नोएडा और ग्रेटर नोएडा के स्कूलों में स्मार्ट बोर्ड इस्तेमाल की दैनिक सीमा तय की गई है। प्राथमिक कक्षाओं के लिए 30 और अपर-प्राइमरी के लिए 60 मिनट की सीमा है। फैसला लंबे स्क्रीन एक्सपोजर की शिकायतों के बाद आया। प्रशासन ने डिजिटल और पारंपरिक पढ़ाई के बीच संतुलन, स्क्रीन ब्रेक और आंखों की जांच पर जोर दिया है।
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नोएडा, उत्तर प्रदेश | 14 अगस्त 2026 | Apurva Choudhary
नोएडा स्कूलों में स्क्रीन टाइम पर नई गाइडलाइन
नोएडा और ग्रेटर नोएडा के स्कूलों में बच्चों के स्मार्ट और डिजिटल बोर्ड इस्तेमाल को सीमित करने के लिए नई गाइडलाइन सामने आई है। गौतमबुद्ध नगर प्रशासन के निर्देश के मुताबिक प्राथमिक कक्षाओं में स्मार्ट बोर्ड का इस्तेमाल प्रतिदिन अधिकतम 30 मिनट और अपर-प्राइमरी कक्षाओं में अधिकतम 60 मिनट तक सीमित रखने को कहा गया है।
यह फैसला ऐसे वक्त आया है जब प्रशासन के सामने कुछ स्कूलों में बच्चों के लंबे समय तक डिजिटल स्क्रीन देखने की शिकायतें पहुंची थीं। रिपोर्टों के मुताबिक कुछ मामलों में विद्यार्थियों के चार से पांच घंटे तक स्मार्ट या डिजिटल बोर्ड के संपर्क में रहने की शिकायत की गई थी। प्रशासन का फोकस अब तकनीक को पूरी तरह हटाने के बजाय उसके इस्तेमाल को जरूरत के मुताबिक सीमित करने पर है।
प्राथमिक और अपर-प्राइमरी कक्षाओं के लिए अलग सीमा
नई व्यवस्था में छोटे बच्चों और अपर-प्राइमरी विद्यार्थियों के लिए अलग-अलग दैनिक सीमा रखी गई है। प्राथमिक कक्षाओं के लिए स्मार्ट या डिजिटल बोर्ड का इस्तेमाल अधिकतम 30 मिनट प्रतिदिन और अपर-प्राइमरी के लिए अधिकतम 60 मिनट प्रतिदिन रखने का निर्देश दिया गया है।
निर्देश का मकसद classroom में digital technology के इस्तेमाल को खत्म करना नहीं है। प्रशासन चाहता है कि smart boards का इस्तेमाल उन्हीं हिस्सों में किया जाए जहां visual material, तस्वीर, वीडियो या किसी मुश्किल concept को समझाने में डिजिटल माध्यम वास्तव में उपयोगी हो। बाकी teaching activities में पारंपरिक blackboard या whiteboard और interactive methods को बढ़ावा देने की बात कही गई है।
शिकायतों के बाद सामने आया फैसला
गौतमबुद्ध नगर में स्क्रीन टाइम को लेकर सामने आई शिकायतें इस फैसले की अहम वजह बताई जा रही हैं। रिपोर्टों के मुताबिक कुछ अभिभावकों ने बच्चों के classroom में कई घंटे तक smart और digital boards देखने को लेकर चिंता जताई थी। प्रशासन ने इसी संदर्भ में स्कूलों को स्क्रीन आधारित teaching को जरूरत तक सीमित रखने का निर्देश दिया है।
हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टों में यह स्थापित नहीं किया गया है कि जिले के सभी स्कूलों में चार से पांच घंटे का digital board इस्तेमाल हो रहा था। इसलिए इस आंकड़े को पूरे Noida-Greater Noida school system की सामान्य स्थिति के रूप में देखना सही नहीं होगा। यह शिकायतों में सामने आए कुछ मामलों से जुड़ा संदर्भ है।
डिजिटल पढ़ाई बनाम पारंपरिक teaching
शिक्षा में smart boards और digital content का इस्तेमाल पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है। इनके जरिए maps, diagrams, animations, videos और अन्य visual material को classroom में आसानी से समझाया जा सकता है। लेकिन नई गाइडलाइन का संकेत यह है कि हर lesson को screen के जरिए पढ़ाना जरूरी नहीं माना जा रहा।
प्रशासन ने blackboard और whiteboard आधारित teaching के साथ interactive activities को फिर से अहमियत देने की बात कही है। इसका अर्थ यह है कि classroom में technology को teaching का एक tool माना जाए, पूरी teaching व्यवस्था का विकल्प नहीं।
यह रुख राष्ट्रीय स्तर पर digital education को लेकर पहले जारी guidance से भी व्यापक रूप से मेल खाता है। केंद्र सरकार की PRAGYATA guidelines में भी digital education के दौरान screen time, age-appropriate learning और online तथा offline activities के संतुलन पर जोर दिया गया था।
बच्चों की आंखों और screen breaks पर जोर
नई व्यवस्था में सिर्फ screen duration कम करने की बात नहीं है। स्कूलों को screen breaks, उचित brightness और विद्यार्थियों की आंखों की नियमित जांच जैसे उपायों पर भी ध्यान देने को कहा गया है। रिपोर्टों के अनुसार quarterly eye check-ups की व्यवस्था पर भी जोर दिया गया है।
यहां यह फर्क समझना जरूरी है कि प्रशासनिक guideline का उद्देश्य classroom screen exposure को manage करना है। इसे बच्चों के हर तरह के digital use पर लागू होने वाली सार्वभौमिक सीमा समझना सही नहीं होगा। घर पर mobile, television या अन्य devices के इस्तेमाल का नियमन इस निर्देश का मुख्य विषय नहीं है।
20-20-20 नियम का संदर्भ
स्क्रीन से जुड़े निर्देशों में आंखों को आराम देने वाली practices का भी उल्लेख किया गया है। रिपोर्टों में online classes के संदर्भ में 20-20-20 rule का जिक्र आया है, जिसके तहत लंबे समय तक पास की screen देखने के दौरान नियमित अंतराल पर दूर देखने की सलाह दी जाती है।
स्कूलों के लिए इसका व्यावहारिक मतलब यह है कि लगातार digital content चलाने के बजाय teaching को अलग-अलग तरीकों में बांटा जाए। शिक्षक किसी concept को smart board पर समझाने के बाद discussion, writing, reading या classroom activity की ओर बढ़ सकते हैं।
क्या यह तकनीक के खिलाफ फैसला है?
उपलब्ध जानकारी के आधार पर इसे technology के खिलाफ फैसला कहना सही नहीं होगा। प्रशासन ने smart boards को बंद करने का आदेश नहीं दिया है, बल्कि उनके इस्तेमाल को सीमित और उद्देश्यपूर्ण बनाने की दिशा में निर्देश दिए हैं। यानी digital tools का इस्तेमाल वहां किया जाना है जहां वे learning को बेहतर तरीके से support कर सकें।
इस दृष्टिकोण में एक अहम सवाल implementation का भी है। स्कूलों में कितनी देर smart board इस्तेमाल हुआ, इसका रिकॉर्ड कैसे रखा जाएगा और guidelines का पालन किस तरह monitor किया जाएगा—इसकी विस्तृत व्यवस्था उपलब्ध रिपोर्टों में स्पष्ट नहीं है। इसलिए आगे की monitoring इस फैसले की वास्तविक असरदारी तय करने में अहम होगी।
स्कूलों और शिक्षकों के सामने चुनौती
इस बदलाव का सीधा असर classroom planning पर पड़ सकता है। जिन स्कूलों में digital boards teaching process का बड़ा हिस्सा बन चुके हैं, वहां teachers को lessons को screen और non-screen activities के बीच नए तरीके से बांटना होगा।
दूसरी तरफ, केवल screen time कम कर देना अपने आप में बेहतर learning की गारंटी नहीं है। असली चुनौती यह होगी कि कम digital time में भी जरूरी visual concepts प्रभावी तरीके से समझाए जाएं और बाकी समय meaningful classroom interaction में इस्तेमाल हो।
अभिभावकों के लिए क्या मायने रखता है?
अभिभावकों के लिए इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि classroom में digital exposure को लेकर अब स्पष्ट सीमाएं सामने आई हैं। प्राथमिक स्तर पर 30 मिनट और अपर-प्राइमरी स्तर पर 60 मिनट की सीमा smart और digital board के classroom use से संबंधित है।
हालांकि, अभिभावकों को यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि बच्चे का पूरे दिन का कुल screen time अब केवल 30 या 60 मिनट है। स्कूल की guideline classroom smart-board use से संबंधित है; घर में mobile, television या अन्य devices के इस्तेमाल के लिए यह आदेश स्वतः लागू नहीं होता।
व्यापक शिक्षा व्यवस्था पर संभावित असर
Noida और Greater Noida देश के उन urban education hubs में हैं जहां digital infrastructure का इस्तेमाल व्यापक रूप से होता है। ऐसे में यह guideline technology-based education और traditional classroom methods के बीच संतुलन को लेकर एक महत्वपूर्ण स्थानीय policy intervention है।
अगर इसका implementation प्रभावी रहता है, तो अन्य education authorities भी classroom screen exposure को लेकर अपने मौजूदा practices की समीक्षा कर सकती हैं। लेकिन इस समय यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह मॉडल दूसरे राज्यों या पूरे देश में लागू किया जाएगा।
आगे क्या होगा?
अब मुख्य सवाल implementation और compliance का है। स्कूलों को यह तय करना होगा कि smart boards का इस्तेमाल किन lessons और activities में किया जाए तथा बाकी teaching time को किस तरह screen-free बनाया जाए।
प्रशासन की monitoring, schools की compliance और अभिभावकों की प्रतिक्रिया से यह स्पष्ट होगा कि guideline व्यवहार में कितना असर डालती है। साथ ही, eye check-ups और screen breaks जैसी व्यवस्थाओं को सिर्फ निर्देश तक सीमित रखने के बजाय नियमित school practice में बदलना भी महत्वपूर्ण होगा।
नोएडा स्कूलों में स्क्रीन टाइम को लेकर आया यह निर्देश digital education को रोकने के बजाय उसके इस्तेमाल को अधिक नियंत्रित और उद्देश्यपूर्ण बनाने की कोशिश है। प्राथमिक कक्षाओं के लिए 30 मिनट और अपर-प्राइमरी के लिए 60 मिनट की सीमा इसका सबसे अहम हिस्सा है।
फिलहाल स्थापित तथ्य यही है कि गौतमबुद्ध नगर प्रशासन ने smart और digital board के इस्तेमाल को सीमित करने तथा traditional teaching, breaks और eye-care measures पर जोर दिया है। वहीं, इस policy का वास्तविक असर और compliance किस स्तर पर होता है, यह आने वाले समय में सामने आएगा। बच्चों की पढ़ाई में technology की भूमिका महत्वपूर्ण बनी रहेगी, लेकिन इस फैसले ने यह सवाल जरूर सामने रखा है कि classroom में technology का इस्तेमाल कितना और किस उद्देश्य से होना चाहिए।