कोहिनूर हीरा भारत से ब्रिटेन कैसे पहुंचा? इतिहास की पूरी पड़ताल
कोहिनूर पर किसका अधिकार? जानिए भारत से इंग्लैंड तक का सफर
कोहिनूर हीरे की कहानी: युद्ध, संधि और विवाद का पूरा इतिहास
कोहिनूर हीरा सदियों तक भारतीय उपमहाद्वीप के विभिन्न शासकों के पास रहा। 1849 में पंजाब के ब्रिटिश अधिग्रहण के बाद यह ब्रिटिश शासन के अधिकार में चला गया और बाद में महारानी विक्टोरिया को सौंपा गया। आज भी इसके स्वामित्व को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस जारी है।
📍 लंदन / नई दिल्ली
📰 06 अगस्त 2026
✍️ Neelam Saini
कोहिनूर हीरा भारत से इंग्लैंड कैसे पहुंचा? जानिए पूरी कहानी
कोहिनूर केवल एक हीरा नहीं, इतिहास का सबसे चर्चित प्रतीक
कोहिनूर हीरा दुनिया के सबसे प्रसिद्ध रत्नों में गिना जाता है। इसकी चमक केवल इसकी कीमत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ जुड़ा इतिहास, सत्ता परिवर्तन, युद्ध, साम्राज्यवाद और सांस्कृतिक विरासत इसे विश्व राजनीति और इतिहास का महत्वपूर्ण विषय बनाते हैं। आज यह ब्रिटिश क्राउन ज्वेल्स का हिस्सा है, लेकिन इसकी यात्रा भारतीय उपमहाद्वीप से शुरू हुई थी। इतिहासकारों के अनुसार कोहिनूर की कहानी कई शताब्दियों तक फैली हुई है। इसके अलग-अलग दौर में अनेक शासकों ने इसे अपने अधिकार में रखा। यही कारण है कि इस हीरे का स्वामित्व आज भी अंतरराष्ट्रीय बहस का विषय बना हुआ है।
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कोहिनूर की उत्पत्ति कहां से हुई?
अधिकांश ऐतिहासिक शोध यह मानते हैं कि कोहिनूर हीरा आंध्र प्रदेश के गोलकुंडा क्षेत्र स्थित कोल्लूर खदान से निकला था। मध्यकाल में यही क्षेत्र दुनिया के सबसे प्रसिद्ध हीरा उत्पादक इलाकों में शामिल था। हालांकि प्रारंभिक इतिहास के कई हिस्सों पर इतिहासकारों में मतभेद हैं। उपलब्ध दस्तावेज़ों के आधार पर इसकी पूरी शुरुआती यात्रा निश्चित रूप से स्थापित नहीं की जा सकी है।
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मुगल दरबार से अफगान और सिख साम्राज्य तक
16वीं और 17वीं शताब्दी में कोहिनूर मुगल साम्राज्य की शाही संपत्ति का हिस्सा बना। बाबरनामा और बाद के कई ऐतिहासिक अभिलेखों में बहुमूल्य हीरों का उल्लेख मिलता है, हालांकि विभिन्न स्रोत अलग-अलग विवरण प्रस्तुत करते हैं। 1739 में फारस के शासक नादिर शाह ने दिल्ली पर आक्रमण किया। इसी दौरान मुगल खजाने के साथ कोहिनूर भी उसके हाथ लगा। माना जाता है कि उसी ने इस हीरे को “कोह-ए-नूर” अर्थात “रोशनी का पर्वत” नाम दिया। नादिर शाह की मृत्यु के बाद यह हीरा अफगान शासकों के पास पहुंचा और बाद में पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह के अधिकार में आया। इस तरह कोहिनूर सिख साम्राज्य की शाही धरोहर बन गया।
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ब्रिटेन तक कैसे पहुंचा कोहिनूर?
यह इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण और विवादित अध्याय है।
1849 में दूसरे एंग्लो-सिख युद्ध के बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने पंजाब पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। इसके बाद लाहौर की संधि (Treaty of Lahore) के तहत नाबालिग महाराजा दलीप सिंह से कोहिनूर ब्रिटिश सरकार को सौंपा गया। ब्रिटिश अभिलेखों के अनुसार यह हस्तांतरण संधि के प्रावधानों के अनुरूप था। वहीं अनेक भारतीय इतिहासकारों का तर्क है कि यह समझौता औपनिवेशिक दबाव में हुआ था और इसे स्वैच्छिक हस्तांतरण नहीं माना जा सकता।
यहीं से विवाद की शुरुआत होती है।
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महारानी विक्टोरिया को सौंपा गया कोहिनूर
1850 में कोहिनूर को इंग्लैंड भेजा गया। अगले वर्ष इसे लंदन की ग्रेट एग्ज़ीबिशन में प्रदर्शित किया गया, जहां इसकी चमक अपेक्षा से कम मानी गई। इसके बाद इसे दोबारा तराशा गया। मूल आकार लगभग 186 कैरेट बताया जाता है, जबकि तराशने के बाद इसका वजन लगभग 105.6 कैरेट रह गया। बाद में इसे महारानी विक्टोरिया के शाही आभूषणों में शामिल किया गया और आज यह ब्रिटिश क्राउन ज्वेल्स का हिस्सा है।
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क्या भारत ने कोहिनूर वापस मांगा?
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत ने कई अवसरों पर कोहिनूर की वापसी की मांग उठाई। समय-समय पर भारतीय सरकारों और विभिन्न संगठनों ने इसे भारत की सांस्कृतिक विरासत बताते हुए लौटाने की बात कही। सिर्फ भारत ही नहीं, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और ईरान के कुछ समूहों ने भी ऐतिहासिक आधारों पर इस हीरे पर दावा किया है। दूसरी ओर ब्रिटेन का कहना है कि कोहिनूर कानूनी रूप से उस समय की संधि के तहत प्राप्त हुआ था और इसलिए वह ब्रिटिश क्राउन का वैध हिस्सा है।
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इतिहासकारों की राय क्यों अलग-अलग है?
यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।
कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि औपनिवेशिक शासन के दौरान हुई संधियों को आज के अंतरराष्ट्रीय मानकों से नहीं परखा जा सकता। वहीं दूसरी राय यह कहती है कि उपनिवेशवाद के दौर में शक्ति का असंतुलन इतना अधिक था कि ऐसे समझौतों को पूरी तरह स्वतंत्र सहमति नहीं कहा जा सकता। इसी वजह से कोहिनूर केवल एक ऐतिहासिक वस्तु नहीं बल्कि औपनिवेशिक न्याय, सांस्कृतिक विरासत और अंतरराष्ट्रीय कानून पर चल रही बहस का प्रतीक बन चुका है।
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क्या कोहिनूर कभी वापस आएगा?
इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर फिलहाल किसी के पास नहीं है।
ब्रिटेन ने अब तक कोहिनूर लौटाने का कोई संकेत नहीं दिया है। वहीं दुनिया के कई देशों में औपनिवेशिक काल में ले जाए गए सांस्कृतिक अवशेषों की वापसी पर चर्चा लगातार बढ़ रही है। हाल के वर्षों में अनेक संग्रहालयों ने कुछ कलाकृतियां उनके मूल देशों को लौटाई हैं। इससे यह बहस और तेज हुई है कि क्या कोहिनूर जैसे प्रतीकात्मक रत्न पर भी भविष्य में पुनर्विचार होगा।
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इतिहास से मिलने वाला बड़ा संदेश
कोहिनूर की कहानी केवल एक बहुमूल्य हीरे की यात्रा नहीं है। यह सत्ता परिवर्तन, युद्ध, साम्राज्यवाद, सांस्कृतिक पहचान और विरासत के अधिकार की कहानी भी है। इतिहास हमें यह भी सिखाता है कि किसी वस्तु का मूल्य केवल उसकी आर्थिक कीमत से नहीं बल्कि उसके सांस्कृतिक, भावनात्मक और ऐतिहासिक महत्व से भी तय होता है। जब तक इस विषय पर सभी पक्षों के बीच सहमति नहीं बनती, तब तक कोहिनूर दुनिया के सबसे चर्चित ऐतिहासिक विवादों में शामिल रहेगा और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी शोध तथा विमर्श का विषय बना रहेगा।