यूजीसी नेट री-एग्जाम पर राहुल गांधी ने घेरा NTA
NTA की गलती, छात्रों को फिर परीक्षा क्यों?
UGC-NET विवाद में राहुल गांधी ने मांगी जवाबदेही
यूजीसी नेट जून 2026 के इंग्लिश, कॉमर्स और सोशियोलॉजी पेपर दोबारा होंगे। NTA की विशेषज्ञ समिति ने प्रश्नपत्रों में तथ्यात्मक, भाषाई और अनुवाद संबंधी गंभीर त्रुटियां पाईं। राहुल गांधी ने इसे छात्रों पर अतिरिक्त बोझ बताते हुए जवाबदेही मांगी। असल सवाल परीक्षा दोहराने से आगे बढ़कर गुणवत्ता नियंत्रण और संस्थागत जिम्मेदारी का है।
स्थान: नई दिल्ली
तारीख: 17 अगस्त 2026
बाय: Mohd Naved
यूजीसी नेट जून 2026 के तीन विषयों की परीक्षा दोबारा कराने के नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के फैसले ने परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता और जवाबदेही पर नई बहस छेड़ दी है। इंग्लिश, कॉमर्स और सोशियोलॉजी के अभ्यर्थियों को सितंबर में फिर परीक्षा देनी होगी। इसी फैसले पर लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने NTA और केंद्र सरकार को निशाने पर लिया है।
राहुल गांधी का मुख्य एतराज़ यह है कि परीक्षा प्रक्रिया में हुई गलती का बोझ उन छात्रों पर पड़ रहा है जिन्होंने महीनों तैयारी की, आवेदन शुल्क दिया और परीक्षा केंद्र तक पहुंचने में समय और पैसा खर्च किया। उनका सवाल प्रशासनिक जिम्मेदारी से जुड़ा है, लेकिन इस राजनीतिक आरोप को तथ्य के रूप में पेश करने से पहले NTA के फैसले और विशेषज्ञ समिति की रिपोर्टिंग को अलग से देखना जरूरी है।
NTA ने यूजीसी नेट जून 2026 के इंग्लिश, कॉमर्स और सोशियोलॉजी विषयों के लिए दोबारा परीक्षा कराने का फैसला किया है। उपलब्ध रिपोर्टिंग के मुताबिक एक विशेषज्ञ समिति ने प्रश्नपत्रों में तथ्यात्मक, भाषा और अनुवाद संबंधी त्रुटियां पाईं। NTA के मुताबिक इन समस्याओं को केवल कुछ प्रश्न हटाकर या उत्तर कुंजी में सुधार करके दूर करना पर्याप्त नहीं माना गया।
तीनों विषयों की नई परीक्षा 9 और 10 सितंबर को प्रस्तावित है। प्रभावित अभ्यर्थियों से दोबारा परीक्षा के लिए अतिरिक्त शुल्क नहीं लिया जाएगा। बाकी 84 विषय इस फैसले से प्रभावित नहीं होंगे।
यूजीसी नेट का आयोजन NTA करता है। परीक्षा का इस्तेमाल जूनियर रिसर्च फेलोशिप, असिस्टेंट प्रोफेसर पात्रता और कुछ श्रेणियों में पीएचडी प्रवेश के लिए पात्रता निर्धारित करने में होता है।
विवाद की शुरुआत परीक्षा के बाद अभ्यर्थियों की शिकायतों से हुई। इंग्लिश पेपर को लेकर रिपोर्टों में 150 में से 67 प्रश्नों के पुराने प्रश्नपत्र से दोहराए जाने का दावा सामने आया। सोशियोलॉजी के पेपर में अभ्यर्थियों ने वर्तनी, नामों, भाषा और हिंदी अनुवाद से जुड़ी गलतियों की शिकायत की।
यहां एक अहम फर्क समझना जरूरी है। 67 प्रश्न दोहराए जाने की बात शुरुआत में अभ्यर्थियों और मीडिया रिपोर्टों के जरिए सामने आई थी। इसे अलग से आरोप और रिपोर्टेड शिकायत के रूप में देखना चाहिए। दूसरी ओर, तीन विषयों की दोबारा परीक्षा कराने का NTA का फैसला एक आधिकारिक सुधारात्मक कार्रवाई है।
इसी वजह से मौजूदा विवाद का सबसे ठोस हिस्सा यह है कि NTA ने तीन विषयों के लिए री-एग्जाम का निर्णय लिया है। इस फैसले से प्रश्नपत्रों की गुणवत्ता पर उठे सवालों की गंभीरता का संकेत मिलता है।
यूजीसी नेट जून 2026 की परीक्षा 22 जून से 30 जून के बीच हुई थी। परीक्षा कंप्यूटर आधारित माध्यम में आयोजित की गई और इसमें अलग-अलग विषयों के अभ्यर्थी शामिल हुए। आधिकारिक यूजीसी-नेट पोर्टल के मुताबिक NTA इस परीक्षा का आयोजन करता है और यह राष्ट्रीय स्तर की पात्रता परीक्षा है।
30 जून को सोशियोलॉजी समेत कई विषयों की परीक्षा हुई। इसके बाद अभ्यर्थियों ने प्रश्नपत्र की गुणवत्ता पर शिकायतें उठाईं। कुछ रिपोर्टों में समाजशास्त्र के प्रश्नपत्र में विद्वानों के नाम और शब्दों की गलत वर्तनी तथा अनुवाद संबंधी समस्याओं का उल्लेख किया गया।
इंग्लिश पेपर को लेकर भी पुराने प्रश्नों की कथित पुनरावृत्ति का मुद्दा उठा। इससे परीक्षा की निष्पक्षता और पेपर सेटिंग की गुणवत्ता को लेकर सवाल तेज हुए।
अब NTA ने तीन विषयों के लिए दोबारा परीक्षा का रास्ता चुना है।
राहुल गांधी ने इस फैसले को छात्रों के लिए अतिरिक्त परेशानी से जोड़ते हुए NTA की जवाबदेही पर सवाल उठाया है। उनका तर्क है कि संस्थागत चूक का असर अभ्यर्थियों के समय, मेहनत और संसाधनों पर पड़ रहा है।
दूसरी तरफ NTA ने विशेषज्ञ समिति की समीक्षा के आधार पर री-एग्जाम का फैसला किया है। रिपोर्टिंग के मुताबिक समिति ने प्रश्नपत्रों में तथ्यात्मक, भाषाई और अनुवाद संबंधी समस्याएं पाईं। एजेंसी ने प्रभावित उम्मीदवारों से अतिरिक्त शुल्क नहीं लेने का निर्णय भी किया है।
इस लिहाज से मौजूदा स्थिति में राजनीतिक आरोप और प्रशासनिक कार्रवाई को अलग-अलग देखना जरूरी है। राहुल गांधी जवाबदेही का सवाल उठा रहे हैं, जबकि NTA ने परीक्षा की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए री-एग्जाम का रास्ता अपनाया है।
सबसे महत्वपूर्ण उपलब्ध तथ्य NTA का री-एग्जाम संबंधी फैसला है। इसका अर्थ यह है कि एजेंसी ने तीन विषयों के प्रश्नपत्रों में ऐसी समस्याएं स्वीकार की हैं जिन्हें सामान्य उत्तर कुंजी प्रक्रिया से सुलझाना पर्याप्त नहीं समझा गया।
इसके अलावा अभ्यर्थियों की शिकायतों और मीडिया रिपोर्टों में प्रश्न दोहराए जाने तथा भाषा संबंधी त्रुटियों का उल्लेख पहले से मौजूद है। हालांकि हर आरोप को स्वतंत्र रूप से प्रमाणित तथ्य मानना उचित नहीं होगा। खासकर पुराने प्रश्नों की संख्या जैसे दावों के लिए आधिकारिक जांच या दस्तावेजी पुष्टि अधिक निर्णायक होगी।
यही पत्रकारिता की मुख्य कसौटी है। शिकायत, राजनीतिक आरोप और आधिकारिक निष्कर्ष तीन अलग स्तर हैं।
सबसे सीधा असर उन अभ्यर्थियों पर पड़ेगा जिन्हें दोबारा परीक्षा की तैयारी करनी होगी। परीक्षा की नई तारीख उनके अध्ययन कार्यक्रम, यात्रा योजना और आगे की शैक्षणिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है।
दूसरा असर परीक्षा व्यवस्था की साख पर पड़ता है। यूजीसी नेट उच्च शिक्षा और शोध करियर से जुड़ी राष्ट्रीय परीक्षा है। ऐसे में प्रश्नपत्र की गुणवत्ता में गंभीर त्रुटियां अभ्यर्थियों के भरोसे को प्रभावित करती हैं।
तीसरा सवाल प्रशासनिक दक्षता का है। अगर प्रश्नपत्र तैयार करने और अंतिम गुणवत्ता जांच के स्तर पर पर्याप्त नियंत्रण नहीं था, तो केवल री-एग्जाम समस्या का तात्कालिक समाधान है। दीर्घकालीन समाधान के लिए पेपर सेटिंग, मॉडरेशन और अंतिम सत्यापन की प्रक्रिया की समीक्षा जरूरी होगी।
राहुल गांधी का हमला ऐसे समय आया है जब राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता राजनीतिक बहस का हिस्सा बनी हुई है। इसलिए यूजीसी नेट का मौजूदा विवाद केवल एक परीक्षा की प्रशासनिक समस्या नहीं रह जाता।
विपक्ष इसे संस्थागत जवाबदेही के सवाल से जोड़ सकता है। सरकार और NTA के लिए चुनौती यह होगी कि वे अभ्यर्थियों को स्पष्ट जानकारी दें और यह भरोसा कायम करें कि नई परीक्षा में वही समस्या दोबारा नहीं आएगी।
लेकिन राजनीतिक विमर्श से अलग नीतिगत सवाल अधिक महत्वपूर्ण है। जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होती है, पेपर की अंतिम जांच कौन करता है और गंभीर त्रुटि मिलने पर सुधार की समयसीमा क्या होनी चाहिए, इन सवालों के स्पष्ट जवाब परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता बढ़ा सकते हैं।
परीक्षा दोबारा होने से छात्रों पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह का खर्च पड़ सकता है। अतिरिक्त परीक्षा शुल्क नहीं लिया जा रहा है, लेकिन यात्रा, ठहरने, समय और तैयारी की अवसर लागत बनी रहती है। NTA का शुल्क माफ करने का फैसला इस बोझ के एक हिस्से को कम करता है, पूरी समस्या को नहीं।
सामाजिक स्तर पर इसका असर उन उम्मीदवारों पर ज्यादा महसूस हो सकता है जो दूरदराज के इलाकों से परीक्षा केंद्र तक पहुंचे थे। उच्च शिक्षा में प्रवेश और शोध करियर के लिए तैयारी करने वाले युवाओं के लिए परीक्षा की तारीख में बदलाव भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
यह विवाद प्रत्यक्ष रूप से घरेलू शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा है। इसका अंतरराष्ट्रीय असर सीमित है। फिर भी राष्ट्रीय पात्रता परीक्षाओं की विश्वसनीयता भारत के उच्च शिक्षा तंत्र की संस्थागत साख का हिस्सा है।
क्षेत्रीय स्तर पर उन उम्मीदवारों के लिए इसका असर अलग हो सकता है जिन्हें दूसरे राज्यों में परीक्षा केंद्र मिला था। हालांकि उपलब्ध स्रोतों में किसी विशेष राज्य या जिले पर असमान प्रभाव का प्रमाण नहीं मिला है। इसलिए इस स्तर पर व्यापक दावा करना अभी उचित नहीं होगा।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रश्नपत्रों में गंभीर त्रुटियां अंतिम परीक्षा से पहले क्यों नहीं पकड़ी गईं।
दूसरा सवाल पेपर सेटिंग और मॉडरेशन प्रक्रिया से जुड़ा है। कितने स्तर पर प्रश्नपत्रों की समीक्षा होती है और अंतिम मंजूरी से पहले किन गुणवत्ता मानकों को लागू किया जाता है, इसका विस्तृत सार्वजनिक ब्यौरा महत्वपूर्ण होगा।
तीसरा सवाल कथित दोहराए गए प्रश्नों से जुड़ा है। अगर जांच में यह दावा पुष्ट होता है कि बड़ी संख्या में पुराने प्रश्न उसी संरचना और विकल्पों के साथ दोहराए गए, तो इसकी जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया स्पष्ट होनी चाहिए।
चौथा सवाल यह है कि सितंबर की दोबारा परीक्षा के बाद परिणाम प्रक्रिया कितनी जल्दी पूरी होगी। इससे प्रभावित उम्मीदवारों की आगे की शैक्षणिक और पेशेवर योजनाएं जुड़ी हैं।
फिलहाल सबसे स्पष्ट अगला कदम 9 और 10 सितंबर की री-एग्जाम प्रक्रिया है। प्रभावित उम्मीदवारों को नई परीक्षा से संबंधित आधिकारिक सूचना NTA और यूजीसी-नेट पोर्टल से देखनी होगी।
इसके साथ यह भी देखना होगा कि NTA प्रश्नपत्रों की गुणवत्ता जांच के लिए क्या अतिरिक्त कदम उठाता है। केवल परीक्षा दोबारा कराना तात्कालिक सुधार है। संस्थागत जवाबदेही का सवाल तब तक पूरी तरह समाप्त नहीं होगा जब तक परीक्षा प्रक्रिया में हुई चूक की प्रकृति और उसके कारण स्पष्ट नहीं होते।
यूजीसी नेट गड़बड़ी का मौजूदा विवाद दो स्तरों पर सामने आता है। पहला स्तर तत्काल है, जहां तीन विषयों के अभ्यर्थियों को दोबारा परीक्षा देनी होगी। दूसरा स्तर संस्थागत है, जहां प्रश्नपत्र तैयार करने और उसकी गुणवत्ता जांच की प्रक्रिया पर सवाल खड़े हुए हैं।
राहुल गांधी ने राजनीतिक तौर पर NTA की जवाबदेही का मुद्दा उठाया है। NTA ने दूसरी तरफ तीन विषयों के लिए री-एग्जाम का निर्णय लेकर परीक्षा की विश्वसनीयता बहाल करने की कोशिश की है। अब असल कसौटी यह होगी कि नई परीक्षा कितनी निष्पक्ष और त्रुटिरहित होती है और क्या इस पूरे प्रकरण से परीक्षा व्यवस्था में स्थायी सुधार निकलता है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।