मुजफ्फरनगर में शिवसेना ने जिला पूर्ति विभाग पर राशन कार्ड बनाने और यूनिट बढ़ाने के नाम पर कथित अवैध वसूली के आरोप लगाए। संगठन ने डीएम कार्यालय पर प्रदर्शन कर जांच की मांग की। आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। प्रशासनिक जांच के बाद ही जिम्मेदारी और कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट होगी।
स्थान: मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश
तारीख: 26 अगस्त 2026
बाय:Mohd Naved
मुजफ्फरनगर में राशन कार्ड व्यवस्था को लेकर राजनीतिक विरोध और प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल सामने आया है। शिवसेना ने जिला पूर्ति विभाग पर नया राशन कार्ड बनाने और मौजूदा कार्ड में यूनिट बढ़ाने के नाम पर कथित तौर पर पैसे मांगने के आरोप लगाए हैं। संगठन ने जिलाधिकारी कार्यालय पर प्रदर्शन कर ज्ञापन सौंपा और मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की।
रिपोर्ट के मुताबिक, शिवसेना ने कुछ मामलों में 1500 से 2000 रुपये तक मांगे जाने का आरोप लगाया है। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और जिन अधिकारियों तथा कर्मचारियों पर आरोप लगाए गए हैं, उनकी तरफ से इस रिपोर्ट में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई।
शिवसेना के प्रदेश महासचिव डॉ. योगेंद्र शर्मा की अगुवाई में कार्यकर्ता मुजफ्फरनगर जिलाधिकारी कार्यालय पहुंचे। संगठन ने जिला पूर्ति विभाग की कार्यप्रणाली के खिलाफ प्रदर्शन किया और जिलाधिकारी को ज्ञापन दिया।
शिवसेना जिला अध्यक्ष लोकेश सैनी ने आरोप लगाया कि नया राशन कार्ड बनवाने और पुराने कार्ड में परिवार के सदस्यों की यूनिट बढ़ाने के लिए लोगों से कथित तौर पर 1500 से 2000 रुपये तक मांगे जा रहे हैं। संगठन ने इसे गरीब और जरूरतमंद परिवारों के अधिकार से जुड़ा गंभीर मामला बताया।
शिवसेना ने आरोप लगाया कि कुछ राशन विक्रेताओं के माध्यम से भी कथित लेनदेन की शिकायतें सामने आई हैं। संगठन ने ऑडियो और वीडियो सामग्री होने का दावा किया है। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्ट में इन सामग्रियों की स्वतंत्र फॉरेंसिक या प्रशासनिक पुष्टि का उल्लेख नहीं है।
राशन कार्ड व्यवस्था राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत पात्र परिवारों को खाद्यान्न उपलब्ध कराने की सार्वजनिक वितरण प्रणाली का अहम हिस्सा है। उत्तर प्रदेश में पात्र लाभार्थियों की हकदारी सुनिश्चित करने के लिए जिला स्तर पर शिकायत निवारण की व्यवस्था भी बताई गई है।
मुजफ्फरनगर जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट पर भी खाद्य एवं रसद विभाग से जुड़ी पात्र गृहस्थी राशन कार्ड संबंधी जानकारी उपलब्ध है। वेबसाइट पर इस व्यवस्था से संबंधित लाभार्थी सूचियां भी प्रकाशित की गई हैं।
इसलिए राशन कार्ड में किसी भी तरह की कथित अनियमितता का मामला केवल एक विभागीय शिकायत नहीं रह जाता। इसका सीधा ताल्लुक उन परिवारों से है जिनकी खाद्य सुरक्षा सरकारी वितरण प्रणाली पर निर्भर करती है।
शिवसेना का आरोप है कि कुछ पात्र परिवारों को राशन कार्ड बनवाने के लिए दफ्तर के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। संगठन के अनुसार, कुछ आवेदकों को कथित तौर पर साइट बंद होने या आवेदन नहीं होने की बात कहकर वापस भेजे जाने की शिकायत मिली है।
दूसरी तरफ संगठन ने दावा किया कि कुछ राशन दुकानों में पिछले 90 से 100 दिनों के दौरान नए राशन कार्डों और यूनिटों की संख्या में तेजी से बदलाव हुआ है। शिवसेना ने इन आंकड़ों की जांच कराने और पात्रता का भौतिक सत्यापन कराने की मांग की है।
यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि उपलब्ध रिपोर्ट में इन कथित बढ़ोतरी के स्वतंत्र सरकारी आंकड़े प्रकाशित नहीं हैं। इसलिए इन दावों को फिलहाल आरोप के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।
शिवसेना ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। संगठन चाहता है कि हाल के महीनों में जारी राशन कार्डों और बढ़ाई गई यूनिटों का रिकॉर्ड खंगाला जाए और जरूरत पड़ने पर घर-घर सत्यापन कराया जाए।
शिवसेना मंडल अध्यक्ष राजेश कश्यप ने लंबे समय से एक ही विभाग या स्थान पर तैनात कर्मचारियों की भूमिका की भी जांच की मांग की है। संगठन का आरोप है कि कुछ कर्मचारी तीन से चार वर्षों से एक ही जगह पर तैनात हैं।
दूसरी तरफ, उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार जिला पूर्ति विभाग या आरोपित अधिकारियों की ओर से इस मामले में कोई आधिकारिक सफाई सामने नहीं आई है। ऐसे में किसी व्यक्ति या अधिकारी को दोषी ठहराना जांच पूरी होने से पहले उचित नहीं होगा।
इस समय सबसे महत्वपूर्ण अंतर आरोप और प्रमाण के बीच है।
शिवसेना ने अवैध वसूली, अपात्र लोगों के राशन कार्ड बनने और यूनिट बढ़ाने के आरोप लगाए हैं। संगठन ने कथित ऑडियो-वीडियो सामग्री का भी जिक्र किया है। लेकिन उपलब्ध सार्वजनिक रिपोर्टों में ऐसी सामग्री की स्वतंत्र पुष्टि, फॉरेंसिक जांच या किसी सरकारी जांच रिपोर्ट का प्रमाण नहीं मिलता।
इसलिए फिलहाल तथ्यात्मक स्थिति यह है कि मामला शिकायत और राजनीतिक प्रदर्शन के स्तर पर है। आरोपों की पुष्टि या खंडन के लिए प्रशासनिक जांच, दस्तावेजी रिकॉर्ड और संबंधित लाभार्थियों के बयान अहम होंगे।
जांच में यह देखा जाना चाहिए कि किन तारीखों में कितने राशन कार्ड जारी हुए, कितनी यूनिट जोड़ी गईं, आवेदकों की पात्रता क्या थी और किसी भुगतान का प्रमाण मौजूद है या नहीं।
अगर आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो मामला केवल विभागीय लापरवाही तक सीमित नहीं रहेगा। कथित रिश्वतखोरी, रिकॉर्ड में अनियमितता और अपात्र लाभार्थियों को सरकारी सुविधा देने की स्थिति में संबंधित अधिकारियों और बिचौलियों की जवाबदेही तय करने की जरूरत पड़ेगी।
इसके उलट, यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते हैं तो प्रशासन को सार्वजनिक तौर पर स्थिति स्पष्ट करनी होगी। इससे गलत सूचना और अनावश्यक राजनीतिक विवाद को रोकने में मदद मिलेगी।
सबसे अहम असर वास्तविक पात्र परिवारों पर पड़ता है। राशन कार्ड की प्रक्रिया में देरी या गलत तरीके से यूनिट दर्ज होने से परिवार की खाद्यान्न हकदारी प्रभावित हो सकती है।
राशन कार्ड जैसे कल्याणकारी तंत्र में पारदर्शिता का सवाल राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील रहता है। शिवसेना का प्रदर्शन इसी मुद्दे को प्रशासनिक जवाबदेही के केंद्र में ला रहा है।
मुजफ्फरनगर जिला प्रशासन की आधिकारिक जानकारी के अनुसार जिलाधिकारी की जिम्मेदारियों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत उचित मूल्य की दुकानों पर आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना भी शामिल है।
इस लिहाज से शिकायत की निष्पक्ष जांच प्रशासन की विश्वसनीयता के लिए भी महत्वपूर्ण होगी।
गरीब परिवार के लिए 1500 या 2000 रुपये की कथित मांग छोटी रकम नहीं है। हालांकि, यहां भी स्पष्ट करना जरूरी है कि यह राशि शिवसेना द्वारा लगाए गए आरोपों में बताई गई है, किसी सरकारी जांच में प्रमाणित आंकड़ा नहीं।
अगर किसी पात्र परिवार को सरकारी सुविधा पाने के लिए अनधिकृत भुगतान करना पड़े तो इससे कल्याणकारी योजना का उद्देश्य कमजोर होता है। इससे बिचौलियों की भूमिका बढ़ने और वास्तविक लाभार्थियों के बीच अविश्वास पैदा होने का जोखिम रहता है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वास्तव में राशन कार्ड बनाने या यूनिट बढ़ाने के लिए पैसे मांगे गए।
दूसरा सवाल है कि जिन ऑडियो और वीडियो का संगठन ने जिक्र किया है, उनकी प्रामाणिकता क्या है।
तीसरा सवाल है कि पिछले 90 से 100 दिनों में संबंधित राशन दुकानों पर राशन कार्ड और यूनिटों की संख्या में कितना बदलाव हुआ।
चौथा सवाल है कि क्या इन बदलावों का विभागीय रिकॉर्ड और पात्रता दस्तावेजों से मिलान किया गया है।
पांचवां सवाल है कि जिला पूर्ति विभाग इस पूरे मामले पर आधिकारिक रूप से क्या जवाब देता है।
शिवसेना ने प्रशासन को एक सप्ताह का समय देने की बात कही है। संगठन ने चेतावनी दी है कि कार्रवाई नहीं होने पर जिला पूर्ति विभाग कार्यालय पर तालाबंदी और धरना किया जाएगा।
अब प्रशासन के सामने सबसे व्यावहारिक रास्ता रिकॉर्ड आधारित जांच का है। हाल में जारी राशन कार्डों, यूनिट वृद्धि, संबंधित राशन दुकानों और पात्रता दस्तावेजों का मिलान आरोपों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट कर सकता है।
जरूरत पड़ने पर शिकायतकर्ताओं से उपलब्ध साक्ष्य भी लिए जाने चाहिए। इसके बाद ही किसी अधिकारी, कर्मचारी, राशन विक्रेता या अन्य व्यक्ति की जिम्मेदारी तय की जा सकती है।
मुजफ्फरनगर में राशन कार्ड वसूली के आरोपों ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली की पारदर्शिता पर सवाल खड़ा किया है। फिलहाल उपलब्ध सामग्री में आरोप हैं, लेकिन स्वतंत्र जांच से प्रमाणित निष्कर्ष सामने नहीं आया है।
इसलिए इस मामले में राजनीतिक आरोप से आगे बढ़कर दस्तावेजी जांच जरूरी है। राशन कार्ड जारी करने और यूनिट बढ़ाने का रिकॉर्ड, लाभार्थियों की पात्रता, शिकायतों की प्रकृति और कथित ऑडियो-वीडियो की सत्यता की जांच ही यह तय करेगी कि आरोपों में कितना दम है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।