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RBI MPC Minutes: दरों पर ‘वेट एंड वॉच’ मोड में RBI

Apurva Choudhary 2026-08-19 22:27:02
RBI MPC Minutes: दरों पर ‘वेट एंड वॉच’ मोड में RBI

आरबीआई के अगस्त एमपीसी मिनट्स में गवर्नर संजय मल्होत्रा ने महंगाई की दिशा पर अधिक स्पष्टता तक नीतिगत दर में बदलाव से पहले इंतजार का संकेत दिया। समिति ने रेपो दर 5.25 फीसदी पर बरकरार रखी। खाद्य, ईंधन, कच्चे तेल, मानसून और भू-राजनीतिक जोखिम आगे नीति तय करेंगे


Location: Mumbai, Maharashtra, India

Date: 19 August 2026

By :Apurva Choudhary


RBI MPC Minutes: दरों पर ‘वेट एंड वॉच’ मोड में RBI

भारतीय रिजर्व बैंक के अगस्त 2026 की मौद्रिक नीति समिति यानी MPC बैठक के मिनट्स से संकेत मिलता है कि केंद्रीय बैंक फिलहाल नीतिगत दर में बदलाव को लेकर ‘वेट एंड वॉच’ रणनीति अपना रहा है। गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि किसी भी दर समायोजन से पहले महंगाई की दिशा, उसके मौजूदा स्तरों पर टिके रहने की अवधि, पूर्वानुमान और उस स्तर पर अधिक स्पष्टता जरूरी है जहां महंगाई सामान्य होकर स्थिर हो सकती है।

आरबीआई की अगस्त बैठक में छह सदस्यीय एमपीसी ने रेपो दर को 5.25 फीसदी पर बरकरार रखा और नीतिगत रुख को तटस्थ रखा। समिति ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए आर्थिक विकास का अनुमान बढ़ाकर 6.7 फीसदी किया, जबकि खुदरा महंगाई का अनुमान 5 फीसदी किया गया।


क्या हुआ?

19 अगस्त को जारी एमपीसी मिनट्स में गवर्नर संजय मल्होत्रा ने महंगाई को लेकर सावधानी बरतने का संकेत दिया। उनका आकलन है कि मौजूदा ऊंची महंगाई मुख्यतः आपूर्ति-पक्ष के झटकों से प्रभावित है और अभी ऐसे सीमित संकेत हैं कि कीमतों का दबाव व्यापक यानी ब्रॉड-बेस्ड रूप ले रहा है।

मल्होत्रा ने हालांकि यह भी रेखांकित किया कि खाद्य पदार्थों, ईंधन और अन्य इनपुट लागतों में बढ़ोतरी आगे चलकर व्यापक महंगाई में बदल सकती है। अगर ऐसे जोखिम वास्तविक रूप लेते हैं और महंगाई की उम्मीदें अस्थिर होती हैं, तो मौद्रिक नीति को सख्त करने की जरूरत पड़ सकती है।

इसका सीधा अर्थ यह नहीं है कि आरबीआई ने दर बढ़ाने का फैसला कर लिया है। फिलहाल संदेश यह है कि केंद्रीय बैंक नए आंकड़ों और महंगाई के रुझान को देखकर अगला कदम तय करना चाहता है।


पूरा संदर्भ क्या है?

आरबीआई ने 5 अगस्त 2026 को अपनी मौद्रिक नीति समीक्षा में रेपो दर 5.25 फीसदी पर बरकरार रखी थी। यह लगातार चौथी समीक्षा थी जिसमें दर में बदलाव नहीं किया गया। छह सदस्यीय एमपीसी ने सर्वसम्मति से दर को यथावत रखने का फैसला किया और रुख न्यूट्रल रखा।

इसी बैठक में आरबीआई ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए वास्तविक जीडीपी वृद्धि का अनुमान 6.6 फीसदी से बढ़ाकर 6.7 फीसदी किया। दूसरी ओर, सीपीआई महंगाई का अनुमान 5.1 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी किया गया।

आरबीआई का मौजूदा रुख इस बात पर आधारित है कि घरेलू आर्थिक गतिविधियां अपेक्षाकृत मजबूत हैं, जबकि महंगाई का दबाव अभी व्यापक मांग-आधारित रूप में स्पष्ट नहीं हुआ है। लेकिन कच्चे तेल, खाद्य कीमतों और वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाक्रम से तस्वीर तेजी से बदल सकती है।


पृष्ठभूमि और घटनाक्रम

मौद्रिक नीति समिति की अगस्त बैठक 3 से 5 अगस्त के बीच हुई। बैठक के बाद रेपो दर 5.25 फीसदी पर बरकरार रखने का फैसला किया गया। स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी दर 5 फीसदी तथा मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी और बैंक रेट 5.50 फीसदी पर रहे।

अगस्त नीति समीक्षा में आरबीआई ने वित्त वर्ष 2026-27 की महंगाई का अनुमान 5 फीसदी रखा। तिमाही अनुमान में दूसरी तिमाही के लिए 4.7 फीसदी, तीसरी तिमाही के लिए 5.9 फीसदी और चौथी तिमाही के लिए 5.5 फीसदी का अनुमान दिया गया।

विकास के मोर्चे पर केंद्रीय बैंक ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 6.7 फीसदी वृद्धि का अनुमान रखा। तिमाही आधार पर पहली तिमाही के लिए 7 फीसदी, दूसरी के लिए 6.4 फीसदी, तीसरी के लिए 6.5 फीसदी और चौथी के लिए 6.8 फीसदी का अनुमान दिया गया।

अब जारी मिनट्स ने यह स्पष्ट किया है कि अगली दर कार्रवाई मुख्यतः महंगाई के वास्तविक आंकड़ों और उसके प्रसार पर निर्भर करेगी।


प्रमुख पक्षकारों का रुख

गवर्नर संजय मल्होत्रा का रुख सावधानी और डेटा-निर्भर नीति का है। उन्होंने महंगाई की दिशा पर अधिक स्पष्टता आने तक किसी भी दर पुनर्समायोजन से पहले इंतजार को प्राथमिकता दी। साथ ही उन्होंने खाद्य, ईंधन और इनपुट लागतों से पैदा होने वाले संभावित सेकंड-राउंड इफेक्ट्स पर निगरानी की जरूरत बताई।

एमपीसी सदस्य नागेश कुमार ने पश्चिम एशिया में संघर्ष, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव, व्यापार नीति की अनिश्चितता और अल नीनो से जुड़े कृषि जोखिमों को प्रमुख चुनौतियों में गिना। इसके बावजूद उन्होंने भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियादी मजबूती की ओर संकेत किया।

इंद्रनील भट्टाचार्य के अनुसार उच्च आवृत्ति वाले आर्थिक संकेतक और कंपनियों के शुरुआती परिणाम औद्योगिक तथा सेवा क्षेत्र में मजबूत गतिविधि की ओर इशारा कर रहे हैं। निवेश को पूंजीगत वस्तुओं के उत्पादन, बढ़ते कर्ज और सरकारी पूंजीगत व्यय से समर्थन मिलने की बात भी सामने आई।

पूनम गुप्ता ने कहा कि जुलाई में वैश्विक अनिश्चितता फिर बढ़ी, हालांकि घरेलू स्तर पर बारिश के वितरण में सुधार और कई आर्थिक संकेतकों की मजबूती विकास को सहारा दे रही है। उनके आकलन में आर्थिक विकास का परिणाम जून के अनुमान से बेहतर हो सकता है और महंगाई कुछ कम रह सकती है।


उपलब्ध साक्ष्य क्या बताते हैं?

मौद्रिक नीति के तत्काल आंकड़े बताते हैं कि आरबीआई ने दरों में बदलाव के बजाय मौजूदा स्थिति को बनाए रखने का विकल्प चुना है। रेपो दर 5.25 फीसदी और नीति रुख न्यूट्रल है।

जुलाई 2026 की खुदरा महंगाई 4.45 फीसदी रही, जो आरबीआई के 2 से 6 फीसदी के सहनशीलता दायरे के भीतर है। इसके बावजूद केंद्रीय बैंक खाद्य, ईंधन और कच्चे तेल से जुड़े जोखिमों को लेकर सतर्क है।

दूसरी ओर, विकास संकेतक अपेक्षाकृत मजबूत हैं। आरबीआई ने अगस्त में वित्त वर्ष 2026-27 के विकास अनुमान को 6.7 फीसदी तक बढ़ाया। यह संकेत देता है कि मौद्रिक नीति के सामने फिलहाल केवल विकास को समर्थन देने की चुनौती नहीं है; महंगाई के संभावित पुनरुत्थान को रोकना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

संभावित प्रभाव क्या हो सकते हैं?

‘वेट एंड वॉच’ रुख का तत्काल असर यह है कि बैंकिंग और ऋण बाजार को निकट अवधि में रेपो दर में अचानक बदलाव का सामना नहीं करना पड़ेगा। मौजूदा दर पर होम लोन, ऑटो लोन और कॉरपोरेट कर्ज की लागत में नीतिगत बदलाव से जुड़ी तत्काल नई दिशा नहीं आएगी।

हालांकि, आगे की दिशा पूरी तरह महंगाई के आंकड़ों पर निर्भर रह सकती है। यदि खाद्य और ईंधन की कीमतें व्यापक वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में शामिल होने लगती हैं, तो दर बढ़ाने का जोखिम बढ़ सकता है। इसके विपरीत, यदि महंगाई नियंत्रित रहती है और विकास मजबूत बना रहता है, तो आरबीआई को फिलहाल दरों को स्थिर रखने की गुंजाइश मिल सकती है।


राजनीतिक और नीतिगत प्रभाव

आरबीआई एक स्वायत्त मौद्रिक नीति ढांचे के तहत कीमतों की स्थिरता और विकास के बीच संतुलन साधता है। मौजूदा मिनट्स में भी यही संतुलन दिखाई देता है।

वित्त वर्ष 2026-27 के विकास अनुमान को 6.7 फीसदी तक बढ़ाने के साथ महंगाई अनुमान को 5 फीसदी करना बताता है कि केंद्रीय बैंक घरेलू आर्थिक गतिविधियों को लेकर अपेक्षाकृत आश्वस्त है, लेकिन आपूर्ति-पक्ष के जोखिमों को नजरअंदाज नहीं कर रहा।

नीतिगत स्तर पर सबसे अहम बात यह है कि न्यूट्रल रुख आरबीआई को आगे चलकर दोनों दिशाओं में कदम उठाने की गुंजाइश देता है। यदि महंगाई बढ़ती है तो सख्ती संभव है; यदि परिस्थितियां बदलती हैं तो नीति में बदलाव की दूसरी दिशा भी खुली रहती है।


आर्थिक और सामाजिक असर

महंगाई की दिशा सीधे घरेलू बजट को प्रभावित करती है। खाद्य और ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी परिवारों के खर्च को प्रभावित कर सकती है और यदि यह दबाव व्यापक हो जाए तो ब्याज दरों के जरिए मांग को नियंत्रित करने की जरूरत बढ़ सकती है।

दूसरी ओर, मजबूत आर्थिक वृद्धि रोजगार, निवेश और आय के लिए सकारात्मक आधार तैयार करती है। आरबीआई का 6.7 फीसदी विकास अनुमान इस बात की ओर संकेत करता है कि केंद्रीय बैंक को फिलहाल घरेलू आर्थिक गतिविधियों में पर्याप्त गति दिखाई दे रही है।

व्यवसायों के लिए कच्चे तेल और अन्य इनपुट लागतों की दिशा महत्वपूर्ण रहेगी। यदि लागत दबाव लंबे समय तक बना रहता है तो कंपनियों के मार्जिन और उपभोक्ता कीमतों दोनों पर असर पड़ सकता है।


अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय प्रभाव

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और उससे जुड़े कच्चे तेल के बाजार में उतार-चढ़ाव आरबीआई के लिए प्रमुख बाहरी जोखिमों में शामिल हैं। भारत की ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में तेज बढ़ोतरी आयात लागत और घरेलू महंगाई दोनों को प्रभावित कर सकती है।

वैश्विक स्तर पर व्यापार नीति की अनिश्चितता और वित्तीय बाजारों में उतार-चढ़ाव भी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बने हुए हैं। ऐसे माहौल में आरबीआई का सतर्क रुख बाहरी झटकों के असर को देखते हुए नीतिगत लचीलापन बनाए रखने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है।


कौन से सवाल अभी अनुत्तरित हैं?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि खाद्य और ईंधन से पैदा हुआ मौजूदा महंगाई दबाव कितने समय तक बना रहता है और क्या वह अर्थव्यवस्था के दूसरे क्षेत्रों में फैलता है।

दूसरा सवाल कच्चे तेल की कीमतों से जुड़ा है। पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक घटनाक्रम में कोई बड़ा बदलाव भारत के महंगाई और चालू खाते के समीकरण को प्रभावित कर सकता है।

तीसरा सवाल मानसून और अल नीनो से जुड़ा है। कृषि उत्पादन और खाद्य कीमतों पर मौसम का असर आने वाले महीनों में महंगाई की दिशा को प्रभावित कर सकता है।

चौथा सवाल यह है कि मजबूत आर्थिक वृद्धि के बावजूद यदि महंगाई ऊपर जाती है तो आरबीआई कितनी जल्दी मौद्रिक सख्ती की ओर बढ़ेगा। मिनट्स इस दिशा में संभावित जोखिम की ओर संकेत करते हैं, लेकिन कोई निश्चित दर-वृद्धि समयसीमा तय नहीं करते।


आगे क्या होगा?

आने वाले महीनों में आरबीआई के लिए महंगाई के वास्तविक आंकड़े, कच्चे तेल की कीमतें, मानसून, खाद्य कीमतें और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां प्रमुख संकेतक रहेंगी।

यदि खाद्य और ईंधन लागत का असर व्यापक कीमतों तक पहुंचता है और महंगाई की उम्मीदों में अस्थिरता आती है, तो मौद्रिक सख्ती की संभावना बढ़ सकती है। गवर्नर मल्होत्रा ने भी ऐसे जोखिमों के वास्तविक रूप लेने पर नीति सख्त करने की जरूरत की संभावना जताई है।

फिलहाल, आरबीआई ने दर को 5.25 फीसदी पर बनाए रखते हुए डेटा का इंतजार करने का रास्ता चुना है। बाजार के लिए इसका संदेश स्पष्ट है कि अगला कदम पहले से तय नहीं है और महंगाई की दिशा निर्णायक होगी।


संपादकीय निष्कर्ष

आरबीआई के अगस्त एमपीसी मिनट्स से फिलहाल दरों में तत्काल बदलाव के बजाय सावधानी का संकेत मिलता है। गवर्नर संजय मल्होत्रा महंगाई की वास्तविक दिशा और उसके टिकाऊ स्वरूप पर अधिक स्पष्टता चाहते हैं, जबकि समिति के सदस्यों ने कच्चे तेल, खाद्य कीमतों, मानसून, वैश्विक अनिश्चितता और घरेलू विकास की अलग-अलग तस्वीर सामने रखी है।

रेपो दर 5.25 फीसदी पर बरकरार है और नीति रुख न्यूट्रल है। साथ ही विकास अनुमान 6.7 फीसदी और महंगाई अनुमान 5 फीसदी रखा गया है। इसलिए फिलहाल आरबीआई का संदेश न तो दर बढ़ाने की निश्चित घोषणा है और न ही भविष्य की दर कटौती का संकेत; यह बदलते आंकड़ों के आधार पर अगला कदम तय करने की नीति है।

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Apurva Choudhary

Apurva Choudhary

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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