जंतर-मंतर पर हुए एक प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित आपत्तिजनक टिप्पणी का वीडियो सामने आने के बाद Zero FIR दर्ज की गई। इसके बाद CJP संस्थापक अभिजीत दिपके ने कार्रवाई की आलोचना की। मामला अब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, आपराधिक कानून और राजनीतिक प्रतिक्रिया के बीच चर्चा का विषय बन गया है।
📍 नोएडा / नई दिल्ली
📰 1 अगस्त 2026
✍️ By Haris
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद उत्तर प्रदेश के नोएडा में Zero FIR दर्ज की गई। पुलिस के अनुसार घटना दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित एक प्रदर्शन से जुड़ी बताई गई, इसलिए मामला आगे की जांच के लिए दिल्ली पुलिस को भेजा गया।
पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है। जांच एजेंसियां वीडियो की प्रामाणिकता, घटनाक्रम और कथित बयान के कानूनी पहलुओं की जांच कर रही हैं।
Cockroach Janta Party (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके ने FIR की आलोचना करते हुए कहा कि केवल गाली देना अपने आप में अपराध नहीं माना जा सकता। उन्होंने दावा किया कि सार्वजनिक जीवन में कई नेताओं के विवादित बयान सामने आते रहे हैं और कानून का समान रूप से इस्तेमाल होना चाहिए। यह उनका राजनीतिक और कानूनी मत है, जिसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
इस मामले के बाद एक बार फिर सवाल उठा है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और आपराधिक दायित्व की सीमा कहां तक है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, लेकिन अनुच्छेद 19(2) के तहत इस अधिकार पर कानून द्वारा उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में यह स्पष्ट किया गया है कि केवल अभद्र भाषा का प्रयोग हर परिस्थिति में स्वतः आपराधिक अपराध नहीं बन जाता। हालांकि किसी मामले में लागू धाराएं, परिस्थितियां, कथित मंशा और उपलब्ध साक्ष्य अदालत के अंतिम निर्णय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
मामले के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक वीडियो संदेश जारी कर कहा कि गाली-गलौज किसी समस्या का समाधान नहीं है। बाद में उन्होंने यह भी कहा कि वह अपने और अपनी माता के खिलाफ अपशब्द बोलने वालों को माफ करते हैं तथा समाज का दायित्व युवाओं का मार्गदर्शन करना है। इन बयानों को कई राजनीतिक विश्लेषकों ने तनाव कम करने की कोशिश के रूप में देखा।
दूसरी ओर, विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक समूह इस मामले को अलग-अलग नजरिए से देख रहे हैं। कुछ इसे सार्वजनिक शालीनता और कानून के पालन का मामला बता रहे हैं, जबकि अन्य इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा प्रश्न मान रहे हैं।
फिलहाल जांच जारी है। संबंधित पुलिस एजेंसियां वीडियो, शिकायत और उपलब्ध साक्ष्यों की जांच कर रही हैं। किसी भी आरोपी की दोषसिद्धि या निर्दोषता का निर्णय केवल न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगा।
यह मामला केवल एक FIR तक सीमित नहीं है। इसने राजनीतिक संवाद की भाषा, सोशल मीडिया पर सार्वजनिक अभिव्यक्ति और भारतीय कानून की सीमाओं पर नई बहस शुरू कर दी है। आने वाले दिनों में पुलिस जांच और अदालत की कार्यवाही इस पूरे विवाद की दिशा तय करेगी।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।