भारतीय कृषि एक्सपोर्ट पर क्यों उठ रहे सवाल?
जापान से चीन तक भारतीय कृषि उत्पादों पर सख्ती क्यों?
आम, चावल और मसालों पर विदेशी बाजारों की निगरानी बढ़ी
भारतीय कृषि एक्सपोर्ट को जापान, चीन, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया में अलग-अलग नियामकीय चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। आम, चावल और मसालों पर जांच बढ़ी है। मुद्दे पेस्टिसाइड रेजिड्यू, जीएमओ टेस्टिंग, क्वारंटीन, फ्यूमिगेशन और ट्रेसबिलिटी से जुड़े हैं। इससे निर्यातकों, किसानों और भारत की वैश्विक कृषि बाजार हिस्सेदारी पर दबाव बढ़ने की आशंका है।
भारत दुनिया के बड़े कृषि उत्पादक देशों में शामिल है। लेकिन विदेशी बाजारों में भारतीय कृषि उत्पादों की एंट्री को लेकर हाल के महीनों में कई अलग-अलग नियामकीय सवाल सामने आए हैं।
जापान ने भारतीय आमों के लिए क्वारंटीन और ट्रीटमेंट प्रक्रियाओं पर आपत्ति जताई। चीन ने तीन भारतीय चावल एक्सपोर्टर्स के इंपोर्ट लाइसेंस रद्द किए और खेपों में जीएमओ के कथित निशान का हवाला दिया। यूरोपीय संघ ने भारतीय जीरे पर पेस्टिसाइड रेजिड्यू को लेकर जांच की आवृत्ति बढ़ाई है। ऑस्ट्रेलिया ने भी भारतीय फ्यूमिगेशन सर्विस प्रोवाइडर्स पर कार्रवाई की है।
इन घटनाओं को एक ही तरह का “बैन” कहना सही नहीं होगा। अलग-अलग देशों के मामलों में वजह और नियामकीय कार्रवाई अलग है। लेकिन सभी घटनाएं एक बड़े सवाल की तरफ इशारा करती हैं, क्या भारत की कृषि सप्लाई चेन अंतरराष्ट्रीय बाजारों की बढ़ती क्वालिटी, ट्रेसबिलिटी और बायोसिक्योरिटी मांगों के मुताबिक तैयार है?
2026 में जापान ने भारत से ताजा आमों के आयात को रोक दिया। अल जज़ीरा के मुताबिक मार्च में जापानी क्वारंटीन इंस्पेक्टरों ने लखनऊ के रेहमनपुर स्थित वेपर हीट ट्रीटमेंट यानी वीएचटी फैसिलिटी का निरीक्षण किया था।
जापानी अधिकारियों ने फ्यूमिगेशन, डिसइन्फेक्शन और सर्टिफिकेशन प्रक्रियाओं पर आपत्ति जताई। इसके बाद 31 मार्च को योकोहामा के प्लांट प्रोटेक्शन अधिकारियों ने भारतीय अधिकारियों को बताया कि 25 मार्च या उसके बाद जारी सर्टिफिकेट वाले आमों की खेप स्वीकार नहीं की जाएगी, जब तक ऑपरेशनल स्टैंडर्ड में सुधार की पुष्टि नहीं होती।
यह मामला इसलिए अहम था क्योंकि जापान में भारतीय आमों का बाजार मात्रा के लिहाज़ से बहुत बड़ा नहीं है, लेकिन इसकी प्रीमियम क्रेडिबिलिटी काफी महत्वपूर्ण है।
2025-26 में जापान ने भारत से करीब 1.54 मिलियन डॉलर के ताजा और प्रोसेस्ड आम उत्पाद आयात किए। जापानी बाजार की अहमियत इसलिए भी है क्योंकि वहां मंजूरी मिलना दूसरे प्रीमियम बाजारों में भारतीय उत्पाद की क्वालिटी के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जाता है।
इस बार प्रभावित छह मंजूरशुदा किस्मों में अल्फांसो, केसर, लंगड़ा, बांगनापल्ली, चौसा और मल्लिका शामिल हैं। यह रोक अप्रैल से जून के पीक एक्सपोर्ट सीजन के दौरान सामने आई।
यहां एक अहम फैक्ट-चेक जरूरी है।
जापान की कार्रवाई को भारतीय आमों में पेस्टिसाइड पाए जाने की कार्रवाई के तौर पर पेश करना सटीक नहीं होगा। उपलब्ध रिपोर्टिंग के मुताबिक मुख्य चिंता फल-मक्खी नियंत्रण और वीएचटी फैसिलिटी की ऑपरेशनल प्रक्रियाओं, डिसइन्फेक्शन और सर्टिफिकेशन से जुड़ी थी।
यानी मामला सीधे तौर पर “आम जहरीले पाए गए” जैसी बात नहीं है। यह क्वारंटीन और बायोसिक्योरिटी सिस्टम की विश्वसनीयता से जुड़ा है।
जापान ने इससे पहले 1986 में भी भारतीय आमों पर प्रतिबंध लगाया था। 2006 में वीएचटी इंफ्रास्ट्रक्चर, पेस्ट सर्विलांस और सालाना निरीक्षण व्यवस्था मजबूत होने के बाद प्रतिबंध हटाया गया था।
17 अप्रैल को चीन ने तीन भारतीय चावल एक्सपोर्टर्स के इंपोर्ट लाइसेंस रद्द किए। चीन के जनरल एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ कस्टम्स ने खेपों में कथित तौर पर जेनेटिकली मॉडिफाइड ऑर्गेनिज्म यानी जीएमओ के निशान मिलने की बात कही।
भारतीय एक्सपोर्टर्स ने इस निष्कर्ष को चुनौती दी। उनका कहना था कि खेपों को रवाना होने से पहले जीएमओ-फ्री सर्टिफिकेट मिले थे। भारत सरकार ने भी घरेलू धान और चावल की खेती में जेनेटिक मॉडिफिकेशन नहीं होने की बात कही।
इस मामले में इसलिए सावधानी जरूरी है। चीन का दावा और भारतीय एक्सपोर्टर्स का पक्ष दोनों मौजूद हैं। उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहना उचित नहीं होगा कि भारतीय चावल में जीएमओ की मौजूदगी अंतिम रूप से साबित हो चुकी है।
मामले के बाद एपीडा ने चीन जाने वाली चावल खेपों के लिए जीएमओ टेस्टिंग से जुड़े अधिकृत लैब्स की सूची जारी की।
चीन के मामले ने एक दूसरी समस्या सामने रखी। अलग-अलग देशों की अलग टेस्टिंग जरूरतों के लिए भारत में लैब इंफ्रास्ट्रक्चर कितना तैयार है?
कृषि वैज्ञानिक एसके सिंह ने कहा कि भारतीय लैब्स ने लंबे समय तक पेस्टिसाइड रेजिड्यू और अफ्लाटॉक्सिन टेस्टिंग पर ज्यादा विशेषज्ञता विकसित की, जबकि चीन की जीएमओ वेरिफिकेशन जरूरत के लिए अलग तरह की क्षमता चाहिए।
रिपोर्ट के मुताबिक आवश्यक प्रोटीन एनालिसिस करने वाली सीमित संख्या में फैसिलिटीज नई दिल्ली और हैदराबाद में केंद्रित हैं। इसका मतलब यह है कि पंजाब और हरियाणा जैसे प्रमुख चावल उत्पादक राज्यों के एक्सपोर्टर्स को सैंपल सैकड़ों किलोमीटर दूर भेजने पड़ सकते हैं।
यह समस्या केवल लैब की संख्या की नहीं है। एक्सपोर्ट टेस्टिंग में स्पीड, सैंपल ट्रेसिंग, सर्टिफिकेशन की विश्वसनीयता और विदेशी नियामकों के साथ डेटा इंटरऑपरेबिलिटी भी अहम होती है।
भारतीय मसालों को लेकर यूरोपीय बाजार में भी लंबे समय से पेस्टिसाइड रेजिड्यू और अन्य कंटैमिनेशन को लेकर जांच चलती रही है।
रिपोर्ट के मुताबिक यूरोपीय संघ ने 2024 में अपने रैपिड अलर्ट सिस्टम पर भारतीय मसालों से जुड़े 312 अलर्ट दर्ज किए थे। इसके बाद भारतीय जीरे पर जांच की आवृत्ति 2025 में बढ़ाई गई थी।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अपडेट है। यूरोपीय आयोग के 2026 के संशोधित नियम के मुताबिक भारतीय जीरे की खेपों पर आइडेंटिटी और फिजिकल चेक की आवृत्ति अब 50 प्रतिशत तक बढ़ाई गई है। आयोग ने इसके पीछे आधिकारिक जांच में पेस्टिसाइड रेजिड्यू से जुड़ी उच्च गैर-अनुपालन दर को कारण बताया है।
यानी इस मामले में विदेशी नियामक की सख्ती केवल मीडिया रिपोर्ट का हिस्सा नहीं है। यह यूरोपीय संघ के आधिकारिक रेगुलेटरी रिकॉर्ड में दर्ज है।
यहां एक और जरूरी फर्क समझना होगा।
जापान का आम मामला क्वारंटीन प्रक्रिया से जुड़ा है। चीन का मामला जीएमओ टेस्टिंग विवाद से जुड़ा है। यूरोपीय संघ का मामला मुख्य रूप से पेस्टिसाइड रेजिड्यू और इंपोर्ट कंट्रोल से जुड़ा है। ऑस्ट्रेलिया में कार्रवाई फ्यूमिगेशन सर्विस प्रोवाइडर्स पर हुई है।
इसलिए इन घटनाओं को एक ही कैटेगरी में रखकर “दुनिया ने भारतीय कृषि उत्पादों को खारिज कर दिया” कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
लेकिन इन्हें पूरी तरह अलग-थलग घटनाएं मानना भी मुश्किल है। इन मामलों में बार-बार ट्रेसबिलिटी, टेस्टिंग, ट्रीटमेंट, सर्टिफिकेशन और सप्लाई चेन कंट्रोल जैसे मुद्दे सामने आ रहे हैं।
जुलाई 2026 में ऑस्ट्रेलिया ने 44 भारतीय फ्यूमिगेशन सर्विस प्रोवाइडर्स के लाइसेंस सस्पेंड किए। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक ये एजेंसियां ऑस्ट्रेलिया जाने वाली कृषि खेपों के लिए ट्रीटमेंट सर्टिफिकेट जारी करती थीं।
इसका असर भारतीय बासमती एक्सपोर्ट पर पड़ा, लेकिन एक अहम बात फिर स्पष्ट होनी चाहिए। ऑस्ट्रेलिया ने भारतीय बासमती के आयात पर सामान्य प्रतिबंध नहीं लगाया था। कार्रवाई फ्यूमिगेशन प्रोवाइडर्स की मान्यता पर थी।
भारतीय उद्योग से जुड़ी रिपोर्टों के मुताबिक 100 से अधिक कंटेनर प्रभावित हो सकते थे और करीब 200 करोड़ रुपये मूल्य की खेपों पर असर पड़ने का अनुमान था। कुछ मामलों में दोबारा फ्यूमिगेशन की जरूरत और अतिरिक्त लागत का जोखिम भी सामने आया।
ऑस्ट्रेलिया के कृषि विभाग के आधिकारिक रिकॉर्ड में 2026 के दौरान कई भारतीय ट्रीटमेंट प्रोवाइडर्स को सस्पेंड या रिव्यू किए जाने की सूचनाएं दर्ज हैं।
इन घटनाओं का असर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कृषि एक्सपोर्ट भारत की विदेशी व्यापार रणनीति का अहम हिस्सा है।
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक 2025-26 में भारत का कृषि एक्सपोर्ट करीब 53.1 अरब डॉलर रहा, जो 2024-25 के 52 अरब डॉलर से 2.3 प्रतिशत अधिक था।
यानी अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय कृषि उत्पादों की मांग कमजोर नहीं हुई है। असल चुनौती बाजार तक पहुंच और वहां लंबे समय तक भरोसा बनाए रखने की है।
यूरोपीय संघ भी भारत को कृषि व्यापार में महत्वपूर्ण साझेदार मानता है। उसके अनुसार भारत बासमती चावल का प्रमुख उत्पादक है और यूरोपीय बाजार में कॉफी, फल, सब्जियां, नट्स और मसाले भी अहम श्रेणियां हैं।
यह सवाल सीधा नहीं है।
किसान फसल उगाता है। फिर एग्रीगेटर, ट्रेडर, प्रोसेसर, पैकर, लैब और एक्सपोर्टर जैसी कई कड़ियां जुड़ती हैं। अगर किसी एक स्तर पर इस्तेमाल हुए केमिकल, ट्रीटमेंट या हैंडलिंग का डिजिटल रिकॉर्ड टूट जाता है, तो विदेशी नियामक के लिए पूरी खेप की ट्रेसबिलिटी मुश्किल हो सकती है।
अल जज़ीरा की रिपोर्ट में फूड सेफ्टी वैज्ञानिक अनन्या बोस ने इसी सप्लाई चेन fragmentation की ओर इशारा किया। उनके मुताबिक खेत से पहली बिक्री तक रिकॉर्ड मौजूद रहता है, लेकिन आगे की कड़ियों में यह जानकारी कमजोर पड़ सकती है।
यही वजह है कि डिजिटल पेस्टिसाइड रिकॉर्ड, फार्म-टू-पोर्ट ट्रेसबिलिटी और रिस्क-बेस्ड टेस्टिंग अब केवल टेक्नोलॉजी का मुद्दा नहीं रहे। ये एक्सपोर्ट कॉम्पिटिटिवनेस का हिस्सा बन चुके हैं।
पूरी तस्वीर केवल नाकामियों की नहीं है।
अल जज़ीरा की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले एक दशक में मान्यता प्राप्त लैब्स की संख्या 22 से बढ़कर 89 हुई और अप्रूव्ड एक्सपोर्ट सर्टिफिकेट लगभग 61,000 से बढ़कर 1.70 लाख से ज्यादा हुए।
भारत सरकार भी लैब क्षमता, रिस्क-बेस्ड इंस्पेक्शन, डिजिटल सिस्टम और रेजिड्यू मॉनिटरिंग को मजबूत करने की बात कह रही है। वाणिज्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारी उज्ज्वल कुमार घोष ने पेस्टिसाइड, एंटीबायोटिक रेजिड्यू और अफ्लाटॉक्सिन पर नियंत्रण बढ़ाने की जरूरत बताई है।
एफएसएसएआई के मुताबिक देश में फूड टेस्टिंग और सर्विलांस के लिए बड़ी संख्या में लैब्स और नियामकीय ढांचा मौजूद है। जुलाई 2026 तक एफएसएसएआई ने 17 जुलाई 2026 की तारीख के साथ मान्यता प्राप्त प्राइमरी और रेफरल फूड लैब्स की सूची भी अपडेट की है।
इसलिए समस्या “भारत में टेस्टिंग होती ही नहीं” जैसी नहीं है। असली सवाल इसकी पहुंच, एकरूपता, गति और एक्सपोर्ट सप्लाई चेन में प्रभावी इस्तेमाल का है।
भारत की कृषि व्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा छोटे किसानों पर निर्भर है। अल जज़ीरा के मुताबिक दो हेक्टेयर से कम जमीन वाले किसान देश के 86 प्रतिशत से अधिक cultivators हैं।
ऐसे किसानों के लिए हर खेप पर अतिरिक्त टेस्टिंग, ग्रेडिंग, पैकेजिंग, कोल्ड चेन और ट्रेसबिलिटी की लागत बड़ी चुनौती बन सकती है।
अगर एक्सपोर्ट मार्केट सख्त होते हैं और अनुपालन की लागत बढ़ती है, तो बड़ी कंपनियां बेहतर तरीके से इन मानकों को पूरा कर सकती हैं। छोटे किसानों के लिए सहकारी मॉडल, साझा टेस्टिंग सुविधा और डिजिटल रिकॉर्ड सिस्टम ज्यादा जरूरी हो जाते हैं।
भारत के पास उत्पादन क्षमता है। समस्या उत्पादन से आगे की है।
जापान उच्च क्वारंटीन और ट्रीटमेंट अनुपालन देखता है। चीन अलग जीएमओ टेस्टिंग की मांग करता है। यूरोप पेस्टिसाइड रेजिड्यू के लिए कड़े एमआरएल लागू करता है। ऑस्ट्रेलिया फ्यूमिगेशन और बायोसिक्योरिटी पर सख्त है।
यानी एक ही भारतीय कृषि उत्पाद को अलग-अलग बाजारों में अलग-अलग अनुपालन मानकों से गुजरना पड़ता है।
भारत के लिए इसका मतलब है कि “एक टेस्ट, एक सर्टिफिकेट और हर बाजार में एक्सपोर्ट” वाला मॉडल पर्याप्त नहीं होगा। अलग बाजारों की नियामकीय जरूरतों के मुताबिक प्रमाणन और ट्रेसबिलिटी सिस्टम को ज्यादा इंटरऑपरेबल बनाना होगा।
अगर किसी प्रीमियम बाजार तक पहुंच बाधित होती है, तो असर केवल एक्सपोर्टर तक सीमित नहीं रहता।
जापानी आम बाजार का उदाहरण इसका संकेत देता है। अल जज़ीरा के मुताबिक कुछ किसानों और एक्सपोर्टर्स ने जापानी बाजार के लिए ग्रेडिंग, हैंडलिंग और पेस्ट मैनेजमेंट पर निवेश किया था। आयात रुकने से ऐसे निवेश की वापसी पर असर पड़ा।
इसी तरह ऑस्ट्रेलिया में फ्यूमिगेशन प्रोवाइडर्स पर कार्रवाई से बासमती सप्लाई चेन में अतिरिक्त लागत और देरी का जोखिम सामने आया।
लंबे समय में सबसे बड़ा नुकसान बाजार की क्रेडिबिलिटी को हो सकता है। एक खरीदार को यदि बार-बार अनुपालन संबंधी समस्या दिखती है, तो वह अतिरिक्त टेस्टिंग या दूसरे सप्लायर की तरफ जा सकता है।
पहली जरूरत farm-to-port digital traceability की है। किसान ने कौन-सा पेस्टिसाइड कब इस्तेमाल किया, किस मात्रा में किया, किसने खरीदा, किस प्रोसेसर तक पहुंचा और किस लैब ने टेस्ट किया, इसका डिजिटल रिकॉर्ड होना चाहिए।
दूसरी जरूरत टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को उत्पादन क्षेत्रों के करीब लाने की है। इससे सैंपल ट्रांसपोर्ट का समय घटेगा और एक्सपोर्टर्स को तेजी से सर्टिफिकेशन मिल सकेगा।
तीसरी जरूरत एक्सपोर्ट क्वालिटी कंट्रोल की जिम्मेदारी को केवल आखिरी चरण तक सीमित नहीं रखना है। विदेशी नियामक अक्सर खेत से लेकर शिपमेंट तक पूरी प्रक्रिया देखते हैं।
चौथी जरूरत किसानों और छोटे एग्रीगेटर्स को अंतरराष्ट्रीय एमआरएल, क्वारंटीन और बायोसिक्योरिटी नियमों की ट्रेनिंग देना है।
भारतीय कृषि एक्सपोर्ट की मौजूदा तस्वीर केवल संकट की कहानी नहीं है।
भारत का कृषि एक्सपोर्ट 2025-26 में 53.1 अरब डॉलर तक पहुंचा। इसका मतलब है कि वैश्विक बाजार में भारतीय उत्पादों की मांग और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता मौजूद है।
अब चुनौती उत्पादन बढ़ाने से ज्यादा गुणवत्ता को लगातार साबित करने की है।
यूरोपीय संघ के आधिकारिक रिकॉर्ड में भी कुछ भारतीय उत्पादों के अनुपालन में सुधार दर्ज है। उदाहरण के लिए, भारत से आने वाली कुछ मिर्चों पर अफ्लाटॉक्सिन को लेकर बढ़ी हुई जांच को हटाया गया क्योंकि आधिकारिक नियंत्रणों में अनुपालन संतोषजनक पाया गया। उसी नियमन में जीरे पर पेस्टिसाइड रेजिड्यू को लेकर जांच बढ़ाई गई।
यह बताता है कि अंतरराष्ट्रीय नियामकीय सिस्टम में बेहतर अनुपालन का सीधा फायदा भी मिल सकता है।
भारतीय कृषि एक्सपोर्ट के सामने अब असली सवाल यह नहीं है कि विदेशी बाजारों में मानक सख्त क्यों हैं। सवाल यह है कि भारत उन मानकों को अपनी उत्पादन व्यवस्था का स्थायी हिस्सा कितनी तेजी से बनाता है।
अगर ट्रेसबिलिटी, लैब क्षमता, क्वारंटीन अनुपालन और फ्यूमिगेशन सर्टिफिकेशन में सुधार होता है, तो भारत प्रीमियम बाजारों में अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है।
अगर सुधार केवल किसी विदेशी आपत्ति के बाद शुरू होते हैं, तो हर नया बाजार एक नई अनुपालन चुनौती लेकर आएगा।
इस लिहाज़ से जापान, चीन, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया के मामले अलग-अलग घटनाएं होते हुए भी एक साझा संदेश देते हैं। वैश्विक कृषि व्यापार में अब केवल ज्यादा उत्पादन पर्याप्त नहीं है। खरीदार को पूरी सप्लाई चेन की विश्वसनीयता का सबूत भी चाहिए।
भारतीय कृषि एक्सपोर्ट के सामने मौजूदा चुनौतियों को केवल विदेशी “सख्ती” या केवल भारतीय “नाकामी” के रूप में देखना दोनों ही अधूरा नज़रिया होगा।
जापान का आम मामला क्वारंटीन और वीएचटी प्रक्रिया से जुड़ा है। चीन का चावल विवाद जीएमओ टेस्टिंग पर केंद्रित है। यूरोपीय संघ भारतीय जीरे में पेस्टिसाइड रेजिड्यू को लेकर अपनी जांच बढ़ा चुका है। ऑस्ट्रेलिया ने फ्यूमिगेशन सर्विस प्रोवाइडर्स पर कार्रवाई की है।
लेकिन इन सभी मामलों में एक साझा चुनौती जरूर दिखाई देती है, एक्सपोर्ट सप्लाई चेन में भरोसेमंद ट्रेसबिलिटी और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप लगातार अनुपालन।
भारत के पास उत्पादन, किसान आधार, कृषि विविधता और बड़ा एक्सपोर्ट बाजार है। अब उसे इन ताकतों के साथ ऐसी टेस्टिंग और सर्टिफिकेशन व्यवस्था जोड़नी होगी, जिस पर विदेशी खरीदार भी भरोसा करें।
कृषि एक्सपोर्ट की अगली पेशरफ़्त केवल खेत में नहीं होगी। उसकी असली परीक्षा लैब, पैकेजिंग सेंटर, क्वारंटीन फैसिलिटी, डिजिटल रिकॉर्ड और बंदरगाह तक पूरी सप्लाई चेन में होगी।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।