पश्चिम एशिया में ईंधन आपूर्ति प्रभावित होने के बीच भारत केन्या का प्रमुख पेट्रोलियम सप्लायर बन गया है। भारतीय रिफाइनरियों ने यूएई और सऊदी अरब से खाली हुई सप्लाई में जगह बनाई।
लोकेशन: नई दिल्ली, भारत
तारीख: 27अगस्त 2026
बायलाइन:Mohd Naved
भारत की पहचान लंबे समय से कच्चे तेल के बड़े आयातक देश के तौर पर रही है। देश अपनी जरूरत का ९० प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। लेकिन रिफाइनिंग के मोर्चे पर तस्वीर अलग है। भारत के पास इतनी बड़ी रिफाइनिंग क्षमता है कि वह आयातित कच्चे तेल को पेट्रोल, डीजल, जेट फ्यूल और दूसरे पेट्रोलियम उत्पादों में बदलकर दुनिया के अलग-अलग बाजारों को निर्यात करता है।
अब इसी क्षमता का असर केन्या के बाजार में दिखाई दे रहा है। उपलब्ध शिपिंग और कमोडिटी डेटा के मुताबिक भारत ने केन्या को पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति में संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब को पीछे छोड़ दिया है। यह बदलाव ऐसे समय आया है जब पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और समुद्री व्यापार मार्गों में व्यवधान ने पारंपरिक ईंधन सप्लाई व्यवस्था पर दबाव बढ़ाया है।
केन्या लंबे समय से खाड़ी देशों से पेट्रोलियम उत्पाद हासिल करता रहा है। सऊदी अरामको, अबू धाबी की एडीएनओसी और अमीरात नेशनल ऑयल कंपनी जैसे आपूर्तिकर्ताओं की भूमिका वहां महत्वपूर्ण रही है। लेकिन पश्चिम एशिया में परिवहन और सप्लाई नेटवर्क पर दबाव बढ़ने के बाद केन्या ने वैकल्पिक स्रोतों की तरफ रुख किया।
कमोडिटी डेटा फर्म केप्लर और ईओए से जुड़े आंकड़ों के हवाले से सामने आई जानकारी के अनुसार भारतीय सप्लाई में जनवरी से अगस्त के बीच लगातार इजाफा हुआ। दूसरी तरफ यूएई से केन्या जाने वाली पेट्रोलियम उत्पादों की मात्रा में तेज गिरावट दर्ज हुई।
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक जनवरी में यूएई से केन्या को करीब ९० हजार बैरल प्रतिदिन पेट्रोलियम उत्पाद मिल रहे थे। अगस्त तक यह मात्रा करीब १५ हजार बैरल प्रतिदिन रह गई। इस कमी के बीच भारतीय रिफाइनरियों से जाने वाले कार्गो में बढ़ोतरी हुई।
ऊर्जा अर्थशास्त्री अनस अलहज्जी ने केप्लर के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा है कि भारत ने केन्या के लिए गैसोलीन, डीजल, जेट फ्यूल और फ्यूल ऑयल की सप्लाई में यूएई और सऊदी अरब की जगह ले ली है। यह दावा स्वतंत्र रूप से प्रकाशित शिपिंग डेटा के रुझान से भी मेल खाता है।
भारत के लिए यह उपलब्धि केवल एक देश को ज्यादा ईंधन बेचने तक सीमित नहीं है। यह वैश्विक रिफाइंड फ्यूल बाजार में भारतीय रिफाइनरियों की बढ़ती भूमिका को दिखाती है।
पेट्रोलियम मंत्रालय के मुताबिक भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा तेल रिफाइनर और एशिया का दूसरा सबसे बड़ा रिफाइनर है। देश में २२ परिचालन रिफाइनरियां हैं और कुल स्थापित रिफाइनिंग क्षमता करीब २५८.१ मिलियन टन सालाना है। वित्त वर्ष २०२५-२६ में भारत ने करीब ६१.५ मिलियन टन पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात किया।
यानी भारत का मॉडल केवल कच्चे तेल के आयात और घरेलू खपत तक सीमित नहीं है। भारत अंतरराष्ट्रीय बाजार से कच्चा तेल खरीदकर उसे रिफाइन करता है और फिर तैयार पेट्रोलियम उत्पादों को दूसरे देशों में भेजता है।
गुजरात के जामनगर में स्थित रिलायंस का रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स इस क्षमता का सबसे बड़ा उदाहरण है। भारत की बड़ी रिफाइनरियां अलग-अलग ग्रेड के कच्चे तेल को प्रोसेस कर कई तरह के ईंधन तैयार करने में सक्षम हैं।
केन्या में बढ़ती सप्लाई भारत के व्यापक अफ्रीकी निर्यात रुझान का हिस्सा है। ऊर्जा अर्थशास्त्री अनस अलहज्जी के मुताबिक जुलाई में अफ्रीका को भारत के पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात सालाना आधार पर ६६ प्रतिशत बढ़कर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा।
इस दौरान भारत के वैश्विक पेट्रोलियम उत्पाद निर्यात में भी तेज उछाल दर्ज हुआ। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक जुलाई २०२६ में भारत का पेट्रोलियम उत्पाद निर्यात सालाना आधार पर ६७.६४ प्रतिशत बढ़ा और करीब ४.१३ अरब डॉलर से बढ़कर ६.९२ अरब डॉलर हो गया।
यहां एक जरूरी फर्क समझना अहम है। केन्या को भारत की कुल निर्यात वृद्धि में पेट्रोलियम उत्पादों की बड़ी भूमिका रही है, लेकिन केन्या के लिए भारत की कुल निर्यात वृद्धि को पूरी तरह पेट्रोलियम के खाते में डालना सही नहीं होगा। जुलाई में केन्या को भारत का कुल निर्यात सालाना आधार पर १५१.४१ प्रतिशत बढ़ा था। यह आंकड़ा सभी उत्पाद श्रेणियों को शामिल करता है।
भारत और केन्या के बीच व्यापारिक रिश्ते पहले से मजबूत रहे हैं। विदेश मंत्रालय के अप्रैल २०२६ के दस्तावेज के मुताबिक वित्त वर्ष २०२४-२५ में दोनों देशों के बीच कुल व्यापार करीब ३.४५ अरब डॉलर रहा। इसमें भारत का केन्या को निर्यात करीब ३.१३ अरब डॉलर और केन्या से भारत का आयात करीब ३१८.७४ मिलियन डॉलर था।
भारत से केन्या जाने वाले प्रमुख उत्पादों में पेट्रोलियम उत्पादों के अलावा दवाएं, मशीनरी, अनाज, चीनी और कन्फेक्शनरी उत्पाद, प्लास्टिक, वाहन, विद्युत उपकरण, जैविक रसायन और कागज शामिल हैं। इससे साफ है कि पेट्रोलियम दोनों देशों के व्यापारिक रिश्ते का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन पूरा रिश्ता केवल ऊर्जा कारोबार पर आधारित नहीं है।
केन्या के पेट्रोलियम आयात में खाड़ी देशों की भूमिका लंबे समय से प्रभावशाली रही है। विश्व बैंक के व्यापार आंकड़ों के अनुसार २०२३ में केन्या ने गैर-कच्चे पेट्रोलियम उत्पादों के आयात पर करीब ४.३२ अरब डॉलर खर्च किए थे। उस साल यूएई से आयात करीब २.६१ अरब डॉलर और सऊदी अरब से करीब ६९९ मिलियन डॉलर था। भारत से आयात करीब २८४ मिलियन डॉलर था।
इस पुराने आंकड़े और मौजूदा स्थिति की तुलना बदलाव की रफ्तार समझने में मदद करती है। हालांकि २०२३ और २०२६ के आंकड़ों को सीधे एक ही आधार पर तुलना नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि मौजूदा आंकड़े अलग अवधि और शिपिंग ट्रैकिंग डेटा पर आधारित हैं।
केन्या के आधिकारिक आर्थिक सर्वेक्षण में भी २०२५ के दौरान भारत से पेट्रोलियम से जुड़े कुछ आयात, खासकर प्रीमियम मोटर स्पिरिट, में वृद्धि का उल्लेख है। उसी रिपोर्ट में यूएई से प्रीमियम मोटर स्पिरिट के आयात में गिरावट दर्ज की गई थी।
मौजूदा बदलाव को पश्चिम एशिया की भू-राजनीतिक स्थिति से अलग करके देखना मुश्किल है। संघर्ष के कारण तेल और ईंधन की समुद्री आवाजाही पर जोखिम बढ़ा है। इसका असर उन देशों पर अधिक पड़ा है जो कुछ सीमित आपूर्तिकर्ताओं और समुद्री मार्गों पर निर्भर हैं।
केन्या में अप्रैल २०२६ के दौरान ईंधन कीमतों में भी तेज वृद्धि हुई थी। वहां पेट्रोल की कीमत १६.१ प्रतिशत बढ़कर २०६.९७ केन्याई शिलिंग प्रति लीटर और डीजल २४.२ प्रतिशत बढ़कर २०६.८४ शिलिंग प्रति लीटर पहुंच गया था। केन्या की ऊर्जा एवं पेट्रोलियम नियामक संस्था ने आयातित पेट्रोलियम उत्पादों की लागत में ६८.७ प्रतिशत वृद्धि को कीमत बढ़ने का प्रमुख कारण बताया था।
इस पृष्ठभूमि में भारत जैसे बड़े रिफाइनिंग केंद्र से वैकल्पिक सप्लाई मिलना केन्या के लिए अहम हो गया।
यहां सावधानी जरूरी है। मौजूदा स्थिति को भारत की स्थायी बाजार हिस्सेदारी मानना अभी जल्दबाजी होगी।
भारत की बढ़त का एक बड़ा कारण पश्चिम एशिया में सप्लाई व्यवधान है। यदि पारंपरिक समुद्री मार्ग सामान्य होते हैं और खाड़ी देशों से निर्यात फिर तेज होता है, तो केन्या के आयात का हिस्सा दोबारा बदल सकता है।
इसके अलावा भारत की अपनी लागत संरचना भी अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर है। कच्चे तेल की कीमत, फ्रेट लागत, रिफाइनिंग मार्जिन, प्रतिबंधों से जुड़े नियम और घरेलू ईंधन की मांग, सभी निर्यात की क्षमता को प्रभावित करते हैं।
फिर भी मौजूदा घटनाक्रम यह साबित करता है कि संकट के समय भारत के पास तेजी से दूसरे बाजारों की मांग पूरी करने की रिफाइनिंग और लॉजिस्टिक क्षमता मौजूद है।
आने वाले महीनों में तीन संकेत सबसे अहम होंगे। पहला, केन्या में भारतीय पेट्रोलियम कार्गो की मात्रा कितनी बनी रहती है। दूसरा, यूएई और सऊदी अरब से सप्लाई कितनी तेजी से लौटती है। तीसरा, अफ्रीकी बाजार में भारतीय रिफाइंड फ्यूल की हिस्सेदारी संकट के बाद भी कितनी कायम रहती है।
भारत के लिए यह बाजार विविधीकरण का अवसर है। यूरोप में रूसी कच्चे तेल से बने रिफाइंड उत्पादों पर नियम सख्त होने के बाद भारतीय कार्गो के लिए अफ्रीका समेत दूसरे बाजारों की अहमियत बढ़ी है। इसी वजह से भारतीय रिफाइनरियों की निर्यात रणनीति में अफ्रीकी बाजार का वजन बढ़ता दिखाई दे रहा है।
भारत अभी भी ऊर्जा सुरक्षा के मामले में कच्चे तेल के आयात पर भारी निर्भर है। इसलिए केन्या को पेट्रोलियम उत्पाद बेचने की उपलब्धि को भारत के कच्चे तेल आयात से अलग समझना चाहिए।
असल बदलाव रिफाइनिंग वैल्यू चेन में है। भारत विदेश से कच्चा तेल खरीदता है, उसे घरेलू रिफाइनरियों में प्रोसेस करता है और तैयार उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचता है। यही क्षमता मौजूदा पश्चिम एशियाई संकट में भारत को एक वैकल्पिक सप्लायर के तौर पर सामने ला रही है।
केन्या का मामला इसी बदलाव का ताजा उदाहरण है। यूएई और सऊदी अरब जैसे पारंपरिक आपूर्तिकर्ताओं की मौजूदगी के बावजूद भारत ने संकट के दौर में बाजार में जगह बनाई है। अब असली परीक्षा यह होगी कि संकट खत्म होने के बाद भी भारतीय रिफाइनरियां इस बाजार में अपनी हिस्सेदारी कितनी कायम रख पाती हैं।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।