मोबाइल स्क्रीन टाइम: छोटे बच्चों के लिए कितना सुरक्षित है?
Neelam Saini
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2026-07-21 14:03:19
मोबाइल स्क्रीन टाइम बढ़ने से बच्चों की सेहत पर बढ़ा खतरा
छोटे बच्चों में मोबाइल की लत: क्या कहते हैं विशेषज्ञ और शोध?
बच्चों का ज्यादा मोबाइल देखना क्यों बन रहा है चिंता का विषय?
मोबाइल स्क्रीन टाइम छोटे बच्चों के जीवन का सामान्य हिस्सा बनता जा रहा है, लेकिन अत्यधिक उपयोग कई स्वास्थ्य संबंधी जोखिम पैदा कर सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि संतुलित स्क्रीन उपयोग, अभिभावकों की निगरानी और वैकल्पिक गतिविधियां बच्चों के स्वस्थ विकास के लिए आवश्यक हैं।
📍 स्थान: भारत
📰 दिनांक: 1 जुलाई 2026
✍️ नीलम सैनी
छोटे बच्चों में मोबाइल स्क्रीन टाइम: सुविधा या बढ़ती चुनौती?
आज के डिजिटल दौर में मोबाइल फोन केवल संचार का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि मनोरंजन, पढ़ाई और जानकारी का भी बड़ा साधन बन चुका है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि छोटे बच्चों में बढ़ता मोबाइल स्क्रीन टाइम एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बनता जा रहा है। कई अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय संस्थानों ने इस विषय पर चिंता व्यक्त की है। बच्चों को शांत रखने, खाना खिलाने या व्यस्त रखने के लिए मोबाइल देना कई परिवारों में सामान्य बात बन गई है। लेकिन जब यह आदत रोज़ाना कई घंटों तक जारी रहती है, तो इसका असर केवल आंखों तक सीमित नहीं रहता बल्कि मानसिक, शारीरिक और सामाजिक विकास पर भी पड़ सकता है।
स्क्रीन टाइम और बच्चों का विकास
बच्चों के शुरुआती पांच वर्ष मस्तिष्क के तेज़ विकास का समय होते हैं। इसी दौरान भाषा, सामाजिक व्यवहार, भावनात्मक समझ और सीखने की क्षमता विकसित होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस समय का बड़ा हिस्सा स्क्रीन देखने में बीतता है, तो वास्तविक अनुभवों और मानवीय संवाद के अवसर कम हो सकते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन का सुझाव है कि छोटे बच्चों के लिए सक्रिय खेल, पर्याप्त नींद और परिवार के साथ संवाद, स्वस्थ विकास के महत्वपूर्ण आधार हैं। इसलिए स्क्रीन का उपयोग सीमित और उद्देश्यपूर्ण होना चाहिए।
आंखों पर क्या असर पड़ता है?
लंबे समय तक मोबाइल देखने से बच्चों में आंखों की थकान, सूखापन, धुंधला दिखाई देना और सिरदर्द जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं। लगातार पास की स्क्रीन देखने से कुछ बच्चों में मायोपिया यानी निकट दृष्टि दोष का जोखिम भी बढ़ सकता है। हालांकि हर बच्चे में इसका प्रभाव समान नहीं होता, क्योंकि आनुवंशिक कारण और बाहरी वातावरण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
नेत्र विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि बच्चों को नियमित अंतराल पर स्क्रीन से ब्रेक दिलाया जाए और उन्हें खुले वातावरण में खेलने के लिए प्रेरित किया जाए।
नींद पर पड़ सकता है प्रभाव
मोबाइल स्क्रीन से निकलने वाली तेज रोशनी शरीर की जैविक घड़ी को प्रभावित कर सकती है। यदि बच्चा सोने से पहले लंबे समय तक मोबाइल देखता है, तो उसे नींद आने में देर हो सकती है या नींद की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
पर्याप्त और अच्छी नींद बच्चों की याददाश्त, सीखने की क्षमता और शारीरिक विकास के लिए आवश्यक मानी जाती है। इसलिए विशेषज्ञ सोने से कम से कम एक घंटे पहले स्क्रीन से दूरी बनाने की सलाह देते हैं।
व्यवहार और मानसिक स्वास्थ्य
कुछ शोध बताते हैं कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम का संबंध चिड़चिड़ापन, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई और भावनात्मक असंतुलन जैसी समस्याओं से देखा गया है। हालांकि वैज्ञानिक यह भी स्पष्ट करते हैं कि केवल मोबाइल ही इन समस्याओं का एकमात्र कारण नहीं माना जा सकता। पारिवारिक माहौल, सामाजिक परिस्थितियां और बच्चे की व्यक्तिगत स्थिति भी महत्वपूर्ण होती है। इसीलिए विशेषज्ञ संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की सलाह देते हैं और हर समस्या का कारण केवल मोबाइल को नहीं मानते।
सीखने की क्षमता पर असर
डिजिटल प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कई शैक्षणिक सामग्री बच्चों के लिए उपयोगी हो सकती है। लेकिन यदि स्क्रीन मनोरंजन का मुख्य साधन बन जाए और किताबें पढ़ना, खेलना तथा परिवार से बातचीत कम हो जाए, तो सीखने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार छोटे बच्चों के लिए वास्तविक अनुभव, कहानी सुनना, चित्र बनाना और समूह में खेलना डिजिटल सामग्री से कहीं अधिक लाभदायक माना जाता है।
क्या हर स्क्रीन टाइम नुकसानदेह है?
यह मान लेना सही नहीं होगा कि हर प्रकार का स्क्रीन टाइम हानिकारक होता है। यदि माता-पिता की मौजूदगी में उम्र के अनुसार गुणवत्तापूर्ण शैक्षणिक सामग्री सीमित समय तक दिखाई जाए, तो उसका सकारात्मक उपयोग भी संभव है।
समस्या तब पैदा होती है जब स्क्रीन बच्चों के दैनिक जीवन का मुख्य हिस्सा बन जाती है और उसकी वजह से खेल, पढ़ाई, नींद तथा सामाजिक गतिविधियां प्रभावित होने लगती हैं।
माता-पिता की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण
विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों के सामने बड़े भी यदि लगातार मोबाइल का उपयोग करेंगे तो बच्चे उसी व्यवहार की नकल करेंगे। इसलिए परिवार में डिजिटल अनुशासन विकसित करना जरूरी है। घर में स्क्रीन-फ्री समय तय करना, भोजन के दौरान मोबाइल से दूरी रखना, बच्चों के साथ बातचीत करना और आउटडोर गतिविधियों को बढ़ावा देना बेहतर विकल्प माने जाते हैं।
विशेषज्ञ क्या सलाह देते हैं?
अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थानों का सुझाव है कि दो वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सामान्य मनोरंजन स्क्रीन उपयोग से बचना चाहिए। बड़े बच्चों के लिए भी स्क्रीन समय उम्र के अनुसार सीमित होना चाहिए और उसकी गुणवत्ता पर ध्यान देना चाहिए। इसके साथ ही बच्चों को प्रतिदिन शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद और परिवार के साथ समय बिताने के अवसर मिलना भी उतना ही आवश्यक है।
भविष्य की चुनौती
डिजिटल तकनीक आने वाले वर्षों में शिक्षा और जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी रहेगी। इसलिए उद्देश्य मोबाइल को पूरी तरह छोड़ना नहीं, बल्कि उसका सुरक्षित और संतुलित उपयोग सीखना है। सरकार, स्कूल, स्वास्थ्य विशेषज्ञ और अभिभावकों के बीच जागरूकता बढ़ाने से बच्चों के डिजिटल स्वास्थ्य को बेहतर बनाया जा सकता है।
निष्कर्ष
मोबाइल स्क्रीन टाइम आधुनिक जीवन की वास्तविकता है, लेकिन इसका संतुलित उपयोग ही बच्चों के स्वस्थ भविष्य की कुंजी है। उपलब्ध वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि अत्यधिक स्क्रीन उपयोग आंखों, नींद, व्यवहार और सीखने की क्षमता पर असर डाल सकता है, हालांकि हर बच्चे में इसका प्रभाव अलग हो सकता है। विशेषज्ञों की सलाह है कि परिवार बच्चों के साथ अधिक समय बिताएं, स्क्रीन की जगह खेल, किताबें और संवाद को प्राथमिकता दें। यही संतुलन डिजिटल युग में बच्चों के स्वस्थ विकास का सबसे मजबूत आधार बन सकता है।
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Neelam Saini
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक,
अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।