प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रक्षाबंधन पर सुख, समृद्धि और आपसी विश्वास की कामना की। विश्व संस्कृत दिवस पर उन्होंने संस्कृत को भारत के ज्ञान और चिंतन की निरंतर वाहक बताया।
📍 नई दिल्ली
🗓️ 28 अगस्त 2026
✍️Mohd Naved
पीएम मोदी ने रक्षाबंधन और विश्व संस्कृत दिवस पर दिया सांस्कृतिक संदेश
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को रक्षाबंधन और विश्व संस्कृत दिवस के अवसर पर देशवासियों को शुभकामनाएं दीं। दोनों संदेश श्रावण पूर्णिमा के अवसर से जुड़े हैं। प्रधानमंत्री ने एक संदेश में रक्षासूत्र की परंपरा से जुड़े संस्कृत सुभाषितम् को साझा किया, जबकि दूसरे संदेश में संस्कृत भाषा की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक भूमिका को रेखांकित किया।
प्रधानमंत्री के संदेशों में भारतीय परंपरा, पारस्परिक विश्वास, ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत जैसे विषय प्रमुख रहे। उन्होंने संस्कृत को भारत के ज्ञान, चिंतन और रचनात्मकता की निरंतर वाहक भाषा के रूप में प्रस्तुत किया।
रक्षाबंधन पर सुख और आपसी विश्वास की कामना
प्रधानमंत्री मोदी ने रक्षाबंधन की शुभकामनाएं देते हुए देशवासियों के जीवन में खुशहाली, समृद्धि और सफलता की कामना की। उन्होंने स्नेह, अपनत्व और आपसी विश्वास को इस पर्व से जुड़ी महत्वपूर्ण भावनाओं के तौर पर सामने रखा।
प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर एक संस्कृत सुभाषितम् भी साझा किया। यह श्लोक भविष्यपुराण के उत्तर पर्व के अध्याय 137 के श्लोक 7 में मिलता है। मूल पाठ में श्रीकृष्ण और युधिष्ठिर के संवाद के संदर्भ में रक्षासूत्र के प्रभाव का उल्लेख किया गया है।
श्लोक में रक्षासूत्र को विजय, सुख, संतान, स्वास्थ्य और धन से जुड़े मंगलकारी प्रभावों वाला बताया गया है। यह मूल धार्मिक ग्रंथ में वर्णित मान्यता है। इसे आधुनिक चिकित्सा, अर्थव्यवस्था या किसी अन्य वैज्ञानिक परिणाम के दावे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
यह अंतर महत्वपूर्ण है, क्योंकि धार्मिक ग्रंथों में मौजूद मान्यताओं और आधुनिक वैज्ञानिक निष्कर्षों का अपना अलग संदर्भ और प्रमाण-पद्धति होती है। प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में इस प्राचीन सुभाषितम् को रक्षाबंधन की सांस्कृतिक परंपरा से जोड़कर साझा किया।
भविष्यपुराण में रक्षासूत्र का संदर्भ
भविष्यपुराण के उत्तर पर्व के अध्याय 137 में रक्षाबंधन से संबंधित प्रसंग मिलता है। इसमें देवासुर संघर्ष की पृष्ठभूमि में रक्षाबंधन के प्रभाव का वर्णन किया गया है। इसके बाद श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को रक्षासूत्र से जुड़े विधान और उसके महत्व के बारे में बताते हैं।
श्लोक 7 में कहा गया है कि रक्षासूत्र विजय और सुख देने वाला तथा संतान, आरोग्य और धन प्रदान करने वाला बताया गया है। अध्याय के आगे के हिस्से में श्रावण पूर्णिमा पर रक्षाविधान का उल्लेख भी मिलता है।
इस संदर्भ से यह स्पष्ट होता है कि रक्षाबंधन की परंपरा केवल आधुनिक भाई-बहन के संबंध तक सीमित सांस्कृतिक अभिव्यक्ति नहीं है। इसके धार्मिक और अनुष्ठानिक संदर्भ प्राचीन ग्रंथों में भी मिलते हैं। हालांकि अलग-अलग कालखंडों में इसके सामाजिक रूप और प्रचलित रीति-रिवाजों में बदलाव आया है।
विश्व संस्कृत दिवस पर संस्कृत को लेकर संदेश
प्रधानमंत्री मोदी ने विश्व संस्कृत दिवस पर संस्कृत में संदेश साझा किया। उन्होंने श्रावण पूर्णिमा के अवसर पर संस्कृत की चिरंतन समृद्धि के उत्सव की बात कही। उनके अनुसार संस्कृत भारत के ज्ञान, चिंतन और सर्जनशीलता की निरंतर वाहक रही है।
प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि संस्कृत का सकारात्मक प्रभाव आज भी अनेक क्षेत्रों में देखा जा सकता है। उन्होंने भारत और दुनिया के उन लोगों की सराहना की जो संस्कृत पढ़ते और पढ़ाते हैं तथा इस भाषा में निहित ज्ञान-परंपरा को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए प्रयासरत हैं।
यह संदेश संस्कृत को केवल एक प्राचीन भाषा के रूप में देखने के बजाय ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत के संदर्भ में प्रस्तुत करता है। प्रधानमंत्री के संदेश में भाषा के अध्ययन, अध्यापन और भावी पीढ़ियों तक इसके ज्ञान-संसाधनों को पहुंचाने पर जोर दिखाई देता है।
संस्कृत की भूमिका पर बढ़ती चर्चा
भारत में संस्कृत का संबंध धार्मिक और दार्शनिक साहित्य के साथ-साथ व्याकरण, साहित्य, दर्शन और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों से रहा है। संस्कृत में रचित अनेक प्राचीन ग्रंथ भारतीय बौद्धिक परंपरा के महत्वपूर्ण स्रोत माने जाते हैं।
विश्व संस्कृत दिवस इसी व्यापक सांस्कृतिक संदर्भ में मनाया जाता है। श्रावण पूर्णिमा के दिन इसके आयोजन से संस्कृत को भारतीय परंपरा और शिक्षा की ऐतिहासिक धारा से जोड़ा जाता है।
हाल के वर्षों में संस्कृत को लेकर शिक्षा, शोध और संरक्षण के स्तर पर भी चर्चा बढ़ी है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति और भारतीय भाषाओं से जुड़े विमर्श में संस्कृत की स्थिति को लेकर अलग-अलग स्तरों पर पहल और बहस जारी रही है।
हालांकि किसी भी भाषा की वास्तविक स्थिति का आकलन केवल सरकारी घोषणाओं या सांस्कृतिक आयोजनों से नहीं होता। इसके लिए स्कूलों और विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या, प्रशिक्षित शिक्षकों की उपलब्धता, शोध प्रकाशन, आधुनिक पाठ्यसामग्री और रोजगार से जुड़े अवसर जैसे ठोस संकेतकों को देखना जरूरी होता है।
रक्षाबंधन का बदलता सामाजिक स्वरूप
रक्षाबंधन आज भारत के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग सामाजिक और पारिवारिक परंपराओं के साथ मनाया जाता है। भाई-बहन के रिश्ते में स्नेह और पारस्परिक जिम्मेदारी इसका प्रमुख सामाजिक पक्ष है।
प्रधानमंत्री के संदेश में भी स्नेह, अपनत्व और आपसी विश्वास को विशेष स्थान मिला। यह शब्दावली रक्षाबंधन को केवल धार्मिक अनुष्ठान के बजाय सामाजिक संबंधों और पारिवारिक जुड़ाव से भी जोड़ती है।
समय के साथ इस पर्व की अभिव्यक्ति बदली है। पारंपरिक राखी के साथ परिवारों में उपहार, शुभकामनाएं और डिजिटल माध्यम से बधाई देने का चलन बढ़ा है। इसके बावजूद पर्व का केंद्रीय भाव रिश्तों में विश्वास और शुभकामना से जुड़ा हुआ है।
संस्कृति और सार्वजनिक संवाद
प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रीय अवसरों पर प्राचीन ग्रंथों के सुभाषितम् साझा करने की परंपरा उनके सार्वजनिक संवाद का एक हिस्सा रही है। इससे भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक सार्वजनिक जीवन के बीच संबंध को लेकर चर्चा होती रही है।
इस तरह के संदेशों का प्रभाव केवल धार्मिक या सांस्कृतिक दायरे तक सीमित नहीं रहता। ये भाषा, शिक्षा, इतिहास और सांस्कृतिक पहचान को लेकर व्यापक सार्वजनिक विमर्श को भी प्रभावित करते हैं।
इसके साथ यह भी जरूरी है कि सांस्कृतिक विरासत पर चर्चा करते समय ऐतिहासिक स्रोत, धार्मिक मान्यता और आधुनिक तथ्यात्मक दावे अलग-अलग रखे जाएं। इससे सार्वजनिक संवाद अधिक तथ्यपरक और संतुलित रहता है।
इस संदेश का व्यापक संदर्भ
इस वर्ष रक्षाबंधन और विश्व संस्कृत दिवस एक ही श्रावण पूर्णिमा के अवसर पर आए हैं। प्रधानमंत्री ने दोनों अवसरों को अलग-अलग संदेशों के जरिए संबोधित किया। एक ओर उन्होंने पारिवारिक संबंधों और रक्षासूत्र की परंपरा पर शुभकामना दी, दूसरी ओर संस्कृत की ज्ञान परंपरा और उसके संरक्षण से जुड़े लोगों को सम्मानित किया।
दोनों संदेशों में एक साझा सांस्कृतिक तत्व दिखाई देता है। वह है परंपरा और ज्ञान को वर्तमान सामाजिक जीवन से जोड़ना। रक्षाबंधन के संदर्भ में यह पारस्परिक विश्वास के रूप में सामने आता है, जबकि संस्कृत दिवस के संदर्भ में ज्ञान और रचनात्मकता की विरासत के रूप में।
यह दृष्टिकोण भारतीय सांस्कृतिक कैलेंडर में भाषा और परंपरा की भूमिका को रेखांकित करता है। साथ ही यह सवाल भी सामने रखता है कि प्राचीन ज्ञान को नई पीढ़ी तक किस तरह आधुनिक शिक्षा, शोध और सार्वजनिक संवाद के जरिए पहुंचाया जाए।
आगे की चुनौती संरक्षण से आगे बढ़ने की
संस्कृत के संरक्षण की चर्चा में केवल विरासत और गौरव का उल्लेख पर्याप्त नहीं है। भाषा को जीवंत बनाए रखने के लिए नियमित अध्ययन, गुणवत्तापूर्ण अध्यापन, आधुनिक शोध और नई पीढ़ी के लिए उपयोगी पाठ्य सामग्री जरूरी है।
इसी तरह रक्षाबंधन जैसे पर्वों का सामाजिक महत्व भी तभी मजबूत रहता है जब इनके मूल संदेश को पारिवारिक और सामाजिक व्यवहार में स्थान मिले। आपसी विश्वास, सम्मान और जिम्मेदारी जैसे मूल्यों को केवल पर्व विशेष तक सीमित रखने के बजाय रोजमर्रा के जीवन में भी महत्व देना जरूरी है।
प्रधानमंत्री के शुक्रवार के दोनों संदेश इसी व्यापक सांस्कृतिक संदर्भ में देखे जा सकते हैं। रक्षाबंधन पर उन्होंने स्नेह और विश्वास की कामना की, जबकि विश्व संस्कृत दिवस पर संस्कृत की ज्ञान और चिंतन परंपरा को याद किया।
श्रावण पूर्णिमा के इस अवसर पर दोनों संदेश भारतीय परंपरा के दो अलग पहलुओं को सामने लाते हैं। एक पक्ष पारिवारिक और सामाजिक रिश्तों का है, दूसरा भाषा और ज्ञान की विरासत का। दोनों के बीच साझा कड़ी सांस्कृतिक निरंतरता है।
पाठकों के लिए संदर्भ
प्रधानमंत्री द्वारा साझा किया गया रक्षाबंधन का सुभाषितम् भविष्यपुराण के उत्तर पर्व के अध्याय 137 में उपलब्ध है। इसलिए इसे किसी आधुनिक रचना या समकालीन दावे के रूप में नहीं, बल्कि प्राचीन धार्मिक साहित्य में दर्ज एक संदर्भ के रूप में समझना उचित है।
विश्व संस्कृत दिवस पर प्रधानमंत्री का संदेश संस्कृत में था और उसमें भाषा के ज्ञान, चिंतन तथा सर्जनात्मक विरासत पर जोर दिया गया। उन्होंने भारत और विदेशों में संस्कृत पढ़ने-पढ़ाने वालों तथा इसके ज्ञान को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने वालों की सराहना की।
रक्षाबंधन और विश्व संस्कृत दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री के संदेशों ने इस वर्ष सांस्कृतिक परंपरा, पारिवारिक विश्वास और भाषाई विरासत को एक साथ सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में रखा है।