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NIA का Three-App Model का खुलासा, सोशल मीडिया से आतंकियों की नई भर्ती रणनीति

Asif Khan 2026-07-19 22:09:20
NIA का Three-App Model का खुलासा, सोशल मीडिया से आतंकियों की नई भर्ती रणनीति

NIA Three-App Model ने खोली डिजिटल आतंकवाद की नई परत


एनआईए थ्री-एप मॉडल, युवाओं को फंसाने का नया डिजिटल नेटवर्क बेनकाब


राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण की जांच में आतंकवाद से जुड़ा एक कथित "थ्री-एप मॉडल" सामने आया है, जिसमें सोशल मीडिया के जरिए संपर्क, एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म पर कट्टरपंथी सामग्री और क्रिप्टोकरेंसी के माध्यम से वित्तीय लेनदेन का आरोप है। जांच अभी जारी है और कई मामलों में न्यायिक प्रक्रिया लंबित है।



📍 New Delhi

📰 July 19, 2026

✍️ Asif Khan





NIA Three-App Model: डिजिटल प्लेटफॉर्म के सहारे आतंकवाद की बदलती रणनीति पर सुरक्षा एजेंसियों की बढ़ी चिंता



डिजिटल दौर में आतंकवाद का नया पैटर्न

राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (एनआईए) की हालिया जांच ने आतंकवाद के एक ऐसे कथित डिजिटल मॉडल की ओर ध्यान आकर्षित किया है, जिसने सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है। जांच के अनुसार, कुछ आतंकी मॉड्यूल युवाओं तक पहुंचने के लिए सोशल मीडिया, एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म और क्रिप्टोकरेंसी का इस्तेमाल कर रहे हैं। एनआईए ने इस पैटर्न को एक "थ्री-एप मॉडल" के रूप में चिन्हित किया है। हालांकि, एजेंसी के कई निष्कर्ष अभी न्यायिक प्रक्रिया के अधीन हैं और अंतिम फैसला अदालतों द्वारा किया जाना बाकी है।

जांच में क्या सामने आया

एनआईए के अनुसार, कथित भर्ती प्रक्रिया की शुरुआत इंस्टाग्राम जैसे लोकप्रिय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से होती है। शुरुआती बातचीत सामान्य विषयों से शुरू होती है, जिससे संभावित युवाओं का भरोसा हासिल किया जाता है। इसके बाद उन्हें टेलीग्राम जैसे एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म पर ले जाने का प्रयास किया जाता है, जहां बंद समूहों के माध्यम से वैचारिक सामग्री साझा किए जाने के आरोप हैं।

जांच एजेंसी का कहना है कि आगे चलकर कुछ मामलों में हिंसक विचारधारा से जुड़ी सामग्री, गुप्त संचार तकनीक और कथित आतंकी गतिविधियों से संबंधित निर्देश भी साझा किए गए। इन गतिविधियों के लिए वित्तीय लेनदेन में क्रिप्टोकरेंसी के इस्तेमाल की भी जांच की जा रही है।

तमिलनाडु, विजयवाड़ा और मंगलुरु से जुड़े मामले

एनआईए की विभिन्न जांचों में तमिलनाडु, विजयवाड़ा और मंगलुरु से जुड़े अलग-अलग मॉड्यूल सामने आए हैं। एजेंसी के अनुसार, इन मामलों में सोशल मीडिया समूहों, एन्क्रिप्टेड चैट और विदेशी संपर्कों की भूमिका की जांच की गई है।

जांच दस्तावेजों के अनुसार कुछ आरोपियों पर प्रतिबंधित आतंकी संगठनों से प्रेरित डिजिटल सामग्री साझा करने, युवाओं को जोड़ने और विदेशी हैंडलरों के संपर्क में रहने के आरोप लगाए गए हैं। इन आरोपों की न्यायालय में सुनवाई जारी है।

डिजिटल तकनीक ने क्यों बढ़ाई चुनौती

सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग सेवाएं, वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (वीपीएन), ऑटो-डिलीट संदेश, फर्जी डिजिटल पहचान और क्रिप्टोकरेंसी जैसी तकनीकों ने जांच एजेंसियों के सामने नई चुनौतियां खड़ी की हैं।

ऐसे प्लेटफॉर्म उपयोगकर्ताओं की निजता की रक्षा के लिए बनाए गए हैं, लेकिन जांच एजेंसियों का कहना है कि कुछ आपराधिक और आतंकी नेटवर्क इन सुविधाओं का दुरुपयोग करने का प्रयास करते हैं। यही कारण है कि साइबर फॉरेंसिक और डिजिटल इंटेलिजेंस की भूमिका पहले की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।

युवाओं को क्यों बनाया जा रहा है निशाना

जांच एजेंसियों के अनुसार, कथित नेटवर्क विशेष रूप से 18 से 30 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं तक पहुंचने की कोशिश करते हैं। सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने वाले विद्यार्थी और तकनीकी जानकारी रखने वाले युवा ऐसे संपर्कों के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि ऑनलाइन प्रचार अक्सर धार्मिक, सामाजिक या वैचारिक बहस के रूप में शुरू होता है और धीरे-धीरे कट्टरपंथी सामग्री की ओर बढ़ सकता है। हालांकि, यह समझना भी आवश्यक है कि अधिकांश सोशल मीडिया उपयोगकर्ता ऐसे किसी नेटवर्क का हिस्सा नहीं होते और डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग पूरी तरह वैध उद्देश्यों के लिए करते हैं।

पिछले वर्षों में बदला सुरक्षा परिदृश्य

भारत सहित अनेक देशों की सुरक्षा एजेंसियां पिछले कुछ वर्षों से डिजिटल कट्टरपंथ और ऑनलाइन भर्ती के मामलों पर विशेष निगरानी रख रही हैं। इंटरनेट की बढ़ती पहुंच और एन्क्रिप्टेड संचार सेवाओं ने आतंकी संगठनों के तौर-तरीकों में बदलाव लाया है।

भारतीय एजेंसियां लगातार साइबर निगरानी, डिजिटल फॉरेंसिक और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से ऐसे नेटवर्क की पहचान करने का प्रयास कर रही हैं। कई मामलों में विदेशी एजेंसियों के साथ भी सूचनाओं का आदान-प्रदान किया जाता है।

अलग-अलग दृष्टिकोण

राष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल माध्यमों का दुरुपयोग रोकने के लिए कानून प्रवर्तन एजेंसियों को आधुनिक तकनीकी संसाधनों से लैस करना आवश्यक है। उनका कहना है कि साइबर अपराध, आतंकवाद और संगठित अपराध के बीच संबंध पहले की तुलना में अधिक जटिल होते जा रहे हैं।

दूसरी ओर, डिजिटल अधिकारों से जुड़े विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि सुरक्षा उपायों और नागरिकों की निजता के अधिकार के बीच संतुलन बनाए रखना उतना ही आवश्यक है। उनका मानना है कि किसी भी कार्रवाई का आधार कानून, न्यायिक प्रक्रिया और ठोस साक्ष्य होने चाहिए।

इसका व्यापक प्रभाव

यदि जांच एजेंसियों के निष्कर्ष न्यायिक प्रक्रिया में पुष्ट होते हैं, तो भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति में डिजिटल प्लेटफॉर्म की निगरानी, साइबर इंटेलिजेंस और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को और अधिक महत्व मिल सकता है।

इसका असर सोशल मीडिया कंपनियों, एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग सेवाओं और क्रिप्टो लेनदेन की निगरानी से जुड़े नियामकीय ढांचे पर भी पड़ सकता है। भविष्य में डिजिटल सुरक्षा और ऑनलाइन कट्टरपंथ रोकने के लिए नई नीतियों पर चर्चा तेज होने की संभावना है।

सम्पादकीय दृष्टिकोण

एनआईए की जांच ने यह संकेत दिया है कि आतंकवाद का स्वरूप लगातार बदल रहा है और डिजिटल तकनीक उसके नए साधनों में शामिल होती जा रही है। हालांकि, किसी भी आरोपी के विरुद्ध अंतिम निष्कर्ष न्यायालय के निर्णय के बाद ही माना जाएगा।

राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ-साथ डिजिटल जागरूकता भी आज उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि संदिग्ध ऑनलाइन संपर्कों से सतर्क रहना, अपुष्ट प्रचार से बचना और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना संबंधित एजेंसियों को देना समाज और सुरक्षा व्यवस्था, दोनों के लिए महत्वपूर्ण कदम हो सकता है.

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Asif Khan

Asif Khan

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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