न्यूयॉर्क में मोहन भागवत के कार्यक्रम के विरोध पर ज़ोहरान ममदानी और आरएसएस के बयान आमने-सामने हैं। प्रवासी भारतीयों के बीच कार्यक्रम, विचारधारा और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर बहस तेज है।
न्यूयॉर्क, अमेरिका | 27 अगस्त 2026| Shah Times
By Mohd Haris
न्यूयॉर्क में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के प्रस्तावित कार्यक्रम को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। न्यूयॉर्क के मेयर ज़ोहरान ममदानी ने कार्यक्रम के प्रति अपना विरोध जताया है, जबकि आरएसएस ने इसे खुले संवाद, आपसी सम्मान और विभिन्न समुदायों के बीच बातचीत का मंच बताया है। इस टकराव ने अमेरिका में बसे भारतीय प्रवासी समुदाय के भीतर भी अलग-अलग नज़रियों को सामने ला दिया है।
विवाद की शुरुआत कहां से हुई
मोहन भागवत 21 अगस्त को न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित होने वाले एक कार्यक्रम में भारतीय प्रवासी समुदाय को संबोधित करने वाले हैं। आयोजकों ने इसे ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन’ नाम दिया है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक कार्यक्रम में करीब 5000 लोगों के शामिल होने की उम्मीद है। यह आयोजन आरएसएस के शताब्दी वर्ष के दौरान चल रहे वैश्विक संपर्क अभियान का हिस्सा है। ज़ोहरान ममदानी ने कहा है कि वह इस कार्यक्रम का समर्थन नहीं करते। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कार्यक्रम निजी है और उन्हें इस बात को लेकर यक़ीन नहीं है कि न्यूयॉर्क शहर प्रशासन के पास इसे रद्द कराने का अधिकार है। यानी मेयर का राजनीतिक विरोध और प्रशासनिक अधिकार, दोनों अलग-अलग मसले हैं। ममदानी ने भारत को लेकर अपने पारिवारिक नज़रिये का भी ज़िक्र किया। उन्होंने कहा कि उनके परिवार से मिली भारत की समझ एक बहुलतावादी और धर्मनिरपेक्ष गणराज्य की रही है, जहां हर व्यक्ति के लिए जगह हो। उन्होंने भारत में ऐसी विचारधारा के उभार पर चिंता जताई, जिसे वह बहिष्कारी दृष्टिकोण से जोड़ते हैं।
आरएसएस ने क्या जवाब दिया
ममदानी के बयान के बाद आरएसएस की तरफ से वरिष्ठ पदाधिकारी सुनील आंबेकर ने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि न्यूयॉर्क का कार्यक्रम खुले संवाद की भावना से आयोजित किया जा रहा है। उनके मुताबिक इसमें अलग-अलग धर्मों और संस्कृतियों से जुड़े लोगों के सामने मोहन भागवत अपनी बात रखेंगे। आरएसएस ने कार्यक्रम को एक ऐसे मंच के तौर पर पेश किया है, जहां संगठन को समझने की इच्छा रखने वाले लोग बातचीत में हिस्सा ले सकते हैं। आंबेकर के अनुसार कार्यक्रम का मकसद आपसी समझ बढ़ाना और साझा उद्देश्यों पर संवाद को आगे बढ़ाना है। उन्होंने इसे भारतीय सोच और सभी को साथ लेकर चलने वाली परंपरा से जोड़ा। आरएसएस के इस बयान का सियासी महत्व इसलिए भी है क्योंकि ममदानी की आपत्ति केवल एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं है। उन्होंने आरएसएस की विचारधारा को लेकर अपनी असहमति दर्ज की है। वहीं आरएसएस अपने अंतरराष्ट्रीय संपर्क अभियान के जरिए संगठन की भूमिका और अपने दृष्टिकोण को भारतीय और वैश्विक समुदाय के सामने रखने की कोशिश कर रहा है।
प्रवासी भारतीयों में क्यों छिड़ी बहस
अमेरिका में भारतीय मूल की आबादी लंबे समय से भारतीय राजनीति, संस्कृति और पहचान से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय रही है। न्यूयॉर्क में भागवत के कार्यक्रम को लेकर सामने आया विवाद इसी व्यापक सामाजिक और राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गया है। एक तरफ कुछ भारतीय अमेरिकी और नागरिक अधिकार समूह आरएसएस की विचारधारा और भारत में अल्पसंख्यकों से जुड़े सवालों को लेकर आपत्ति जता रहे हैं। दूसरी तरफ आरएसएस समर्थक समूह इसे भारतीय संस्कृति, सामाजिक सेवा और प्रवासी भारतीयों से संवाद का कार्यक्रम मानते हैं। इस वजह से बहस केवल एक कार्यक्रम के आयोजन तक सीमित नहीं रह गई है। रिपोर्टों के मुताबिक कई धार्मिक और नागरिक अधिकार संगठनों ने भी कार्यक्रम का विरोध किया है। इनमें हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स, इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल और इंटरफेथ सेंटर ऑफ न्यूयॉर्क शामिल हैं। एक गठबंधन ने मैडिसन स्क्वायर गार्डन से कार्यक्रम रद्द करने की मांग भी की है।
भारत में भी राजनीतिक प्रतिक्रिया
ममदानी के बयान पर भारत में राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने उनके आरएसएस संबंधी आकलन को गलत और आधारहीन बताया है। पार्टी के कुछ नेताओं ने आरएसएस की सामाजिक सेवा और राष्ट्र निर्माण से जुड़ी गतिविधियों का हवाला देते हुए ममदानी की टिप्पणी पर आपत्ति दर्ज की। दूसरी तरफ कांग्रेस के कुछ नेताओं ने आरएसएस के कार्यक्रम और उसके अंतरराष्ट्रीय संदेश पर सवाल उठाए हैं। महाराष्ट्र में भी इस मुद्दे पर अलग-अलग राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। इससे स्पष्ट है कि न्यूयॉर्क का विवाद भारतीय घरेलू राजनीतिक विमर्श तक भी पहुंच गया है। यहां एक अहम तथ्य यह है कि सभी राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया एक जैसी नहीं है। कुछ नेता ममदानी के विरोध को अनुचित मानते हैं, जबकि कुछ विपक्षी नेता आरएसएस की विचारधारा और उसके अंतरराष्ट्रीय संपर्क अभियान पर सवाल उठा रहे हैं। इसलिए पूरे भारतीय राजनीतिक वर्ग की एक समान राय बताना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
आरएसएस का वैश्विक संपर्क अभियान
मोहन भागवत की अमेरिका यात्रा आरएसएस के शताब्दी वर्ष से जुड़े वैश्विक संपर्क अभियान का हिस्सा है। अमेरिका के बाद कनाडा और ब्रिटेन में भी संपर्क कार्यक्रम प्रस्तावित हैं। आरएसएस के मुताबिक इस अभियान का उद्देश्य संगठन, भारत और हिंदू समाज को लेकर उसके दृष्टिकोण को अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने रखना तथा प्रवासी भारतीयों के साथ संवाद बढ़ाना है। आरएसएस का कहना है कि वह अपने बारे में फैली गलत धारणाओं का जवाब संवाद के माध्यम से देना चाहता है। संगठन अपने संदेश को ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की अवधारणा से भी जोड़ रहा है। न्यूयॉर्क का कार्यक्रम इसी अंतरराष्ट्रीय संपर्क रणनीति का प्रमुख हिस्सा माना जा रहा है।
विरोध करने वालों की मुख्य आपत्ति
कार्यक्रम का विरोध करने वाले संगठनों का तर्क आरएसएस की विचारधारा और भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों से जुड़े सवालों पर केंद्रित है। अमेरिका में आरएसएस को लेकर लंबे समय से बहस मौजूद है। आलोचक संगठन पर अल्पसंख्यकों के प्रति असहिष्णु माहौल को बढ़ावा देने के आरोप लगाते रहे हैं। आरएसएस इन आरोपों को स्वीकार नहीं करता और खुद को सांस्कृतिक तथा स्वयंसेवी संगठन के रूप में प्रस्तुत करता है।
अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ी संस्था ने भी हाल में आरएसएस को लेकर चिंता जताई है। वहीं अमेरिकी राजनीतिक और कूटनीतिक हलकों में आरएसएस से जुड़े लोगों के साथ अलग-अलग समय पर संवाद भी होता रहा है। इसलिए अमेरिकी परिप्रेक्ष्य में भी संगठन को लेकर एकराय नहीं है।
ममदानी की स्थिति और अधिकार का सवाल
इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू न्यूयॉर्क मेयर के अधिकार क्षेत्र का है। ममदानी ने कार्यक्रम के विरोध की राजनीतिक स्थिति स्पष्ट की है, लेकिन साथ ही यह भी कहा है कि निजी कार्यक्रम को रद्द करने का अधिकार शहर प्रशासन के पास है या नहीं, इस पर उन्हें जानकारी नहीं है। इसका अर्थ है कि कार्यक्रम का भविष्य केवल मेयर के राजनीतिक बयान से तय नहीं होगा। निजी आयोजन, स्थानीय प्रशासन की शक्तियां और अमेरिकी कानून के तहत अभिव्यक्ति तथा सभा की स्वतंत्रता जैसे मुद्दे भी महत्वपूर्ण होंगे।
क्या कार्यक्रम रद्द होगा
फिलहाल उपलब्ध जानकारी के अनुसार २९ अगस्त का कार्यक्रम निर्धारित है। आरएसएस की तरफ से कार्यक्रम को लेकर सार्वजनिक तौर पर संवाद का संदेश दिया गया है और ममदानी ने भी इसे रद्द कराने के लिए प्रशासनिक कार्रवाई का ऐलान नहीं किया है। इसलिए अभी इसे रद्द किया जाना तय नहीं है। विवाद के बीच अमेरिकी गायिका मैरी मिलबेन ने भी ममदानी की आलोचना की है। दूसरी तरफ नागरिक अधिकार और धार्मिक संगठन कार्यक्रम के विरोध में अपनी आवाज उठा रहे हैं। इससे आयोजन के आसपास राजनीतिक और सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ता दिखाई दे रहा है।
आगे क्या देखना होगा
२९ अगस्त का कार्यक्रम इस विवाद का अगला अहम पड़ाव होगा। निगाह इस बात पर रहेगी कि मोहन भागवत अपने संबोधन में भारतीय प्रवासियों, आरएसएस की भूमिका, वैश्विक भारतीय समुदाय और संगठन की विचारधारा को लेकर क्या संदेश देते हैं। दूसरी तरफ यह भी महत्वपूर्ण होगा कि ममदानी के बयान के बाद भारतीय अमेरिकी समुदाय के भीतर बहस किस दिशा में जाती है। यह विवाद अमेरिकी राजनीति में भारतीय मूल के मतदाताओं की बढ़ती भूमिका, भारत की घरेलू राजनीति के वैश्विक असर और प्रवासी समुदाय की राजनीतिक पहचान से जुड़े सवालों को भी सामने ला रहा है। फिलहाल स्थिति यही है कि ममदानी ने कार्यक्रम का विरोध किया है, आरएसएस ने इसे खुले संवाद का मंच बताया है और कार्यक्रम के आयोजकों की ओर से आयोजन जारी रखने की तैयारी है। इसलिए आने वाले दिनों में असली सवाल कार्यक्रम के होने या न होने से आगे बढ़कर यह रहेगा कि भारत की राजनीतिक और वैचारिक बहस अमेरिकी भारतीय समुदाय के बीच किस तरह आकार लेती है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।