RBI ने बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त नकदी को नियंत्रित करने के लिए एक लाख करोड़ रुपये के सरकारी बॉन्ड बेचने का फैसला किया है। बिक्री तीन चरणों में होगी। कदम का मकसद मनी मार्केट में दरों को नियंत्रित रखना है। महंगे तेल, महंगाई और बॉन्ड यील्ड के बीच बाजार पर नजर रहेगी।
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📍 Mumbai/New Delhi | 📰 11 September 2026 | ✍️ Apurva Choudhary
RBI ने Liquidity पर क्यों उठाया इतना बड़ा कदम
भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त नकदी को सोखने के लिए करीब ₹1 लाख करोड़ के सरकारी बॉन्ड बेचने का फैसला किया है। केंद्रीय बैंक का यह कदम ऐसे वक्त आया है जब बैंकिंग सिस्टम में surplus liquidity काफी ऊंचे स्तर पर बनी हुई है और overnight money-market rates पर इसका असर दिखाई दे रहा है।
RBI के मुताबिक यह बॉन्ड बिक्री तीन चरणों में होगी। पहली बिक्री 17 सितंबर को ₹50,000 करोड़ की होगी, जबकि इसके बाद 21 सितंबर और 28 सितंबर को ₹25,000-₹25,000 करोड़ के बॉन्ड बेचे जाएंगे। यानी कुल मिलाकर बाजार से करीब ₹1 लाख करोड़ की नकदी वापस खींचने की तैयारी है।
यह सामान्य सरकारी उधारी के अर्थ में नई रकम जुटाने की कवायद नहीं है। इसका मुख्य उद्देश्य बैंकिंग सिस्टम में मौजूद अतिरिक्त रुपये की liquidity को absorb करना है, ताकि मनी मार्केट की दरें RBI के मौद्रिक नीति ढांचे के अनुरूप बनी रहें।
बैंकिंग सिस्टम में इतनी नकदी आई कहां से
मौजूदा liquidity surplus की बड़ी वजह RBI की विशेष Forex mobilisation scheme है। इस योजना के तहत बैंकों ने करीब 127 अरब डॉलर जुटाए, जिसे RBI के साथ विदेशी मुद्रा व्यवस्था के जरिए जोड़ा गया। इससे केंद्रीय बैंक के विदेशी मुद्रा भंडार में भी तेज बढ़ोतरी हुई और दूसरी तरफ बैंकिंग सिस्टम में रुपये की liquidity बढ़ी।
सितंबर में बैंकिंग सिस्टम की surplus liquidity औसतन करीब ₹10.25 लाख करोड़ रही। यह रकम बैंकिंग सिस्टम के आकार के लिहाज से भी काफी महत्वपूर्ण है। इतनी अधिक liquidity का सीधा असर short-term money market पर पड़ता है और बैंकों के बीच overnight borrowing rates नीचे आने लगते हैं।
RBI के सामने चुनौती यह है कि liquidity इतनी ज्यादा न हो जाए कि short-term interest rates उसके निर्धारित policy framework से नीचे चले जाएं। Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक अतिरिक्त रुपये की वजह से overnight rates monetary policy corridor के निचले स्तर से भी नीचे जाने लगे थे।
RBI के लिए Liquidity Management क्यों जरूरी है
किसी भी केंद्रीय बैंक के लिए liquidity management मौद्रिक नीति का अहम हिस्सा होता है। बैंकिंग सिस्टम में जरूरत से ज्यादा नकदी होने पर short-term interest rates पर downward pressure आ सकता है। दूसरी तरफ बहुत कम liquidity होने पर borrowing conditions सख्त हो सकती हैं।
RBI का मौजूदा लक्ष्य surplus liquidity को पूरी तरह खत्म करना नहीं, बल्कि उसे इस तरह नियंत्रित करना है कि overnight rates और व्यापक financial conditions मौद्रिक नीति के अनुरूप रहें।
RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भी संकेत दिया है कि केंद्रीय बैंक के पास liquidity management के लिए कई विकल्प मौजूद हैं। इनमें Open Market Operations और FX swaps शामिल हैं। उन्होंने कहा कि liquidity को संभालने के लिए कोई विकल्प बाहर नहीं रखा गया है।
इससे साफ है कि RBI फिलहाल एक ही instrument पर निर्भर नहीं रहना चाहता। जरूरत के मुताबिक bond sales, foreign-exchange operations और अन्य liquidity tools का इस्तेमाल किया जा सकता है।
Bond Sale से Bond Yield पर क्यों पड़ेगा असर
RBI जब बड़ी मात्रा में सरकारी बॉन्ड बाजार में बेचता है तो बाजार में बॉन्ड की supply बढ़ती है। आम तौर पर इससे बॉन्ड की कीमतों पर दबाव और yield में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।
मौजूदा हालात में यह पहल इसलिए भी अहम है क्योंकि भारतीय सरकारी बॉन्ड यील्ड पहले ही ऊपर जा रही है। Reuters के अनुसार पिछले चार हफ्तों में 10-year benchmark bond yield करीब 26 basis points बढ़ चुकी है। RBI के बॉन्ड बिक्री संकेत के बाद 10-year yield 7.035% तक पहुंची थी।
Bond yield बढ़ने का असर सिर्फ निवेशकों तक सीमित नहीं रहता। सरकारी borrowing cost, बैंकों की funding conditions और आगे चलकर व्यापक interest-rate environment पर भी इसका असर पड़ सकता है।
यही वजह है कि RBI का यह कदम liquidity control और bond-market stability के बीच संतुलन बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
महंगा Crude Oil भी बढ़ा रहा है चुनौती
RBI के सामने सिर्फ surplus liquidity की समस्या नहीं है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी ने भी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए नया दबाव पैदा किया है।
भारत अपनी crude oil जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में तेल महंगा होने पर import bill बढ़ सकता है और रुपये पर दबाव बन सकता है। 11 सितंबर को भारतीय रुपया ₹95.55 प्रति डॉलर पर बंद हुआ और पूरे सप्ताह करीब 1.1 प्रतिशत कमजोर हुआ।
तेल की ऊंची कीमतें महंगाई के जोखिम को भी बढ़ा सकती हैं। ऐसे माहौल में RBI के लिए liquidity conditions को बहुत ढीला रखना आसान नहीं है, क्योंकि अतिरिक्त liquidity और महंगे commodities के बीच inflation expectations पर भी नजर रखनी पड़ती है।
RBI पहले ही कर चुका है कई Liquidity Operations
₹1 लाख करोड़ की बॉन्ड बिक्री अचानक लिया गया पहला कदम नहीं है। RBI ने इससे पहले liquidity absorption के लिए VRRR यानी Variable Rate Reverse Repo और dollar-rupee sell-buy FX swaps जैसे उपायों का इस्तेमाल किया है।
सितंबर की शुरुआत में RBI ने ₹7 लाख करोड़ के 30-day VRRR operation की घोषणा की थी, जिसका उद्देश्य बैंकिंग सिस्टम में मौजूद लगभग ₹10.3 लाख करोड़ के surplus liquidity को absorb करना था। हालांकि लंबी अवधि के liquidity operations में बैंकों की भागीदारी सीमित रहने की चुनौती सामने आई।
इसके बाद RBI ने dollar-rupee sell-buy swaps का भी इस्तेमाल किया। Reuters के अनुसार 11 सितंबर को लगातार तीसरे दिन ऐसे swaps किए जाने की संभावना जताई गई, जिससे रुपये की liquidity को absorb करने में मदद मिली।
अब सरकारी बॉन्ड की बिक्री इस liquidity management strategy को और मजबूत करती दिखाई दे रही है।
Market पर क्या असर पड़ सकता है
बॉन्ड मार्केट के लिए RBI का यह फैसला महत्वपूर्ण है। इतनी बड़ी मात्रा में सरकारी प्रतिभूतियों की बिक्री से yields पर ऊपर की तरफ दबाव बना रह सकता है। इससे bond prices पर दबाव और investors की portfolio strategy में बदलाव देखने को मिल सकता है।
सरकार के लिए भी rising bond yields अहम हैं क्योंकि ऊंची yield का अर्थ भविष्य की borrowing cost पर दबाव हो सकता है। हालांकि वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि बाजार RBI की liquidity absorption strategy को किस तरह absorb करता है।
दूसरी तरफ equity market के लिए भी bond yields महत्वपूर्ण हैं। अगर fixed-income instruments पर returns आकर्षक होते हैं तो कुछ निवेशक equity के मुकाबले bonds को प्राथमिकता दे सकते हैं। हालांकि इसे सीधे equity market में गिरावट का संकेत मानना उचित नहीं होगा।
रुपये के लिए भी यह कदम अहम
Liquidity management और currency market के बीच भी गहरा संबंध है। हाल के दिनों में RBI ने FX market में हस्तक्षेप किया है और dollar-rupee swaps के जरिए अतिरिक्त रुपये की liquidity को absorb करने की कोशिश की है।
11 सितंबर को रुपया ₹95.55 प्रति डॉलर पर बंद हुआ और सप्ताह के दौरान 1.1 प्रतिशत कमजोर हुआ। बढ़ती crude prices और global bond yields ने भारतीय मुद्रा पर दबाव बढ़ाया है।
ऐसे में RBI के लिए liquidity management का उद्देश्य केवल banking system को संतुलित करना नहीं है। यह currency market stability और inflation management के व्यापक framework का भी हिस्सा है।
आगे RBI की रणनीति पर बाजार की नजर
अब बाजार की नजर 17 सितंबर से शुरू होने वाली बॉन्ड बिक्री पर रहेगी। पहली ₹50,000 करोड़ की बिक्री के बाद 21 और 28 सितंबर की ₹25,000-₹25,000 करोड़ की किश्तें यह बताएंगी कि बाजार इतनी बड़ी liquidity absorption को किस तरह लेता है।
साथ ही crude oil prices, रुपये की चाल, government bond yields और बैंकिंग सिस्टम की liquidity पर नजर बनी रहेगी। अगर surplus liquidity अपेक्षित गति से कम नहीं होती, तो RBI के पास FX swaps और अन्य liquidity-management tools का विकल्प मौजूद है।