भारतीय रुपये को डॉलर के मुक़ाबले गिरावट से बचाने के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक ने विदेशी मुद्रा बाज़ार में निगरानी और नियंत्रण के उपाय तेज़ कर दिए हैं। डॉलर की मांग सीमित करने, सट्टेबाज़ी पर अंकुश लगाने और विदेशी मुद्रा लेनदेन के नियम सख्त करने के बाद रुपये में सुधार दर्ज हुआ है।
मुंबई | 16 अक्टूबर 2026
By Mohd Haris
7 महीनों की सबसे बड़ी साप्ताहिक तेज़ी
16 अक्टूबर को उपलब्ध बाज़ार रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय रुपये ने इस सप्ताह डॉलर के मुक़ाबले लगभग 2% की बढ़त हासिल की। यह पिछले 7 महीनों का सबसे बेहतर साप्ताहिक प्रदर्शन बताया गया है। रुपया लगभग 94.96 प्रति डॉलर पर बंद हुआ। हालांकि, साल 2026 में भारतीय मुद्रा पर दबाव बना रहा है।
आरबीआई ने क्या सख्त क़दम उठाए?
भारतीय रिज़र्व बैंक की रणनीति में कई अहम उपाय शामिल हैं। विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव लेनदेन के नियम सख्त किए गए हैं।
पर्याप्त दस्तावेज़ के बिना डॉलर से जुड़े कुछ लेनदेन की सीमा $100 मिलियन से घटाकर $5 मिलियन की गई है। कुछ बड़े फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट पर बैंकों के लिए 20% नकद रिज़र्व की शर्त लागू की गई है। सरकारी तेल कंपनियों की डॉलर संबंधी ज़रूरतों के लिए विशेष व्यवस्था की गई है। मुद्रा बाज़ार में सट्टेबाज़ी और अत्यधिक जोखिम लेने वाली गतिविधियों को सीमित करने की कोशिश की गई है।इन उपायों का मक़सद डॉलर की असामान्य मांग घटाना और रुपये की विनिमय दर में तेज़ उतार-चढ़ाव को रोकना है।
विदेशी मुद्रा भंडार पर भी दबाव
बाज़ार विशेषज्ञों के अनुमान के अनुसार, जून 2026 से रुपये को सहारा देने के लिए आरबीआई ने लगभग $75 से $80 बिलियन के बराबर विदेशी मुद्रा हस्तक्षेप किया है। यह आंकड़ा स्वतंत्र रूप से पुष्टि किए गए आरबीआई के अंतिम व्यय का नहीं, बल्कि बाज़ार विशेषज्ञों के अनुमान का है।
ब्याज दरों में बढ़ोतरी से क्या असर पड़ेगा?
अक्टूबर में आरबीआई ने ब्याज दरों में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की। महंगाई और रुपये पर दबाव के बीच आगे की मौद्रिक नीति भी महत्वपूर्ण होगी।
ब्याज दरें बढ़ने से विदेशी निवेश आकर्षित करने में मदद मिल सकती है। दूसरी तरफ़ कर्ज़ महंगा होने से कारोबार, आवास ऋण और उपभोक्ता खर्च पर असर पड़ सकता है।
आम जनता पर क्या असर होगा?
रुपये की कमज़ोरी का सीधा संबंध आयात की लागत से है। भारत अपनी ऊर्जा ज़रूरतों का बड़ा हिस्सा विदेश से खरीदता है।
डॉलर महंगा होने पर कच्चे तेल, विदेशी मशीनरी और अन्य आयातित सामान की लागत बढ़ने का जोखिम रहता है। इससे महंगाई पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
वहीं रुपये में स्थिरता आने से आयातकों को लागत का अनुमान लगाने और विदेशी भुगतान की योजना बनाने में मदद मिलती है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।