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संयुक्त राष्ट्र ने दुनिया के नक्शे को लेकर बड़ा फैसला लिया, भारत ने Equal Earth पर जताया अलग रुख
Wasi Siddiqui
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2026-09-08 15:24:22
संयुक्त राष्ट्र ने महाद्वीपों के वास्तविक क्षेत्रफल को बेहतर दिखाने वाले मानचित्रों को बढ़ावा दिया। भारत ने प्रस्ताव का समर्थन किया, लेकिन किसी एक मानचित्र प्रोजेक्शन को अनिवार्य करने से इनकार किया।
📍 नई दिल्ली
🗓️ 08 सितंबर 2026
✍️ Wasi Siddiqui
दुनिया के नक्शे पर संयुक्त राष्ट्र का बड़ा फैसला
दुनिया को देखने का हमारा पारंपरिक नक्शा अब सवालों के घेरे में है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 4 सितंबर 2026 को “Correct the Map” नामक प्रस्ताव को मंजूरी दी, जिसका मकसद महाद्वीपों के वास्तविक क्षेत्रफल को ज्यादा संतुलित और वैज्ञानिक तरीके से दिखाने वाले मानचित्र प्रोजेक्शन को बढ़ावा देना है। प्रस्ताव के पक्ष में 164 देशों ने मतदान किया, जबकि 1 देश ने विरोध किया और 6 देश मतदान से अलग रहे।
इस फैसले को कई जगह “नया विश्व नक्शा” कहा जा रहा है, लेकिन इसकी सही समझ जरूरी है। संयुक्त राष्ट्र ने दुनिया के हर नक्शे को एक ही डिजाइन में बदलने का आदेश नहीं दिया है। प्रस्ताव मुख्य तौर पर शिक्षा, जागरूकता और भौगोलिक प्रतिनिधित्व के संदर्भ में क्षेत्रफल को ज्यादा सही दिखाने वाले Equal-area प्रोजेक्शन के इस्तेमाल को प्रोत्साहित करता है।
विवाद मर्केटर प्रोजेक्शन को लेकर क्यों है
दुनिया के स्कूलों, किताबों और डिजिटल माध्यमों में लंबे समय से Mercator Projection का इस्तेमाल होता आया है। इसे फ्लेमिश मानचित्रकार Gerardus Mercator ने 1569 में समुद्री नेविगेशन के लिए विकसित किया था।
इस प्रोजेक्शन की खासियत दिशा और कोणों को सुरक्षित रखने में थी। समुद्री यात्राओं के लिए यह उपयोगी साबित हुआ। लेकिन इसके साथ एक अहम सीमा भी है। पृथ्वी की गोल सतह को सपाट नक्शे पर दिखाते समय क्षेत्रफल में विकृति आती है। ध्रुवों के करीब स्थित भूभाग अपेक्षाकृत ज्यादा बड़ा दिखाई देता है।
इसी वजह से Greenland और Africa के बीच नक्शे पर दिखने वाला अंतर वास्तविक क्षेत्रफल से काफी अलग नजर आता है। वास्तविकता में Africa का क्षेत्रफल लगभग 30.4 million वर्ग किलोमीटर है, जबकि Greenland करीब 2.17 million वर्ग किलोमीटर में फैला है। यानी Africa लगभग 14 गुना बड़ा है।
Equal Earth Projection क्या है
Equal Earth एक Equal-area cartographic projection है। इसका उद्देश्य महाद्वीपों और बड़े भूभागों के क्षेत्रफल का आपसी अनुपात ज्यादा सही बनाए रखना है।
इसमें Africa, South America और अन्य भूमध्यरेखीय क्षेत्रों का आकार Mercator की तुलना में वास्तविक क्षेत्रफल के करीब दिखाई देता है। दूसरी तरफ Greenland, Canada और उत्तरी यूरोप जैसे उच्च अक्षांश वाले क्षेत्र अपेक्षाकृत छोटे नजर आते हैं।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि Equal Earth हर उद्देश्य के लिए सबसे सही प्रोजेक्शन है। संयुक्त राष्ट्र की बहस में भी यह स्पष्ट किया गया कि पृथ्वी की गोल सतह को सपाट नक्शे पर बिना किसी विकृति के दिखाना संभव नहीं है। अलग-अलग प्रोजेक्शन अलग-अलग जरूरतों के लिए बनाए जाते हैं।
संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव कैसे पास हुआ
“Correct the Map” पहल का नेतृत्व Togo और African Union से जुड़े प्रयासों ने किया। प्रस्ताव का उद्देश्य महाद्वीपों के क्षेत्रफल की प्रस्तुति में लंबे समय से मौजूद विकृतियों को कम करना था।
संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रस्ताव A/80/L.104 पर मतदान हुआ। आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक प्रस्ताव को 164 वोट मिले, 1 देश ने विरोध किया और 6 देशों ने मतदान से परहेज किया।
संयुक्त राष्ट्र के Office of the Special Adviser on Africa ने इसे अफ्रीका के नेतृत्व में चली पहल के रूप में दर्ज किया है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार प्रस्ताव सरकारों, स्कूलों और तकनीकी संस्थानों को ऐसे मानचित्रों के इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित करता है जो महाद्वीपों के वास्तविक आकार को बेहतर तरीके से दर्शाते हैं।
भारत का समर्थन, लेकिन एक अहम शर्त
भारत ने प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया। हालांकि भारत ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि उसका समर्थन किसी एक खास मानचित्र प्रोजेक्शन के लिए नहीं है।
संयुक्त राष्ट्र में भारत ने कहा कि Equal-area approaches उन परिस्थितियों में उपयोगी हैं, जहां महाद्वीपों और भूभागों के वास्तविक क्षेत्रफल की तुलना प्राथमिक उद्देश्य हो। साथ ही भारत ने जोर दिया कि अलग-अलग प्रोजेक्शन अलग-अलग कार्टोग्राफिक जरूरतों के लिए इस्तेमाल होते हैं।
भारत ने Equal Earth को एकमात्र स्वीकृत प्रोजेक्शन मानने से दूरी बनाई। उसका रुख यह रहा कि देशों, संस्थानों और मानचित्र विशेषज्ञों को अपने उद्देश्य के हिसाब से उपयुक्त प्रोजेक्शन चुनने की गुंजाइश रहनी चाहिए।
भारत ने सीमाओं को लेकर क्या कहा
इस पूरे मामले में भारत के लिए केवल महाद्वीपों का आकार ही मुद्दा नहीं है। मानचित्रों में भारत की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं और संवेदनशील क्षेत्रों का सही चित्रण भी अहम है।
भारत ने संयुक्त राष्ट्र में स्पष्ट किया कि प्रस्ताव को देशों की संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक सीमाओं में बदलाव के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। भारत का आधिकारिक रुख यह है कि उसके क्षेत्र का मानचित्रण भारतीय आधिकारिक मानचित्र के अनुरूप होना चाहिए।
यह बिंदु इसलिए अहम है क्योंकि किसी Equal-area projection में महाद्वीपों के क्षेत्रफल को सही रखना और किसी देश की राजनीतिक सीमा का सही चित्रण, दो अलग कार्टोग्राफिक प्रश्न हैं।
क्या Mercator नक्शा अब खत्म हो जाएगा
ऐसा कहना सही नहीं होगा।
संयुक्त राष्ट्र का प्रस्ताव Mercator Projection पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाता। आधिकारिक बहस में भी यह स्पष्ट किया गया कि Mercator समुद्री नेविगेशन के लिए उपयोगी है और प्रस्ताव का उद्देश्य उसके हर इस्तेमाल को समाप्त करना नहीं है।
मुद्दा मुख्य तौर पर उस संदर्भ का है जहां क्षेत्रफल की तुलना महत्वपूर्ण होती है। स्कूल शिक्षा, भूगोल की किताबों और सामान्य विश्व मानचित्रों में ऐसी प्रोजेक्शन उपयोगी मानी जाती हैं जो देशों और महाद्वीपों के वास्तविक क्षेत्रफल के अनुपात को बेहतर तरीके से दिखाती हैं।
अमेरिका ने विरोध क्यों किया
संयुक्त राष्ट्र महासभा में अमेरिका ने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया। आधिकारिक बहस में अमेरिकी प्रतिनिधि ने इसे वैचारिक परियोजना के रूप में देखा और तर्क दिया कि संयुक्त राष्ट्र को ज्यादा गंभीर वैश्विक चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
इसके विपरीत समर्थक देशों का तर्क है कि मानचित्र केवल भौगोलिक जानकारी देने का माध्यम नहीं हैं। वे शिक्षा और दुनिया की सामूहिक समझ को भी प्रभावित करते हैं।
इस बहस में दोनों पक्षों के तर्कों को अलग रखना जरूरी है। प्रस्ताव महाद्वीपों के क्षेत्रफल की प्रस्तुति से जुड़ा है। इसे किसी देश की राजनीतिक सीमा बदलने वाले फैसले के रूप में देखना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा। संयुक्त राष्ट्र की बहस में कई देशों ने इस सीमा को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया।
दुनिया का एकदम सही नक्शा क्यों संभव नहीं
पृथ्वी गोल है और कागज या स्क्रीन सपाट। इस बुनियादी समस्या के कारण किसी भी विश्व मानचित्र में कुछ न कुछ विकृति रहेगी।
एक प्रोजेक्शन क्षेत्रफल को ज्यादा सटीक रखता है। दूसरा आकार को। कोई दिशा और कोण को प्राथमिकता देता है। कोई दूरी को।
इसलिए “सबसे सही विश्व नक्शा” कहना संदर्भ के बिना अधूरा है। असल सवाल यह है कि नक्शे का इस्तेमाल किस उद्देश्य के लिए किया जा रहा है।
यही वजह है कि भारत ने भी संयुक्त राष्ट्र में किसी एक प्रोजेक्शन को हर परिस्थिति के लिए अनिवार्य बनाने की जरूरत से असहमति जताई।
इस फैसले का असर कहां दिख सकता है
फिलहाल इसका सबसे बड़ा असर शिक्षा, जागरूकता और सामान्य भौगोलिक प्रस्तुति के क्षेत्र में दिखने की उम्मीद है। African Union ने स्कूलों, संस्थानों, प्रकाशकों और डिजिटल प्लेटफॉर्मों से अधिक सटीक क्षेत्रफल दिखाने वाले मानचित्रों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की अपील की है।
लेकिन Google Maps जैसी डिजिटल सेवाओं, समुद्री नेविगेशन और अन्य तकनीकी प्रणालियों में इस्तेमाल होने वाले हर नक्शे का तत्काल बदल जाना इस प्रस्ताव का सीधा परिणाम नहीं है।
असली बदलाव नक्शे से ज्यादा नजरिए का है
संयुक्त राष्ट्र का फैसला दुनिया की भौगोलिक वास्तविकता नहीं बदलता। Africa पहले भी उतना ही बड़ा था और Greenland पहले भी उतना ही छोटा था।
बदलाव इस बात में है कि इन क्षेत्रों को सपाट नक्शे पर किस अनुपात में दिखाया जाता है।
इसलिए “नया नक्शा” कहने से ज्यादा सटीक बात यह है कि संयुक्त राष्ट्र ने क्षेत्रफल की ज्यादा संतुलित कार्टोग्राफिक प्रस्तुति को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रोत्साहन दिया है। भारत ने इसका समर्थन किया है, लेकिन साथ ही यह साफ किया है कि किसी एक प्रोजेक्शन को हर इस्तेमाल के लिए अंतिम मानक नहीं बनाया जाना चाहिए।
आगे क्या होगा
अब असली परीक्षा इसके क्रियान्वयन की होगी। सरकारों, शिक्षा संस्थानों, प्रकाशकों और डिजिटल प्लेटफॉर्मों को अपने-अपने इस्तेमाल और तकनीकी जरूरत के हिसाब से फैसला लेना होगा।
सबसे अहम बात यह है कि मानचित्र को राजनीतिक दावे और वैज्ञानिक कार्टोग्राफी के बीच अंतर बनाए रखते हुए देखा जाए। संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी से देशों की अंतरराष्ट्रीय सीमाएं नहीं बदलतीं। प्रस्ताव का दायरा मुख्य तौर पर दुनिया के महाद्वीपों और भूभागों के क्षेत्रफल को ज्यादा सटीक ढंग से प्रस्तुत करने तक सीमित है।
दुनिया का नक्शा इसलिए नहीं बदल रहा कि धरती बदल गई है। बदलाव उस तरीके में है, जिससे हम धरती को सपाट सतह पर देखते हैं। यही इस पूरे विवाद का सबसे अहम तथ्य है।
Wasi Siddiqui
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक,
अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।