प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने नई दिल्ली में सहयोग की समीक्षा की। बातचीत में 2030 तक 100 अरब डॉलर व्यापार लक्ष्य, ऊर्जा, रक्षा, अंतरिक्ष और सहयोग पर जोर रहा। एशिया और काला सागर संघर्षों से समुद्री व्यापार तथा भारतीय नाविकों की सुरक्षा पर चर्चा हुई।
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नई दिल्ली | 12 सितंबर 2026 | Apurva Choudhary
मोदी-पुतिन बातचीत में आर्थिक साझेदारी पर जोर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने 11 सितंबर को नई दिल्ली में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान द्विपक्षीय मुलाकात की। दोनों नेताओं ने भारत-रूस संबंधों में राजनीतिक, आर्थिक, रक्षा, ऊर्जा, अंतरिक्ष, कौशल गतिशीलता और जन-जन के रिश्तों से जुड़े सहयोग की समीक्षा की।
बैठक का अहम पहलू आर्थिक रिश्तों को अगले स्तर तक ले जाने की कोशिश रही। दोनों देशों के बीच 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य पहले से तय है और ताजा बातचीत में इसके लिए आर्थिक सहयोग कार्यक्रम 2030 को आगे बढ़ाने तथा औद्योगिक साझेदारी को मजबूत करने पर जोर दिया गया।
100 अरब डॉलर के व्यापार लक्ष्य की पृष्ठभूमि
भारत और रूस ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर से ऊपर ले जाने की महत्वाकांक्षा पहले ही व्यक्त की है। 2024-25 में दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार रिकॉर्ड 68.7 अरब डॉलर तक पहुंचा था, लेकिन इसका बड़ा हिस्सा रूस से भारत के आयात का रहा।
आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 2024-25 में भारत का रूस को निर्यात करीब 4.9 अरब डॉलर था, जबकि रूस से आयात 63.8 अरब डॉलर रहा। इस अंतर की वजह से व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में नहीं है, इसलिए 100 अरब डॉलर का लक्ष्य केवल कुल कारोबार बढ़ाने तक सीमित नहीं है; भारतीय निर्यात और बाजार पहुंच बढ़ाना भी अहम चुनौती है।
यही वजह है कि हाल की आर्थिक बातचीत में भारतीय उत्पादों के लिए रूसी बाजार तक बेहतर पहुंच, मैन्युफैक्चरिंग और निवेश जैसे मुद्दों को महत्व दिया जा रहा है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने 10 सितंबर को भी फार्मास्यूटिकल्स, ऑटो कंपोनेंट्स और खाद्य उत्पादों समेत भारतीय निर्यात बढ़ाने की संभावनाओं पर जोर दिया था।
मैन्युफैक्चरिंग से क्रिटिकल मिनरल्स तक विस्तार
भारत-रूस आर्थिक संबंध लंबे समय तक ऊर्जा और रक्षा सहयोग के इर्द-गिर्द केंद्रित रहे हैं। अब दोनों पक्ष रिश्ते को ज्यादा विविध बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसमें मैन्युफैक्चरिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर, रेलवे, परमाणु ऊर्जा और क्रिटिकल मिनरल्स जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
इसी दिशा में रूस की अंतरराष्ट्रीय औद्योगिक प्रदर्शनी इनोप्रोम इंडिया का नई दिल्ली में आयोजन महत्वपूर्ण रहा। यह प्रदर्शनी 9 से 11 सितंबर 2026 तक भारत में पहली बार हुई और दोनों नेताओं ने इसका दौरा भी किया। आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार इसका उद्देश्य भारत-रूस व्यापार तथा औद्योगिक रिश्तों को और विस्तार देना है।
औद्योगिक सहयोग का महत्व इसलिए भी बढ़ता है क्योंकि भारत अपने आयात पर निर्भर क्षेत्रों के साथ-साथ घरेलू मैन्युफैक्चरिंग क्षमता और तकनीकी सहयोग को मजबूत करना चाहता है। रूस के लिए भी भारत एक बड़ा बाजार है, जबकि भारतीय कंपनियों के लिए रूस में फार्मास्यूटिकल्स, इंजीनियरिंग, खाद्य और अन्य क्षेत्रों में विस्तार की संभावनाएं मौजूद हैं।
ऊर्जा और परमाणु सहयोग बना अहम स्तंभ
ऊर्जा भारत-रूस रिश्तों का सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक पहलू बना हुआ है। रूस से भारत के आयात में कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की बड़ी भूमिका रही है, जिससे दोनों देशों का ऊर्जा संबंध व्यापक भू-राजनीतिक बदलावों के बीच भी कायम रहा है।
नई दिल्ली में मोदी-पुतिन बैठक के दौरान ऊर्जा सहयोग की प्रगति की समीक्षा की गई। परमाणु ऊर्जा सहयोग भी व्यापक आर्थिक साझेदारी का हिस्सा है और दोनों देशों के बीच नागरिक परमाणु क्षेत्र में लंबे समय से सहयोग जारी है।
हालांकि ऊर्जा संबंधों को केवल तेल खरीद तक सीमित देखना अधूरा होगा। भारत और रूस दोनों दीर्घकालिक ऊर्जा सहयोग, परमाणु क्षमता, तकनीक और संबंधित औद्योगिक गतिविधियों में साझेदारी को विस्तार देने की संभावनाएं तलाश रहे हैं।
रक्षा सहयोग पर भी जारी रहा संवाद
रक्षा भारत-रूस रणनीतिक साझेदारी का पारंपरिक और महत्वपूर्ण आधार है। दोनों नेताओं ने मौजूदा रक्षा सहयोग की प्रगति की समीक्षा की, जबकि व्यापक बैठक में ऊर्जा, अंतरिक्ष और अन्य रणनीतिक क्षेत्रों पर भी चर्चा हुई।
हाल के वर्षों में भारत ने रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता और घरेलू मैन्युफैक्चरिंग पर ज्यादा जोर दिया है। इसलिए भविष्य के भारत-रूस रक्षा संबंधों में केवल तैयार सैन्य उपकरणों की खरीद के बजाय तकनीकी सहयोग, संयुक्त उत्पादन और औद्योगिक साझेदारी का स्वरूप अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है।
यह बदलाव दोनों देशों के लिए अवसर भी पैदा करता है और चुनौती भी। भारत को अपनी घरेलू रक्षा क्षमता बढ़ानी है, जबकि रूस के साथ मौजूदा तकनीकी और सैन्य संबंधों को बदलते वैश्विक प्रतिबंधों और सप्लाई-चेन परिस्थितियों के बीच व्यावहारिक रूप से बनाए रखना होगा।
पश्चिम एशिया और काला सागर के हालात पर चर्चा
मोदी-पुतिन बातचीत सिर्फ आर्थिक मुद्दों तक सीमित नहीं रही। दोनों नेताओं ने पश्चिम एशिया और काला सागर क्षेत्र में जारी संघर्षों के समुद्री व्यापार तथा भारतीय नाविकों की सुरक्षा पर पड़ने वाले असर पर भी विचार साझा किए।
भारत के लिए यह मुद्दा इसलिए अहम है क्योंकि देश का बड़ा हिस्सा अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार पर निर्भर है। पश्चिम एशिया और काला सागर क्षेत्र में तनाव बढ़ने पर जहाजों के मार्ग, बीमा लागत, माल ढुलाई और ऊर्जा आपूर्ति पर असर पड़ सकता है।
प्रधानमंत्री मोदी ने एक बार फिर संघर्षों के समाधान के लिए संवाद और कूटनीति को आगे का रास्ता बताया। आधिकारिक बयान के मुताबिक भारत ने शांति प्रयासों में मदद के लिए अपनी तत्परता भी दोहराई।
यूक्रेन पर भारत का संतुलित रुख
यूक्रेन संघर्ष भारत-रूस संबंधों की सबसे संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय पृष्ठभूमियों में से एक बना हुआ है। नई दिल्ली ने लगातार संवाद और कूटनीति के जरिए समाधान की वकालत की है, जबकि रूस के साथ ऊर्जा और रणनीतिक संबंध भी बनाए रखे हैं।
इस रुख में भारत की प्राथमिकता अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों के साथ-साथ संघर्ष के व्यापक प्रभावों को सीमित करना है। पश्चिमी देशों के साथ भारत के बढ़ते संबंधों और रूस के साथ पारंपरिक रणनीतिक साझेदारी के बीच यह संतुलन भारतीय विदेश नीति की प्रमुख विशेषता बना हुआ है।
मोदी-पुतिन बैठक में यूक्रेन को लेकर किसी नए शांति समझौते या तत्काल समाधान की घोषणा नहीं हुई। इसलिए बैठक को किसी औपचारिक युद्धविराम पहल के रूप में पेश करना उपलब्ध आधिकारिक जानकारी से आगे जाना होगा।
क्या 100 अरब डॉलर का लक्ष्य हासिल करना आसान होगा?
कुल व्यापार को 100 अरब डॉलर तक ले जाना महत्वाकांक्षी लक्ष्य है, लेकिन मौजूदा व्यापार संरचना इसे चुनौतीपूर्ण बनाती है। यदि व्यापार का बड़ा हिस्सा ऊर्जा आयात पर निर्भर रहता है और भारतीय निर्यात अपेक्षाकृत कम रहता है, तो कुल कारोबार बढ़ने के बावजूद व्यापार असंतुलन का सवाल बना रहेगा।
इसीलिए भारतीय पक्ष के लिए फार्मास्यूटिकल्स, इंजीनियरिंग उत्पाद, ऑटो कंपोनेंट्स, कृषि और खाद्य उत्पादों जैसे क्षेत्रों में निर्यात बढ़ाना महत्वपूर्ण होगा। वाणिज्य मंत्रालय ने हाल में रूसी बाजार में भारतीय उत्पादों की पहुंच बढ़ाने और रूस की कंपनियों को भारत में मैन्युफैक्चरिंग के लिए आकर्षित करने पर जोर दिया है।
भुगतान व्यवस्था भी व्यापार विस्तार का अहम हिस्सा है। हाल की रिपोर्टों के मुताबिक भारत और रूस ने राष्ट्रीय मुद्राओं में भुगतान की व्यवस्था को काफी विस्तार दिया है, जिससे पश्चिमी वित्तीय प्रणालियों पर निर्भरता से जुड़ी कुछ व्यावहारिक कठिनाइयों को कम करने की कोशिश हुई है।
भारत-रूस साझेदारी का बदलता आर्थिक स्वरूप
भारत और रूस का रिश्ता अब केवल रक्षा और ऊर्जा तक सीमित रखने के बजाय ज्यादा व्यापक आर्थिक साझेदारी की तरफ बढ़ रहा है। बुनियादी ढांचा, अंतरिक्ष, कौशल गतिशीलता, औद्योगिक उत्पादन और क्रिटिकल मिनरल्स जैसे नए क्षेत्र इस रिश्ते की अगली परत बन सकते हैं।
इसमें क्रिटिकल मिनरल्स का महत्व खास तौर पर बढ़ रहा है क्योंकि आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स, ऊर्जा तकनीक और कई रणनीतिक उद्योगों के लिए इन संसाधनों की जरूरत होती है। अगर भारत और रूस इस क्षेत्र में व्यावहारिक परियोजनाएं विकसित करते हैं, तो इसका असर व्यापार के साथ-साथ दीर्घकालिक औद्योगिक सुरक्षा पर भी पड़ सकता है।
हालांकि किसी भी बड़े निवेश या औद्योगिक परियोजना के वास्तविक असर का आकलन घोषणाओं के बजाय उनके क्रियान्वयन के बाद ही किया जा सकेगा। इसलिए मौजूदा घटनाक्रम को रोडमैप और नीति-दिशा के रूप में देखना अधिक सटीक होगा, न कि पहले से हासिल आर्थिक परिणाम के रूप में।
अगला कदम क्या होगा?
दोनों नेताओं ने आर्थिक सहयोग कार्यक्रम 2030 को लागू करने और द्विपक्षीय साझेदारी को आगे बढ़ाने पर सहमति जताई है। इसके अलावा पुतिन ने प्रधानमंत्री मोदी को 24वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन के लिए रूस आने का निमंत्रण दिया, जिसे मोदी ने स्वीकार कर लिया। सम्मेलन की तारीख बाद में राजनयिक माध्यमों से तय की जाएगी।
अगले चरण में व्यापार, निवेश, औद्योगिक सहयोग और बाजार पहुंच से जुड़े ठोस फैसले महत्वपूर्ण होंगे। खासकर भारतीय निर्यात बढ़ाने, व्यापार असंतुलन कम करने और नई औद्योगिक परियोजनाओं को वास्तविक निवेश में बदलने की क्षमता यह तय करेगी कि 100 अरब डॉलर का लक्ष्य कितनी तेजी से हासिल हो सकता है।