SYNOPSIS
रुपया 3 सितंबर 2026 को 10 हफ्ते के उच्च स्तर तक मजबूत हुआ और 94.27 प्रति डॉलर का इंट्राडे हाई दर्ज किया। RBI की विशेष योजना से 31 अगस्त तक $127.23 अरब FCNR(B) डिपॉजिट जुटे। कुल विदेशी मुद्रा जुटाव $136.38 अरब रहा, लेकिन बैंकिंग सिस्टम में अतिरिक्त लिक्विडिटी भी बढ़ी।
लोकेशन: मुंबई / नई दिल्ली
तारीख: 3 सितंबर 2026
बायलाइन: Apurva Choudhary
रुपया 10 हफ्ते के हाई पर कैसे पहुंचा
भारतीय रुपये ने 3 सितंबर 2026 को डॉलर के मुकाबले मजबूत वापसी दर्ज की। कारोबार के दौरान रुपया ₹94.27 प्रति डॉलर तक पहुंचा, जबकि दिन के अंत में यह करीब ₹94.49 प्रति डॉलर पर बंद हुआ। यह 25 जून के बाद रुपये की सबसे मजबूत क्लोजिंग रही और करीब 10 हफ्ते का उच्च स्तर माना गया।
रुपये की मजबूती के पीछे सबसे बड़ा कारक विदेशी मुद्रा का मजबूत प्रवाह रहा। इसके साथ डॉलर में कमजोरी और भारतीय रिजर्व बैंक की विदेशी मुद्रा बाजार में सक्रियता ने भी घरेलू करेंसी को सहारा दिया।
हालांकि इस तेजी को केवल एक वजह से जोड़ना सही नहीं होगा। वैश्विक डॉलर मूवमेंट, विदेशी निवेश, RBI का हस्तक्षेप, कच्चे तेल की कीमत और घरेलू बाजार की धारणा—सभी मिलकर रुपये की दिशा तय करते हैं।
RBI की विशेष योजना से कितने डॉलर आए
RBI की विशेष USD-INR Forex Swap Facility ने विदेशी मुद्रा जुटाने में उम्मीद से कहीं ज्यादा सफलता हासिल की। 31 अगस्त 2026 तक इस सुविधा के तहत कुल विदेशी मुद्रा प्रवाह करीब $136.38 अरब रहा। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा FCNR(B) डिपॉजिट का था, जो करीब $127.23 अरब रहा।
इसके अलावा Overseas Foreign Currency Borrowings यानी OFCBs से करीब $5.26 अरब और External Commercial Borrowings यानी ECBs से करीब $3.89 अरब जुटाए गए। RBI के आंकड़े अभी प्रोविजनल हैं और अंतिम रिपोर्टिंग, अकाउंटिंग तथा reconciliation के बाद इनमें बदलाव संभव है।
FCNR(B) डिपॉजिट कुल जुटाव का 93 प्रतिशत से अधिक हिस्सा रहा। इससे पता चलता है कि विशेष योजना के तहत बैंकों को विदेशी मुद्रा जुटाने में सबसे बड़ा सहारा प्रवासी भारतीयों और विदेशी मुद्रा जमाओं से मिला।
FCNR(B) योजना क्या थी
RBI ने 8 जून 2026 को विशेष USD-INR फॉरेक्स स्वैप सुविधा शुरू की थी। इसका मकसद FCNR(B) डिपॉजिट, OFCB और ECB के जरिए विदेशी मुद्रा जुटाकर देश की बाहरी वित्तीय स्थिति और फॉरेक्स लिक्विडिटी को मजबूत करना था।
FCNR(B) के लिए यह विंडो पहले 30 सितंबर तक खुली रहने वाली थी, लेकिन तेज प्रतिक्रिया के कारण इसे 31 अगस्त को ही बंद कर दिया गया। ECB और OFCB के लिए संबंधित सुविधा 31 दिसंबर 2026 तक जारी रहने वाली है।
योजना के तहत बैंकों को विदेशी मुद्रा जुटाने के लिए RBI की स्वैप सुविधा का इस्तेमाल करने का अवसर मिला। इससे बैंकों के पास डॉलर उपलब्ध हुए और भारतीय वित्तीय सिस्टम को विदेशी मुद्रा के मोर्चे पर अतिरिक्त बफर मिला।
रुपये को इससे कैसे फायदा मिला
जब बैंक विदेशी मुद्रा जुटाते हैं और उसे RBI की स्वैप व्यवस्था के जरिए भारतीय वित्तीय सिस्टम में लाते हैं, तो डॉलर की उपलब्धता बढ़ती है। इससे विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये पर पड़ने वाला दबाव कुछ हद तक कम हो सकता है।
मौजूदा मामले में रिकॉर्ड FCNR(B) प्रवाह ने बाजार की धारणा को मजबूत किया। इसके साथ RBI की डॉलर बिक्री और बाजार में सक्रिय हस्तक्षेप ने रुपये की रिकवरी को और समर्थन दिया।
अगस्त में भारतीय शेयर बाजार में भी विदेशी पोर्टफोलियो निवेश का प्रवाह मजबूत रहा। Reuters के मुताबिक FPIs ने अगस्त में भारतीय इक्विटी में करीब $3.1 अरब निवेश किया, जो लगभग दो साल में सबसे बड़ा मासिक प्रवाह था।
लेकिन अब RBI के सामने दूसरी चुनौती
विदेशी मुद्रा जुटाने की सफलता का एक दूसरा पहलू भी है। इस बड़े प्रवाह के कारण भारतीय बैंकिंग सिस्टम में रुपये की अतिरिक्त लिक्विडिटी तेजी से बढ़ गई है।
3 सितंबर को बैंकिंग सिस्टम की सरप्लस लिक्विडिटी करीब ₹9.7 लाख करोड़ यानी ₹9.70 ट्रिलियन के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई। Reuters के मुताबिक यह स्थिति मुख्य रूप से विशेष डॉलर डिपॉजिट योजना से आए विदेशी मुद्रा प्रवाह और उसके स्वैप से जुड़े रुपये के प्रभाव के बाद बनी।
Business Standard के अनुसार इसी दौरान बैंकिंग सिस्टम की अतिरिक्त नकदी बढ़ने से कॉल मनी रेट 5 प्रतिशत से नीचे चला गया। यानी RBI के लिए अब चुनौती केवल रुपये को सपोर्ट करने की नहीं, बल्कि सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त रुपये को उचित तरीके से मैनेज करने की भी है।
RBI अतिरिक्त लिक्विडिटी कैसे सोख सकता है
मौजूदा परिस्थितियों में RBI के पास अतिरिक्त लिक्विडिटी को मैनेज करने के कई विकल्प हैं। इनमें लंबी अवधि के VRRR यानी Variable Rate Reverse Repo ऑपरेशन, फॉरेक्स sell-buy swaps, CRR में बदलाव और सरकारी बॉन्ड की बिक्री जैसे उपाय शामिल हो सकते हैं।
Reuters के मुताबिक बैंकिंग सेक्टर से जुड़े लोगों ने भी RBI के साथ बातचीत में फॉरेक्स sell-buy swaps के जरिए अतिरिक्त रुपये की लिक्विडिटी को धीरे-धीरे वापस लेने का सुझाव दिया है। इसका मकसद सिस्टम की नकदी को नियंत्रित करना है, बिना बैंकों के मार्जिन पर अनावश्यक दबाव डाले।
CRR यानी Cash Reserve Ratio बढ़ाना भी एक विकल्प हो सकता है। Reuters के विश्लेषण के अनुसार 50 से 100 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी से करीब ₹1.4 लाख करोड़ से ₹2.8 लाख करोड़ तक की लिक्विडिटी सोखी जा सकती है। हालांकि ऐसा कदम पूरे बैंकिंग सिस्टम की फंडिंग लागत और क्रेडिट स्थितियों पर असर डाल सकता है।
क्या यह $127 अरब भारत की कमाई है
यहां एक महत्वपूर्ण आर्थिक अंतर समझना जरूरी है। FCNR(B) डिपॉजिट से आया पूरा $127.23 अरब भारत की निर्यात कमाई या स्थायी विदेशी मुद्रा आय नहीं है।
FCNR(B) डिपॉजिट बैंकिंग सिस्टम की विदेशी मुद्रा देनदारी का हिस्सा हैं। भविष्य में इन डिपॉजिट की मैच्योरिटी पर मूलधन और संबंधित ब्याज की अदायगी विदेशी मुद्रा में करनी होगी।
इसलिए मौजूदा प्रवाह ने तत्काल विदेशी मुद्रा स्थिति और रुपये को समर्थन दिया है, लेकिन भविष्य में इन डिपॉजिट के repayment से जुड़े फॉरेक्स प्रबंधन को भी RBI और बैंकों को ध्यान में रखना होगा।
क्या इससे विदेशी मुद्रा भंडार भी मजबूत हुआ
विशेष योजना के जरिए विदेशी मुद्रा जुटाव ने भारत की बाहरी वित्तीय स्थिति को मजबूत करने में मदद की है। हालांकि डिपॉजिट प्रवाह और आधिकारिक विदेशी मुद्रा भंडार को एक ही चीज मानना उचित नहीं होगा।
FCNR(B) डिपॉजिट बैंकिंग सिस्टम की देनदारी हैं, जबकि विदेशी मुद्रा भंडार RBI की बैलेंस शीट पर उपलब्ध रिजर्व एसेट्स का हिस्सा हैं। इसलिए दोनों के आर्थिक प्रभाव और accounting treatment अलग-अलग हैं।
फिर भी इस तरह का विदेशी मुद्रा प्रवाह RBI को बाजार में रुपये की स्थिरता बनाए रखने के लिए अतिरिक्त क्षमता दे सकता है।
महंगा कच्चा तेल रुपये के लिए अब भी जोखिम
रुपये की मौजूदा मजबूती के बावजूद कच्चे तेल की ऊंची कीमत एक बड़ा जोखिम बनी हुई है। अमेरिका-ईरान तनाव और Strait of Hormuz में सप्लाई जोखिम के बीच Brent क्रूड हाल में करीब छह सप्ताह के उच्च स्तर तक पहुंच चुका है।
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। इसलिए अगर अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो देश का इंपोर्ट बिल बढ़ सकता है और डॉलर की मांग में इजाफा हो सकता है।
ऐसी स्थिति में FCNR(B) से मिला समर्थन रुपये को कुछ हद तक सहारा दे सकता है, लेकिन लगातार बढ़ते तेल आयात बिल से पैदा होने वाले दबाव को पूरी तरह खत्म करना आसान नहीं होगा।
क्या रुपया आगे भी मजबूत रह सकता है
रुपये की मौजूदा तेजी को देखते हुए आगे और मजबूती की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता, लेकिन इसे स्थायी ट्रेंड मानना अभी जल्दबाजी होगी।
आने वाले दिनों में अमेरिकी डॉलर की दिशा, विदेशी निवेश, RBI का बाजार हस्तक्षेप, कच्चे तेल की कीमत और हॉर्मुज में स्थिति रुपये के लिए प्रमुख संकेतक रहेंगे।
इसके अलावा बाजार यह भी देखेगा कि रिकॉर्ड FCNR(B) प्रवाह के बाद RBI अतिरिक्त लिक्विडिटी को कितनी कुशलता से नियंत्रित करता है। यदि लिक्विडिटी बहुत ज्यादा समय तक बनी रहती है, तो इससे मनी मार्केट की दरों और व्यापक वित्तीय स्थितियों पर असर पड़ सकता है।
बैंकिंग सिस्टम में रिकॉर्ड नकदी का असर क्या होगा
बैंकिंग सिस्टम में अतिरिक्त नकदी बढ़ने से बैंकों के पास कर्ज देने के लिए ज्यादा फंड उपलब्ध हो सकता है। इससे अल्पावधि में क्रेडिट की उपलब्धता और मनी मार्केट की स्थितियों पर सकारात्मक असर पड़ सकता है।
लेकिन अत्यधिक अतिरिक्त लिक्विडिटी को लंबे समय तक बिना प्रबंधन के छोड़ना भी उचित नहीं माना जाता। इससे ब्याज दरों पर दबाव और भविष्य में महंगाई संबंधी जोखिम बढ़ सकते हैं, खासकर यदि अतिरिक्त नकदी वास्तविक अर्थव्यवस्था में तेजी से प्रवेश करने लगे।
यही वजह है कि RBI के सामने अब दोहरी जिम्मेदारी है—रुपये में स्थिरता बनाए रखना और बैंकिंग सिस्टम में अतिरिक्त नकदी को नियंत्रित रखना।
आगे RBI की रणनीति पर बाजार की नजर
मौजूदा घटनाक्रम में RBI के लिए सबसे अहम सवाल यह है कि रिकॉर्ड विदेशी मुद्रा प्रवाह से मिली राहत को किस तरह स्थायी वित्तीय स्थिरता में बदला जाए।
फॉरेक्स स्वैप, VRRR, CRR और OMO जैसे उपकरणों में से कौन-सा विकल्प इस्तेमाल किया जाता है, यह लिक्विडिटी की अवधि, महंगाई की स्थिति, ब्याज दरों और मुद्रा बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
फिलहाल रुपये का 10 सप्ताह के उच्च स्तर तक पहुंचना भारतीय करेंसी के लिए सकारात्मक संकेत है। लेकिन इस मजबूती की स्थिरता का असली परीक्षण तब होगा जब FCNR(B) प्रवाह का शुरुआती प्रभाव कम होगा और तेल तथा वैश्विक डॉलर बाजार से जुड़े जोखिम सामने रहेंगे।
RBI की विशेष USD-INR स्वैप सुविधा ने उम्मीद से कहीं ज्यादा विदेशी मुद्रा जुटाई है। $127.23 अरब FCNR(B) प्रवाह और कुल $136.38 अरब जुटाव ने विदेशी मुद्रा बाजार में भरोसा बढ़ाया और रुपये को 10 सप्ताह के उच्च स्तर तक पहुंचने में मदद की।
लेकिन यही सफलता अब RBI के लिए एक नई चुनौती लेकर आई है। बैंकिंग सिस्टम में करीब ₹9.7 लाख करोड़ की सरप्लस लिक्विडिटी को इस तरह मैनेज करना होगा कि रुपये की स्थिरता को नुकसान न हो और वित्तीय बाजार में अनावश्यक असंतुलन भी पैदा न हो।
आगे रुपये की दिशा केवल FCNR(B) योजना से तय नहीं होगी। कच्चे तेल की कीमत, अमेरिका-ईरान तनाव, हॉर्मुज की स्थिति, डॉलर इंडेक्स, विदेशी निवेश और RBI की नीति प्रतिक्रिया—ये सभी मिलकर तय करेंगे कि मौजूदा मजबूती कितनी टिकाऊ रहती है।
पांच जरूरी सवालों के जवाब
3 सितंबर को रुपया कितने स्तर तक पहुंचा?
रुपया कारोबार के दौरान ₹94.27 प्रति डॉलर तक मजबूत हुआ और करीब ₹94.49 प्रति डॉलर पर बंद हुआ। यह 25 जून के बाद इसकी सबसे मजबूत क्लोजिंग रही।
RBI की योजना से कितने FCNR(B) डिपॉजिट आए?
31 अगस्त तक विशेष USD-INR स्वैप सुविधा के तहत करीब $127.23 अरब FCNR(B) डिपॉजिट जुटाए गए। कुल विदेशी मुद्रा प्रवाह करीब $136.38 अरब रहा।
बैंकिंग सिस्टम में कितनी अतिरिक्त लिक्विडिटी है?
3 सितंबर को बैंकिंग सिस्टम की सरप्लस लिक्विडिटी करीब ₹9.7 लाख करोड़ के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई।
RBI अतिरिक्त लिक्विडिटी को कैसे नियंत्रित कर सकता है?
RBI VRRR ऑपरेशन, फॉरेक्स sell-buy swaps, CRR में बदलाव, Market Stabilisation Scheme या सरकारी बॉन्ड बिक्री जैसे विकल्पों का इस्तेमाल कर सकता है। वास्तविक विकल्प बाजार की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
क्या $127 अरब भारत की स्थायी विदेशी मुद्रा कमाई है?
नहीं। FCNR(B) डिपॉजिट बैंकिंग सिस्टम की विदेशी मुद्रा देनदारी हैं। भविष्य में इनके मैच्योर होने पर मूलधन और ब्याज की विदेशी मुद्रा में अदायगी करनी होगी। इसलिए यह तत्काल फॉरेक्स समर्थन है, स्थायी निर्यात आय नहीं।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।