केंद्र सरकार की Semicon 2.0 योजना के तहत अगले पांच वर्षों में 1.5 से 2 लाख प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित होने का अनुमान है। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल भारत को चिप डिजाइन, मैन्युफैक्चरिंग और नवाचार के वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
📍 नई दिल्ली
📰 19 जुलाई 2026
✍️ अपूर्वा चौधरी
Semicon 2.0 से भारत के सेमीकंडक्टर सेक्टर को नई रफ्तार
केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी Semicon 2.0 योजना भारत के सेमीकंडक्टर उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ₹1.27 लाख करोड़ की इस योजना को मंजूरी दी, जिसका उद्देश्य देश में सेमीकंडक्टर डिजाइन, निर्माण और नवाचार से जुड़ा मजबूत इकोसिस्टम विकसित करना है।
उद्योग विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस पहल से अगले पांच वर्षों में 1.5 लाख से 2 लाख प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित हो सकते हैं। इसके साथ ही भारत केवल इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबली केंद्र तक सीमित न रहकर वैश्विक चिप डिजाइन, इंजीनियरिंग और रिसर्च हब के रूप में अपनी पहचान मजबूत कर सकता है।
किन क्षेत्रों पर रहेगा योजना का फोकस?
भर्ती एवं कार्यबल समाधान कंपनी NLB Services के विश्लेषण के अनुसार, Semicon 2.0 का अगला चरण केवल चिप निर्माण तक सीमित नहीं रहेगा। इसका दायरा चिप डिजाइन, सेमीकंडक्टर वेरिफिकेशन, एम्बेडेड सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक डिजाइन ऑटोमेशन (EDA), एआई आधारित मैन्युफैक्चरिंग, एडवांस्ड पैकेजिंग और स्मार्ट सप्लाई चेन जैसे उच्च तकनीकी क्षेत्रों तक विस्तारित होगा।
इन क्षेत्रों में निवेश बढ़ने से उच्च कौशल वाले इंजीनियरों, डिजाइन विशेषज्ञों और रिसर्च प्रोफेशनल्स की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि होने की संभावना है।
रोजगार और कौशल विकास पर होगा सबसे बड़ा असर
NLB Services के अनुसार, 2030 तक सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र की लगभग 70 प्रतिशत नौकरियों का स्वरूप बदल सकता है। इसका अर्थ है कि उद्योग में पारंपरिक भूमिकाओं के साथ-साथ उच्च तकनीकी कौशल वाले पेशेवरों की मांग तेजी से बढ़ेगी। विशेष रूप से चिप डिजाइन, एम्बेडेड सिस्टम, एआई आधारित मैन्युफैक्चरिंग, ऑटोमेशन और रिसर्च से जुड़े विशेषज्ञों के लिए नए अवसर पैदा होने की उम्मीद है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि उद्योग की जरूरतों के अनुरूप कौशल विकास कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से लागू किया गया, तो भारत वैश्विक सेमीकंडक्टर प्रतिभा का एक प्रमुख केंद्र बन सकता है। इससे इंजीनियरिंग और तकनीकी शिक्षा प्राप्त युवाओं के लिए रोजगार के नए रास्ते खुलेंगे।
ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (GCC) का विस्तार
NLB Services के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सचिन अलुग का कहना है कि वर्ष 2030 तक सेमीकंडक्टर क्षेत्र से जुड़े ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (GCCs) की संख्या में 25 से 30 प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है। इससे भारत में वैश्विक कंपनियों के अनुसंधान, इंजीनियरिंग और उत्पाद विकास केंद्रों का विस्तार होगा।
विशेषज्ञों के अनुसार, GCC के बढ़ने से केवल रोजगार ही नहीं बढ़ेंगे, बल्कि देश में नवाचार, तकनीकी अनुसंधान और वैश्विक स्तर की इंजीनियरिंग क्षमताओं को भी मजबूती मिलेगी।
IESA का आकलन क्या कहता है?
इंडिया इलेक्ट्रॉनिक्स एंड सेमीकंडक्टर एसोसिएशन (IESA) के अनुसार, सेमीकॉन मिशन के पहले चरण में 20 अरब डॉलर से अधिक के प्रस्तावित निवेश आकर्षित किए गए हैं। दूसरे चरण में फैब्रिकेशन (Fab), एडवांस्ड पैकेजिंग, डिजाइन, अनुसंधान एवं विकास (R&D), प्रतिभा विकास, उपकरण निर्माण और कच्चे माल पर विशेष जोर दिया गया है।
IESA का मानना है कि यह रणनीति भारत को वैश्विक सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन में एक भरोसेमंद भागीदार बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
छह प्रमुख क्षेत्रों पर रहेगा सरकार का फोकस
सरकार के अनुसार, Semicon 2.0 के तहत चिप डिजाइन, सेमीकंडक्टर उपकरण एवं सामग्री, फैब्रिकेशन यूनिट, ATMP/OSAT इकाइयों, अनुसंधान एवं विकास तथा कौशल विकास सहित छह प्रमुख क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जाएगी।
सरकार अब तक 12 सेमीकंडक्टर विनिर्माण परियोजनाओं को मंजूरी दे चुकी है, जिनमें ₹1.64 लाख करोड़ से अधिक के निवेश का प्रस्ताव है। इन परियोजनाओं का उद्देश्य भारत में एक मजबूत और आत्मनिर्भर सेमीकंडक्टर विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना है।
Semicon 2.0 भारत के सेमीकंडक्टर क्षेत्र को नई दिशा देने वाली एक महत्वाकांक्षी पहल के रूप में देखा जा रहा है। यदि योजना तय समयसीमा के अनुसार आगे बढ़ती है, तो इससे अगले पांच वर्षों में 1.5 लाख से 2 लाख प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित हो सकते हैं। साथ ही चिप डिजाइन, फैब्रिकेशन, एडवांस्ड पैकेजिंग, अनुसंधान एवं विकास और कौशल विकास जैसे क्षेत्रों में भारत की वैश्विक उपस्थिति भी मजबूत होने की संभावना है।
हालांकि, इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए निवेश के साथ-साथ कुशल मानव संसाधन, अत्याधुनिक तकनीक, मजबूत सप्लाई चेन और उद्योग-अकादमिक सहयोग भी महत्वपूर्ण होंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन सभी पहलुओं पर प्रभावी ढंग से काम किया गया, तो भारत आने वाले वर्षों में वैश्विक सेमीकंडक्टर उद्योग का एक प्रमुख केंद्र बन सकता है।