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आरबीआई का ₹1 लाख करोड़ का लिक्विडिटी मूव, 16 सितंबर से बॉन्ड बिक्री

Apurva Choudhary 2026-09-11 21:52:09
आरबीआई का ₹1 लाख करोड़ का लिक्विडिटी मूव, 16 सितंबर से बॉन्ड बिक्री
आरबीआई ने बैंकिंग सिस्टम में बढ़ी अतिरिक्त लिक्विडिटी को सोखने के लिए ₹1 लाख करोड़ के सरकारी बॉन्ड बेचने का फैसला किया है। बिक्री 16 सितंबर से तीन चरणों में होगी। यह कदम रिकॉर्ड विदेशी मुद्रा प्रवाह और कमजोर overnight rates के बीच उठाया गया है। इससे बॉन्ड यील्ड, सरकारी उधारी और बाजार पर असर पड़ सकता है।

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📍 मुंबई | 📰 11 सितंबर 2026 | ✍️ Apurva Choudhary 

आरबीआई ने लिया बड़ा लिक्विडिटी फैसला
भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त लिक्विडिटी को कम करने के लिए ₹1 लाख करोड़ के सरकारी बॉन्ड बेचने का फैसला किया है। केंद्रीय बैंक की यह ओपन मार्केट सेल 16 सितंबर से शुरू होगी और इसे तीन चरणों में अंजाम दिया जाएगा। यह कदम ऐसे वक्त आया है जब बैंकिंग सिस्टम में नकदी की उपलब्धता काफी बढ़ गई है और overnight rates पर दबाव देखा जा रहा है। 
आरबीआई का मकसद केवल बाजार से नकदी निकालना नहीं, बल्कि मौद्रिक नीति के ऑपरेशनल ट्रांसमिशन को भी संतुलित रखना है। केंद्रीय बैंक के सामने एक तरफ बड़े विदेशी मुद्रा प्रवाह से बढ़ी रुपये की लिक्विडिटी है, तो दूसरी तरफ महंगे क्रूड के कारण महंगाई से जुड़ी नई चुनौतियां उभर रही हैं।

₹1 लाख करोड़ की बॉन्ड बिक्री क्यों अहम है
आरबीआई जब सरकारी सिक्योरिटीज बाजार में बेचता है, तो इसके बदले बैंकिंग सिस्टम से रुपये की लिक्विडिटी बाहर जाती है। मौजूदा हालात में इसका सीधा मकसद अतिरिक्त नकदी को absorb करना है, ताकि overnight money-market rates केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीति के अनुरूप बने रहें।
Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक बैंकिंग सिस्टम में surplus liquidity इस सप्ताह ₹10 लाख करोड़ से अधिक रही। यह स्थिति उस बड़े विदेशी मुद्रा प्रवाह के बाद बनी है, जिसने आरबीआई के विदेशी मुद्रा भंडार को भी रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचाया है। 
आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने इससे पहले कहा था कि केंद्रीय बैंक के पास liquidity management के लिए open market operations और foreign-exchange swaps समेत कई विकल्प मौजूद हैं। उनका कहना था कि केंद्रीय बैंक किसी भी उपलब्ध साधन को इस्तेमाल से बाहर नहीं मान रहा है। 

रिकॉर्ड फॉरेक्स रिजर्व से जुड़ा है पूरा मामला
आरबीआई के ताजा आंकड़ों के मुताबिक 4 सितंबर को समाप्त सप्ताह में भारत का foreign-exchange reserve करीब $45 अरब बढ़कर $785.7 अरब के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। यह लगातार दसवां सप्ताह था जब विदेशी मुद्रा भंडार में बढ़ोतरी दर्ज हुई। 
इस बढ़ोतरी में foreign-currency assets की भूमिका महत्वपूर्ण रही। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक इस सप्ताह foreign-currency assets में करीब $47.4 अरब की वृद्धि हुई, जबकि gold holdings के मूल्य में लगभग $2.6 अरब की कमी आई। कुल रिजर्व $785.706 अरब दर्ज किया गया।
विदेशी मुद्रा प्रवाह बढ़ने से आरबीआई के पास डॉलर की उपलब्धता बढ़ी, लेकिन उससे रुपये की liquidity भी बैंकिंग सिस्टम में आई। यही वह स्थिति है जिसे केंद्रीय बैंक अब अलग-अलग monetary operations के जरिये संतुलित करने की कोशिश कर रहा है।

विदेशी मुद्रा प्रवाह इतना क्यों बढ़ा
इस साल जून में विदेशी मुद्रा प्रवाह बढ़ाने के लिए कुछ विशेष उपाय किए गए थे। Reuters के मुताबिक 5 जून से 31 अगस्त के बीच इन योजनाओं के तहत आरबीआई को $136.3 अरब का प्रवाह मिला, जिसमें non-resident Indian deposits से करीब $127 अरब की राशि प्रमुख रही। 
यह आंकड़ा सामान्य बाजार प्रवाह से अलग महत्व रखता है क्योंकि इतनी बड़ी डॉलर आमद ने आरबीआई के रिजर्व को तेज गति से बढ़ाया। लेकिन डॉलर के बदले रुपये की liquidity भी सिस्टम में आती है, जिसे केंद्रीय बैंक को अपने monetary framework के अनुरूप manage करना पड़ता है।
यहीं से बॉन्ड बिक्री का तर्क सामने आता है। आरबीआई विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप के साथ-साथ सरकारी सिक्योरिटीज की बिक्री जैसे उपायों से सिस्टम में मौजूद रुपये की अतिरिक्त नकदी को वापस खींच सकता है।

overnight rates पर क्यों पड़ा दबाव
बैंकिंग सिस्टम में जरूरत से ज्यादा नकदी होने पर banks के बीच short-term funds की मांग और कीमत पर असर पड़ सकता है। मौजूदा स्थिति में overnight rates पर दबाव इस हद तक बढ़ा कि वे policy corridor के निचले हिस्से की ओर चले गए। आरबीआई के लिए यह संकेत महत्वपूर्ण है क्योंकि वह चाहता है कि money-market rates उसकी घोषित monetary policy stance के साथ प्रभावी ढंग से जुड़ी रहें। 
आरबीआई पहले variable rate reverse repo जैसे instruments के जरिए liquidity absorb करने की कोशिश कर चुका है। लेकिन उपलब्ध रिपोर्टिंग के अनुसार इन उपायों से जितनी मात्रा में liquidity हटाने की जरूरत थी, उतनी absorption नहीं हो सकी। ऐसे में open market sale अपेक्षाकृत सीधा विकल्प बनकर सामने आया। 
बॉन्ड यील्ड और सरकारी उधारी पर क्या असर होगा
सरकारी बॉन्ड की बड़ी बिक्री बाजार में supply बढ़ाती है। यदि बाजार को इतनी बड़ी मात्रा absorb करनी हो, तो bond prices पर दबाव और yields में बढ़ोतरी संभव है। 11 सितंबर को आरबीआई के bond-sale संकेतों के बीच benchmark 10-year government bond yield 7.035 प्रतिशत तक पहुंची थी। 
इसका असर केवल bond traders तक सीमित नहीं रहता। सरकारी borrowing cost, banks के lending rates और broader financial conditions पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि बाजार बिक्री को किस तरह absorb करता है और आगे आरबीआई liquidity management में कितनी आक्रामकता दिखाता है।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि बॉन्ड बिक्री अपने आप में policy repo rate बढ़ाने के बराबर नहीं है। यह liquidity management का उपकरण है। इसलिए इसे सीधे ब्याज दरों में बदलाव के संकेत के रूप में पढ़ना उचित नहीं होगा।

महंगा क्रूड आरबीआई की चुनौती बढ़ा रहा है
आरबीआई का यह फैसला ऐसे समय आया है जब वैश्विक ऊर्जा बाजार में भी दबाव बढ़ा हुआ है। 11 सितंबर को Brent crude $108 प्रति बैरल से ऊपर कारोबार कर रहा था और West Asia में जारी तनाव के कारण supply और shipping risks को लेकर बाजार में चिंता बनी रही। 
महंगा crude भारत के लिए विशेष महत्व रखता है क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। लंबे समय तक ऊंची तेल कीमतें import bill, inflation, रुपये और corporate margins पर दबाव बढ़ा सकती हैं। इससे आरबीआई के लिए liquidity और inflation management के बीच संतुलन और महत्वपूर्ण हो जाता है।

शेयर बाजार पर भी दिखा दबाव
इसी व्यापक आर्थिक माहौल में भारतीय शेयर बाजार ने 11 सितंबर को दबाव का सामना किया। Reuters के अनुसार Sensex 0.84 प्रतिशत गिरकर 74,272.61 और Nifty 50 0.92 प्रतिशत गिरकर 23,261.7 पर बंद हुआ। दोनों प्रमुख सूचकांक करीब तीन महीने के निचले स्तर पर रहे। 
हालांकि दिन के शुरुआती कारोबार की तुलना में बाजार ने नुकसान का एक हिस्सा recover किया। PTI की रिपोर्ट के मुताबिक Sensex दिन के दौरान 742.43 अंक तक गिरा, लेकिन अंत में 120.83 अंक की गिरावट के साथ 74,781.76 पर बंद हुआ। Nifty 79.70 अंक गिरकर 23,398.10 पर बंद हुआ। 
इसलिए इसे केवल आरबीआई के बॉन्ड सेल फैसले से जोड़ना सही नहीं होगा। बाजार की कमजोरी में crude prices, West Asia तनाव, global yields और risk-off sentiment जैसे कई कारकों की भूमिका रही।

क्या यह कदम महंगाई से जुड़ा संकेत है
आरबीआई के सामने इस समय एक जटिल macroeconomic equation है। एक तरफ विदेशी मुद्रा प्रवाह से liquidity बढ़ी है, दूसरी तरफ महंगा crude भविष्य की inflation trajectory के लिए जोखिम पैदा कर सकता है।
ऐसे माहौल में liquidity को नियंत्रित रखना monetary policy transmission के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है। हालांकि उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि बॉन्ड बिक्री अपने आप में किसी नए tightening cycle की शुरुआत है।
आरबीआई गवर्नर ने भी liquidity management को policy framework के भीतर रखने पर जोर दिया है। इसलिए फिलहाल इसे targeted liquidity operation के तौर पर देखना अधिक उचित है, न कि policy-rate बदलाव के रूप में। 

बाजार के लिए आगे क्या मायने रखेगा
16 सितंबर से शुरू होने वाली बॉन्ड बिक्री पर बाजार की प्रतिक्रिया अहम होगी। निवेशक यह देखेंगे कि सरकारी सिक्योरिटीज की supply बढ़ने के बाद yields किस दिशा में जाती हैं और banks तथा financial institutions अतिरिक्त liquidity को किस गति से absorb करते हैं।
अगर liquidity surplus अपेक्षाकृत तेजी से घटता है और overnight rates policy corridor के अनुरूप स्थिर होते हैं, तो आरबीआई के इस ऑपरेशन का उद्देश्य काफी हद तक पूरा माना जा सकता है। दूसरी ओर, यदि bond yields में तेज उछाल आता है या liquidity conditions जरूरत से ज्यादा कड़ी होती हैं, तो केंद्रीय बैंक को अपने अगले कदमों में संतुलन बनाना पड़ सकता है।
आगे FX interventions, reserve requirements, open market operations और FX swaps जैसे साधनों का मिश्रण भी देखने को मिल सकता है। आरबीआई ने संकेत दिया है कि उसके पास liquidity management के लिए कई विकल्प मौजूद हैं। 

 लिक्विडिटी संतुलन पर आरबीआई की नजर
आरबीआई का ₹1 लाख करोड़ का बॉन्ड सेल मौजूदा बैंकिंग liquidity surplus को नियंत्रित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इसका तत्काल उद्देश्य अतिरिक्त रुपये की liquidity को absorb करना और money-market rates को monetary policy framework के अनुरूप रखना है।
रिकॉर्ड $785.7 अरब forex reserves, बड़े विदेशी मुद्रा inflows और महंगे crude ने आर्थिक तस्वीर को अधिक जटिल बना दिया है। हालांकि बॉन्ड बिक्री से bond yields और borrowing costs पर दबाव पड़ सकता है, इसे सीधे ब्याज दर बढ़ाने का फैसला कहना सही नहीं होगा।
अब सबसे अहम संकेत 16 सितंबर से मिलने शुरू होंगे, जब बिक्री के वास्तविक चरण बाजार में आएंगे। फिलहाल स्थापित तथ्य यही है कि आरबीआई liquidity को सक्रिय रूप से manage कर रहा है; आगे इसका असर bond market, banking liquidity और broader financial conditions पर कितना पड़ता है, यह बाजार की प्रतिक्रिया और केंद्रीय बैंक के अगले कदमों पर निर्भर करेगा। 
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Apurva Choudhary

Apurva Choudhary

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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