पश्चिम एशिया संकट के बीच भारत का ऊर्जा आयात बिल तेजी से बढ़ा है। अप्रैल-जुलाई 2026-27 में नेट ऑयल-गैस इम्पोर्ट बिल 40.3 प्रतिशत बढ़कर 57.8 अरब डॉलर हुआ। क्रूड आयात बिल भी 56.5 प्रतिशत बढ़ा। महंगी ऊर्जा से व्यापार घाटे, महंगाई और विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ने की आशंका बनी हुई है।
लोकेशन: नई दिल्ली
तारीख: 21 अगस्त 2026
बाय: Mohd Naved
भारत के लिए पश्चिम एशिया का युद्ध केवल कूटनीतिक या सुरक्षा संकट नहीं है। इसका सीधा असर ऊर्जा खरीद और विदेशी मुद्रा पर पड़ रहा है। अप्रैल-जुलाई 2026-27 में देश का नेट ऑयल और गैस इम्पोर्ट बिल 40.3 प्रतिशत बढ़कर 57.8 अरब डॉलर पहुंच गया। इसी दौरान क्रूड ऑयल का आयात बिल 56.5 प्रतिशत बढ़कर 63.4 अरब डॉलर रहा।
यहां एक जरूरी फर्क समझना होगा। 57.8 अरब डॉलर नेट ऑयल-गैस बिल है, जबकि 63.4 अरब डॉलर केवल क्रूड ऑयल के सकल आयात बिल का आंकड़ा है। नेट आंकड़े में पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात से मिलने वाली कमाई को भी ध्यान में रखा जाता है।
भारत दुनिया के बड़े तेल आयातकों में शामिल है और घरेलू मांग का बड़ा हिस्सा विदेशी कच्चे तेल पर निर्भर है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेज उछाल का असर सीधे देश के आयात खर्च पर पड़ता है।
अप्रैल-जून तिमाही में ही भारत का क्रूड इम्पोर्ट बिल करीब 77 प्रतिशत बढ़कर 4.64 लाख करोड़ रुपये पहुंच गया था, जबकि आयात की मात्रा लगभग 4.5 प्रतिशत कम हुई थी। इसका मतलब साफ है, बिल बढ़ने की बड़ी वजह मात्रा से ज्यादा कीमत रही।
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक अप्रैल-जून में अंतरराष्ट्रीय कीमतों और होर्मुज़ संकट के दबाव ने भारत के ऊर्जा आयात खर्च को ऊपर धकेला। हर एक डॉलर प्रति बैरल की कीमत वृद्धि भारत के सालाना तेल आयात बिल को करीब 2 अरब डॉलर तक बढ़ा सकती है।
भारत की ऊर्जा आपूर्ति व्यवस्था पश्चिम एशिया के समुद्री मार्गों से गहराई से जुड़ी है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ दुनिया के सबसे अहम ऊर्जा मार्गों में है। यहां व्यवधान बढ़ने से जहाजों को वैकल्पिक मार्गों का सहारा लेना पड़ा और सप्लाई चेन की लागत तथा जोखिम दोनों बढ़े।
भारत सरकार ने मार्च में बताया था कि करीब 70 प्रतिशत क्रूड आयात अब होर्मुज़ से बाहर के रास्तों से आ रहा था, जबकि संकट से पहले यह हिस्सेदारी करीब 55 प्रतिशत थी। सरकार ने यह भी कहा था कि भारत के पास पर्याप्त ऊर्जा भंडार और वैकल्पिक आपूर्ति व्यवस्था मौजूद है।
एलएनजी सप्लाई में भी बदलाव देखने को मिला। भारत ने कतर से आने वाली गैस पर निर्भरता कम करते हुए अमेरिका, ओमान, नाइजीरिया, त्रिनिदाद और अंगोला जैसे स्रोतों से एलएनजी खरीद बढ़ाई।
भारत के लिए समस्या केवल तेल की उपलब्धता नहीं है। असली चुनौती कीमत, माल ढुलाई, बीमा और समुद्री जोखिम का संयुक्त असर है।
जब प्रमुख समुद्री रास्तों पर तनाव बढ़ता है, तो तेल टैंकरों के लिए जोखिम प्रीमियम बढ़ सकता है। लंबा रूट अपनाने पर यात्रा समय और माल ढुलाई खर्च बढ़ता है। इसका असर अंततः आयात की कुल लागत में दिखाई देता है।
जुलाई में भारत का क्रूड इम्पोर्ट बिल 13.7 अरब डॉलर रहा, जो सालाना आधार पर 41 प्रतिशत ज्यादा था। उसी महीने इंडियन क्रूड बास्केट की औसत कीमत 82.04 डॉलर प्रति बैरल रही, जबकि एक साल पहले यह 70.95 डॉलर थी।
सरकार ने ऊर्जा आपूर्ति को जारी रखने के लिए कई कदम उठाए हैं। पेट्रोलियम मंत्रालय और अंतर-मंत्रालयी समूह ने वैकल्पिक आपूर्ति मार्ग, रणनीतिक भंडार और घरेलू उत्पादन पर जोर दिया है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारत के पास संकट के दौरान करीब 60 दिनों का क्रूड और प्राकृतिक गैस तथा 45 दिनों का एलपीजी रोलिंग स्टॉक उपलब्ध था।
सरकार ने यह भी कहा था कि देश में पेट्रोल और डीजल की उपलब्धता पर्याप्त है और रिफाइनरी क्षमता घरेलू मांग से अधिक है। मई में सरकार ने कहा था कि सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय कीमतों के पूरे असर को खुद absorb कर रही थीं।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि संकट की आर्थिक लागत खत्म हो गई। कीमतों का दबाव कंपनियों, सरकार और व्यापक अर्थव्यवस्था के अलग-अलग हिस्सों में बंटता है।
ऊर्जा महंगी होने का असर केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता। परिवहन, बिजली, उर्वरक, प्लास्टिक, रसायन और विनिर्माण लागत पर भी इसका असर पड़ता है।
यदि अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो कंपनियों की लागत बढ़ सकती है। कुछ उद्योग इसका बोझ उपभोक्ताओं पर डाल सकते हैं। इससे महंगाई पर दबाव बढ़ने की गुंजाइश रहती है।
एलपीजी और प्राकृतिक गैस भी महत्वपूर्ण हैं। भारत अपनी एलपीजी खपत का करीब 60 प्रतिशत आयात करता है और इन आयातों का बड़ा हिस्सा होर्मुज़ क्षेत्र से जुड़ा रहा है।
सरकार ने घरेलू एलपीजी उत्पादन बढ़ाने और नए आपूर्तिकर्ताओं से समझौते करने की दिशा में भी कदम उठाए हैं। हाल में इंडियन ऑयल द्वारा अल्जीरिया की सोनात्रैक से 2027 के लिए एलपीजी आयात समझौते पर काम करने की खबर सामने आई है।
तेल भारत के आयात बिल का बड़ा हिस्सा है। इसलिए कीमत बढ़ने पर निर्यात समान गति से न बढ़े तो व्यापार घाटा चौड़ा हो सकता है।
जुलाई 2026 में भारत का व्यापार घाटा 31.98 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जो छह महीने का उच्च स्तर था। रॉयटर्स के मुताबिक महंगे क्रूड के साथ ऊंची वैश्विक फ्रेट लागत और अन्य आयातों ने भी दबाव बढ़ाया।
यह दबाव रुपये और चालू खाते के लिए भी अहम है। भारत को महंगे ऊर्जा आयात के भुगतान के लिए अधिक डॉलर की जरूरत पड़ती है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक रहती है, तो विदेशी मुद्रा प्रवाह और रुपये की स्थिरता पर अतिरिक्त दबाव बन सकता है।
भारत के पास बड़ी रिफाइनिंग क्षमता है। इससे देश को कच्चा तेल खरीदकर पेट्रोलियम उत्पाद तैयार करने और कुछ उत्पादों का निर्यात करने में फायदा मिलता है।
मौजूदा संकट में भारतीय रिफाइनरियां ऊंची क्षमता पर चल रही हैं और कुछ कंपनियां एशियाई बाजारों को ईंधन निर्यात करके ऊंची कीमतों का फायदा भी उठा रही हैं। रॉयटर्स के अनुसार रिलायंस और नायरा जैसी भारतीय रिफाइनरियां क्षेत्रीय बाजार में महत्वपूर्ण सप्लायर की भूमिका निभा रही हैं।
इससे तस्वीर का दूसरा पहलू सामने आता है। महंगा क्रूड भारत के लिए आयात लागत बढ़ाता है, लेकिन मजबूत रिफाइनिंग क्षमता पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात से कुछ विदेशी मुद्रा कमाने का अवसर भी देती है।
भारत के सामने मूल चुनौती ऊर्जा सुरक्षा है। देश को एक साथ तीन मोर्चों पर संतुलन बनाना होगा। सस्ती और लगातार ऊर्जा उपलब्ध कराना, आयात बिल नियंत्रित रखना और घरेलू उपभोक्ताओं पर महंगाई का बोझ सीमित रखना।
सप्लायरों का विविधीकरण इस रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है। रूस, अमेरिका, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और अन्य क्षेत्रों से खरीद बढ़ाना किसी एक समुद्री मार्ग या क्षेत्र पर निर्भरता कम कर सकता है।
लेकिन वैकल्पिक स्रोत हमेशा सस्ते हों, यह जरूरी नहीं है। लंबी दूरी, अलग गुणवत्ता, बीमा लागत और शिपिंग जोखिम अंतिम कीमत को प्रभावित करते हैं।
भारत के तेल और गैस बिल की दिशा मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत, पश्चिम एशिया में संघर्ष की अवधि, होर्मुज़ जैसे समुद्री मार्गों की स्थिति और वैकल्पिक आपूर्ति की उपलब्धता पर निर्भर करेगी।
अगर संकट लंबा खिंचता है और तेल कीमतें ऊंची रहती हैं, तो आयात बिल पर दबाव जारी रह सकता है। इससे व्यापार घाटा और महंगाई प्रबंधन दोनों चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं।
दूसरी तरफ, यदि समुद्री मार्ग सामान्य होते हैं और वैश्विक तेल कीमतों में नरमी आती है, तो भारत के ऊर्जा आयात खर्च में राहत मिल सकती है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि पश्चिम एशिया का संकट कितने समय तक ऊर्जा बाजार को प्रभावित करेगा।
दूसरा सवाल भारत के लिए तेल की वास्तविक औसत खरीद कीमत का है। स्पॉट कीमत के अलावा माल ढुलाई, बीमा और रूट बदलने की लागत भी अंतिम बिल को प्रभावित करती है।
तीसरा सवाल घरेलू ईंधन कीमतों से जुड़ा है। यदि अंतरराष्ट्रीय कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो तेल कंपनियों और सरकार पर सब्सिडी या अंडर-रिकवरी का दबाव कितना बढ़ेगा, यह महत्वपूर्ण रहेगा।
भारत का बढ़ता तेल-गैस आयात बिल पश्चिम एशिया संकट के आर्थिक असर का स्पष्ट संकेत है। अप्रैल-जुलाई में नेट बिल 57.8 अरब डॉलर और क्रूड इम्पोर्ट बिल 63.4 अरब डॉलर तक पहुंचना बताता है कि ऊंची अंतरराष्ट्रीय कीमतें भारत के लिए बड़ा वित्तीय जोखिम बन रही हैं।
भारत ने सप्लाई डायवर्सिफिकेशन, रणनीतिक भंडार और घरेलू उत्पादन के जरिए जोखिम घटाने की कोशिश की है। फिर भी देश की बड़ी आयात निर्भरता के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में लंबे समय तक अस्थिरता का असर भारत के व्यापार घाटे, महंगाई और विदेशी मुद्रा जरूरतों पर बना रहेगा।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।