बताया गया है। साथ ही यह टिप्पणी भी दी गई है कि जम्मू-कश्मीर की अंतिम स्थिति पर संबंधित पक्षों के बीच सहमति नहीं बनी है।


यह विवरण भी इस बात को रेखांकित करता है कि मानचित्रों में राजनीतिक और क्षेत्रीय विवादों को दर्शाने के लिए अलग-अलग संकेत और टिप्पणियां इस्तेमाल होती हैं। इसलिए किसी मानचित्र में मौजूद रेखा को अपने आप अंतिम अंतरराष्ट्रीय सीमा मान लेना उचित नहीं होगा।


भारत की आपत्ति क्यों महत्वपूर्ण है


भारत के लिए मानचित्र केवल भौगोलिक प्रस्तुति का विषय नहीं है। अरुणाचल प्रदेश और अक्साई चिन से जुड़े क्षेत्रीय दावे भारत-चीन सीमा विवाद के

संवेदनशील हिस्से हैं। ऐसे में किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था के मानचित्र में इन क्षेत्रों का अलग ढंग से चित्रण राजनयिक स्तर पर गंभीर प्रतिक्रिया पैदा कर सकता है

भारत ने इसी वजह से प्रस्ताव और मानचित्र को अलग-अलग मुद्दों के रूप में रखा है। नई दिल्ली का कहना है कि समान क्षेत्रफल वाले मानचित्रों की अवधारणा का समर्थन भारत की क्षेत्रीय स्थिति में किसी बदलाव का संकेत नहीं है।


क्या संयुक्त राष्ट्र ने कोई स्पष्टीकरण दिया


उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, मानचित्र में अरुणाचल प्रदेश और अक्साई चिन के चित्रण में बदलाव का संयुक्त राष्ट्र की ओर से कोई स्पष्ट कारण सार्वजनिक नहीं किया गया है। भारत ने इन विसंगतियों को संबंधित लोगों के सामने उठाने की जानकारी दी है।


इस स्तर पर यह कहना उचित नहीं होगा कि मानचित्र में हुआ चित्रण संयुक्त राष्ट्र की ओर से भारत के क्षेत्रीय दावे पर कोई औपचारिक निर्णय है। उपलब्ध जानकारी में ऐसा कोई निर्णय सामने नहीं आया है।


भारत-चीन संबंधों के संदर्भ में असर


अरुणाचल प्रदेश और अक्साई चिन दोनों भारत-चीन सीमा विवाद के संवेदनशील हिस्से हैं। इसलिए किसी अंतरराष्ट्रीय मानचित्र में इनका अलग चित्रण राजनयिक संवाद और सार्वजनिक विमर्श में असर डाल सकता है।


हालांकि मौजूदा विवाद को भारत-चीन सीमा पर किसी नए घटनाक्रम के रूप में पेश करना सही नहीं होगा। फिलहाल उपलब्ध जानकारी का केंद्र संयुक्त राष्ट्र के मानचित्र का चित्रण और भारत की उस पर दर्ज आपत्ति है।


आगे क्या होगा


अब प्रमुख सवाल यह है कि संयुक्त राष्ट्र से जुड़े मानचित्रों में इन क्षेत्रीय चित्रणों को लेकर आगे कोई संशोधन या स्पष्टीकरण सामने आता है या नहीं। भारत ने पहले ही संबंधित पक्षों के सामने विसंगतियां उठाने की बात कही है।


समान क्षेत्रफल वाले मानचित्रों को लेकर वैश्विक चर्चा आगे बढ़ने के साथ भारत की प्राथमिकता अपने आधिकारिक क्षेत्रीय मानचित्र और संप्रभुता संबंधी रुख को स्पष्ट रखना होगी। मौजूदा घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यही है कि भारत ने मानचित्र प्रक्षेपण के सिद्धांत का समर्थन किया है, लेकिन अरुणाचल प्रदेश और अक्साई चिन के मौजूदा चित्रण को स्वीकार करने की बात नहीं कही है।


निष्कर्ष


संयुक्त राष्ट्र के नए विश्व मानचित्र को लेकर उठा विवाद मूल रूप से दो अलग मुद्दों को सामने लाता है। पहला, दुनिया के मानचित्रों में क्षेत्रफल के अधिक संतुलित प्रतिनिधित्व की कोशिश। दूसरा, भारत-चीन सीमा से जुड़े संवेदनशील क्षेत्रों का सही क्षेत्रीय चित्रण।


भारत ने पहले मुद्दे का समर्थन किया है, लेकिन दूसरे मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट रखा है। अब निगाह इस बात पर रहेगी कि संबंधित मानचित्रों में कोई संशोधन या आधिकारिक स्पष्टीकरण आता है या नहीं।


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Harish Qureshi

Harish Qureshi

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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