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रात 12 बजे रील्स और एएमए सेशन, सीजेपी प्रोटेस्ट के बाद कैसे बदला मोदी-राहुल का इंस्टाग्राम अंदाज़

Asif Khan 2026-08-26 15:33:05
रात 12 बजे रील्स और एएमए सेशन, सीजेपी प्रोटेस्ट के बाद कैसे बदला मोदी-राहुल का इंस्टाग्राम अंदाज़

मोदी-राहुल का इंस्टाग्राम गेम क्यों बदला?

प्रोटेस्ट के बाद नेताओं का डिजिटल अंदाज़ बदला

पार्टी से ज्यादा नेता क्यों बटोर रहे हैं इंगेजमेंट?


सीजेपी प्रोटेस्ट के बाद मोदी और राहुल गांधी के इंस्टाग्राम इंगेजमेंट में तेज़ उछाल दर्ज हुआ। डेटा बीइंग्स के मुताबिक मोदी का औसत इंगेजमेंट 289.9% और राहुल का 180.7% बढ़ा। पार्टी अकाउंट्स पीछे रहे। ट्रेंड बताता है कि भारतीय डिजिटल राजनीति में नेता-केंद्रित संवाद, रील्स और सीधे युवा संपर्क की अहमियत बढ़ रही है।


लोकेशन: नई दिल्ली, भारत
तारीख: 26 अगस्त 2026
बाय: Mohd Naved

रात 12 बजे रील्स और एएमए सेशन, सीजेपी प्रोटेस्ट के बाद कैसे बदला मोदी-राहुल का इंस्टाग्राम अंदाज़

20 जुलाई के सीजेपी नेतृत्व वाले ‘संसद चलो’ मार्च के बाद भारतीय राजनीति के इंस्टाग्राम नैरेटिव में एक दिलचस्प बदलाव सामने आया है। डेटा बीइंग्स के आंकड़ों के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस नेता राहुल गांधी के व्यक्तिगत अकाउंट्स पर औसत इंगेजमेंट में तेज़ वृद्धि हुई, जबकि बीजेपी और कांग्रेस के आधिकारिक अकाउंट्स की बढ़त अपेक्षाकृत सीमित रही।

यह बदलाव केवल सोशल मीडिया गतिविधि बढ़ने की कहानी नहीं है। इसके भीतर राजनीतिक कम्युनिकेशन के बदलते तौर-तरीकों का संकेत भी दिखाई देता है। रील्स, छात्रों के साथ संवाद, एएमए सेशन और ज्यादा व्यक्तिगत वीडियो अब राजनीतिक संदेश को पार्टी के संस्थागत अकाउंट से अलग पहचान दे रहे हैं।

क्या हुआ?

डेटा बीइंग्स के मुताबिक 20 जुलाई से पहले नरेंद्र मोदी के एक पोस्ट पर औसत इंगेजमेंट करीब 1.19 मिलियन था। इसके बाद यह आंकड़ा बढ़कर 4.63 मिलियन हो गया। रिपोर्ट में इसे 289.9 प्रतिशत की वृद्धि बताया गया है।

राहुल गांधी के मामले में औसत इंगेजमेंट करीब 1.52 लाख से बढ़कर 4.26 लाख हुआ। यह 180.7 प्रतिशत की वृद्धि है। दोनों नेताओं की वृद्धि बीजेपी और कांग्रेस के आधिकारिक अकाउंट्स की तुलना में काफी अधिक रही।

बीजेपी के औसत पोस्ट इंगेजमेंट में 25 हजार से 34 हजार तक की वृद्धि दर्ज हुई, जबकि कांग्रेस का आंकड़ा 50 हजार से बढ़कर 72 हजार हुआ। प्रतिशत के लिहाज से कांग्रेस की वृद्धि 43.4 प्रतिशत और बीजेपी की 37.1 प्रतिशत रही।


पूरा संदर्भ क्या है?

20 जुलाई को दिल्ली में सीजेपी के नेतृत्व में संसद की ओर मार्च हुआ था। इस प्रदर्शन में परीक्षा व्यवस्था, कथित पेपर लीक और जवाबदेही जैसे मुद्दे प्रमुख थे। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक प्रदर्शन के दौरान युवाओं ने इंस्टाग्राम रील्स, जीआरडब्ल्यूएम वीडियो और मौके से जुड़े व्यक्तिगत कंटेंट का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया।

इससे एक अहम बदलाव सामने आया। विरोध प्रदर्शन केवल सड़क पर होने वाली राजनीतिक गतिविधि नहीं रहा। मोबाइल कैमरा, रील्स और शॉर्ट-फॉर्म वीडियो खुद आंदोलन के दस्तावेज और प्रचार माध्यम बन गए।

इसी माहौल के बीच राजनीतिक नेताओं के डिजिटल कम्युनिकेशन पर भी ज्यादा ध्यान गया। एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक 25 जुलाई तक नरेंद्र मोदी की एक इंस्टाग्राम रील को 24 घंटे में 303 मिलियन से ज्यादा व्यूज मिले थे। रिपोर्ट में इसे उस समय का वैश्विक इंस्टाग्राम व्यूइंग रिकॉर्ड बताया गया।

पृष्ठभूमि और घटनाक्रम

डेटा बीइंग्स ने 20 जुलाई को अपने विश्लेषण में एक महत्वपूर्ण कटऑफ के तौर पर इस्तेमाल किया। इसके पहले और बाद के औसत पोस्ट इंगेजमेंट की तुलना में चार अकाउंट्स का प्रदर्शन देखा गया। इनमें नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी, बीजेपी और कांग्रेस शामिल थे।

सबसे बड़ा अंतर व्यक्तिगत और संस्थागत अकाउंट्स के बीच दिखाई दिया। मोदी और राहुल के अकाउंट्स पर वृद्धि क्रमशः 289.9 और 180.7 प्रतिशत रही, जबकि दोनों प्रमुख पार्टियों के अकाउंट्स 50 प्रतिशत से नीचे रहे।

यहां एक अहम सावधानी जरूरी है। इंगेजमेंट में बढ़ोतरी को सीधे वोट, लोकप्रियता या चुनावी समर्थन में बदलकर देखना उचित नहीं होगा। डेटा बीइंग्स से जुड़े निष्कर्ष भी इस वृद्धि को डिजिटल अटेंशन और इंगेजमेंट के संदर्भ में देखते हैं, चुनावी समर्थन के रूप में नहीं।

प्रमुख पक्षकारों का रुख

नरेंद्र मोदी की डिजिटल रणनीति में शॉर्ट-फॉर्म वीडियो और अपेक्षाकृत अनौपचारिक प्रस्तुति का इस्तेमाल दिखाई दिया। डेटा बीइंग्स पर आधारित रिपोर्ट में देर रात तक पोस्ट किए गए कंटेंट और रील्स का उल्लेख है।

राहुल गांधी की रणनीति में छात्रों और युवाओं के साथ प्रत्यक्ष संवाद पर ज्यादा जोर दिखाई देता है। रिपोर्ट के मुताबिक उनके अकाउंट पर छात्रों के साथ वीडियो और एएमए सेशन जैसे इंटरैक्टिव फॉर्मेट इस्तेमाल किए गए।

इसका मतलब यह नहीं कि दोनों नेताओं की पूरी सोशल मीडिया रणनीति केवल 20 जुलाई के बाद बनी। उपलब्ध आंकड़े केवल यह दिखाते हैं कि इस तारीख को विभाजन रेखा मानने पर इंगेजमेंट में बड़ा अंतर सामने आया।

उपलब्ध साक्ष्य क्या बताते हैं?

सबसे स्पष्ट तथ्य व्यक्तिगत नेताओं और पार्टी अकाउंट्स के बीच इंगेजमेंट का अंतर है। मोदी का पोस्ट-20 जुलाई औसत इंगेजमेंट 4.63 मिलियन था। राहुल गांधी का आंकड़ा 4.26 लाख रहा। यानी मोदी का औसत पोस्ट इंगेजमेंट राहुल गांधी से दस गुना से भी अधिक था।

लेकिन इस आंकड़े की व्याख्या सावधानी से करनी होगी। दोनों नेताओं की फॉलोअर बेस, कंटेंट फॉर्मेट, पोस्टिंग फ्रिक्वेंसी, विषय और ऑडियंस प्रोफाइल अलग हैं। इसलिए केवल प्रतिशत वृद्धि से यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि किस नेता की राजनीतिक अपील ज्यादा बढ़ी।

एक और पहलू प्लेटफॉर्म की प्रकृति है। इंस्टाग्राम का एल्गोरिदमिक वितरण शॉर्ट-फॉर्म वीडियो और यूजर इंटरैक्शन को व्यापक ऑडियंस तक पहुंचा सकता है। सीजेपी प्रोटेस्ट के दौरान युवाओं द्वारा रील्स और मीम आधारित कंटेंट का इस्तेमाल इस प्लेटफॉर्म के राजनीतिक प्रभाव को और स्पष्ट करता है।

संभावित प्रभाव क्या हो सकते हैं?

सबसे अहम असर राजनीतिक संदेश की पैकेजिंग पर पड़ सकता है। पारंपरिक राजनीतिक संचार में पार्टी का लोगो, बयान, प्रेस कॉन्फ्रेंस और आधिकारिक घोषणा महत्वपूर्ण होती थी। इंस्टाग्राम में व्यक्तिगत चेहरा और सीधे संवाद की शैली ज्यादा प्रभावी दिखाई दे रही है।

युवा ऑडियंस के लिए नेता का कैमरे के सामने सीधे बात करना, छात्र से सवाल लेना या छोटी रील पोस्ट करना लंबी प्रेस कॉन्फ्रेंस की तुलना में ज्यादा सहज फॉर्मेट बन सकता है।

इसका एक दूसरा असर पार्टी संगठन पर पड़ सकता है। अगर व्यक्तिगत नेताओं के अकाउंट लगातार पार्टी अकाउंट्स से कई गुना ज्यादा इंगेजमेंट हासिल करते हैं, तो राजनीतिक ब्रांडिंग का केंद्र संस्थान से व्यक्ति की ओर और ज्यादा खिसक सकता है।

राजनीतिक और नीतिगत प्रभाव

भारतीय राजनीति पहले से ही व्यक्तित्व-केंद्रित कम्युनिकेशन की ओर बढ़ी है। इंस्टाग्राम इस प्रक्रिया को एक नया वितरण माध्यम देता है। यहां नेता अपने संदेश को पार्टी के औपचारिक ढांचे से बाहर सीधे यूजर तक पहुंचा सकते हैं।

यह व्यवस्था विपक्ष के लिए भी अवसर पैदा करती है। राहुल गांधी का छात्रों के साथ संवाद और एएमए फॉर्मेट इस बात का उदाहरण है कि विपक्षी नेता युवा मुद्दों को सीधे डिजिटल बातचीत में बदलने की कोशिश कर रहे हैं।

लेकिन इसमें जोखिम भी है। जब राजनीतिक संवाद अत्यधिक व्यक्तिगत हो जाता है, तो नीतियों और संस्थागत जवाबदेही की जगह व्यक्तित्व, वायरलिटी और भावनात्मक प्रतिक्रिया ले सकती है।

आर्थिक और सामाजिक असर

सोशल मीडिया इंगेजमेंट अब राजनीतिक संचार की अहम संपत्ति बन चुका है। ज्यादा इंगेजमेंट का मतलब ज्यादा यूजर अटेंशन है। इससे नेताओं को पारंपरिक मीडिया के अलावा अपना स्वतंत्र वितरण चैनल मिलता है।

सीजेपी आंदोलन में युवाओं द्वारा रील्स और मीम्स के इस्तेमाल ने इस बदलाव को जमीनी स्तर पर भी दिखाया। इंडिया टुडे ने प्रदर्शन स्थल पर युवाओं को कंटेंट बनाते हुए रिपोर्ट किया था।

हालांकि ज्यादा डिजिटल अटेंशन हमेशा ज्यादा राजनीतिक सहमति नहीं बनाता। सोशल मीडिया पर विरोध, समर्थन, व्यंग्य और जिज्ञासा सभी एक ही इंगेजमेंट मीट्रिक में शामिल हो सकते हैं।

अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय प्रभाव

भारतीय राजनीति में इंस्टाग्राम का बढ़ता इस्तेमाल वैश्विक डिजिटल पॉलिटिक्स के व्यापक ट्रेंड से जुड़ा है। शॉर्ट-फॉर्म वीडियो और व्यक्तिगत ब्रांडिंग ने कई देशों में राजनीतिक नेताओं के संचार का तरीका बदला है।

भारत में इसका महत्व इसलिए ज्यादा है क्योंकि युवा आबादी और मोबाइल इंटरनेट उपयोगकर्ताओं का बड़ा आधार राजनीतिक दलों के लिए एक महत्वपूर्ण डिजिटल ऑडियंस तैयार करता है। सीजेपी प्रोटेस्ट के दौरान युवाओं का सोशल मीडिया व्यवहार इस बदलाव की जमीनी मिसाल देता है।

कौन से सवाल अभी अनुत्तरित हैं?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि इंगेजमेंट में यह उछाल कितने समय तक बना रहता है। क्या यह 20 जुलाई के आसपास पैदा हुई असाधारण राजनीतिक गतिविधि का असर है, या नेताओं ने लंबे समय के लिए अपनी इंस्टाग्राम रणनीति बदल दी है?

दूसरा सवाल यह है कि ज्यादा इंगेजमेंट किस तरह के कंटेंट से आया। रील्स, राजनीतिक बयान, व्यक्तिगत वीडियो, छात्रों के साथ बातचीत या किसी खास घटना से जुड़े पोस्ट में किस फॉर्मेट ने सबसे ज्यादा योगदान दिया, उपलब्ध रिपोर्ट में इसका विस्तृत पोस्ट-स्तरीय विश्लेषण नहीं दिया गया है।

तीसरा सवाल चुनावी असर का है। डिजिटल इंगेजमेंट और वोटिंग व्यवहार के बीच सीधा संबंध स्थापित करने के लिए अलग और व्यापक अध्ययन की जरूरत होगी।

आगे क्या होगा?

आने वाले महीनों में राजनीतिक सोशल मीडिया रणनीति में दो समानांतर प्रवृत्तियां दिखाई दे सकती हैं। पहली, नेता अपने व्यक्तिगत अकाउंट को ज्यादा संवादात्मक और अनौपचारिक बनाएंगे। दूसरी, पार्टियां अपने संस्थागत अकाउंट्स को नेता-केंद्रित कंटेंट के साथ जोड़ने की कोशिश करेंगी।

राहुल गांधी के एएमए और छात्र-केंद्रित वीडियो तथा नरेंद्र मोदी की रील-आधारित पहुंच इस बदलते डिजिटल नैरेटिव के दो अलग मॉडल पेश करते हैं। अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि इनमें से कौन सा मॉडल ज्यादा प्रभावी साबित होगा।

संपादकीय निष्कर्ष

20 जुलाई के बाद के आंकड़े एक साफ डिजिटल बदलाव की ओर इशारा करते हैं। नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के व्यक्तिगत इंस्टाग्राम अकाउंट्स ने बीजेपी और कांग्रेस के आधिकारिक अकाउंट्स की तुलना में कहीं ज्यादा इंगेजमेंट वृद्धि दर्ज की।

यह ट्रेंड बताता है कि भारतीय राजनीतिक संचार में नेता की व्यक्तिगत डिजिटल पहचान का महत्व बढ़ रहा है। लेकिन इंगेजमेंट को राजनीतिक समर्थन समझना सही नहीं होगा। फिलहाल उपलब्ध साक्ष्य इतना जरूर बताते हैं कि इंस्टाग्राम पर राजनीतिक संवाद का केंद्र संस्थागत पार्टी संदेश से आगे बढ़कर व्यक्तिगत नेता, शॉर्ट-फॉर्म वीडियो और सीधे युवा संवाद की ओर जा रहा है।

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Asif Khan

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Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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