SYNOPSIS
केंद्र ने मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम को औपचारिक रूप से नोटिफाई कर दिया है। ₹62,500 करोड़ की पांच वर्षीय योजना उत्पादन, घरेलू वैल्यू एडिशन, भारतीय ब्रांड, डिजाइन और आरएंडडी को बढ़ावा देगी। सरकार को इससे करीब 60,000 डायरेक्ट जॉब्स और लगभग ₹39 लाख करोड़ के संचयी उत्पादन की उम्मीद है।
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नई दिल्ली | 22 अगस्त 2026 | Apurva Choudhary
मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग के लिए ₹62,500 करोड़ की स्कीम
भारत के मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम यानी MPMS को औपचारिक रूप से नोटिफाई कर दिया है। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने 21 अगस्त 2026 को जारी अधिसूचना में योजना के लिए ₹62,500 करोड़ का बजटीय परिव्यय तय किया है।
पांच साल की यह योजना वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक चलेगी। इसका मकसद सिर्फ मोबाइल फोन की संख्या बढ़ाना नहीं है, बल्कि भारत में घरेलू वैल्यू एडिशन, कंपोनेंट सप्लाई चेन, भारतीय ब्रांड, डिजाइन और रिसर्च एंड डेवलपमेंट की क्षमता को मजबूत करना है।
सरकार के मुताबिक इस योजना के दौरान भारत में मोबाइल फोन का संचयी उत्पादन करीब ₹39 लाख करोड़ तक पहुंच सकता है और लगभग 60,000 डायरेक्ट जॉब्स पैदा होने की उम्मीद है। ये अनुमान सरकारी योजना के अपेक्षित परिणाम हैं, इन्हें निश्चित उपलब्धि के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए।
MPMS में क्या बदला है?
मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम को दो प्रमुख टारगेट सेगमेंट में बांटा गया है। पहला सेगमेंट मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग को इंसेंटिव देने पर केंद्रित है, जबकि दूसरा भारतीय मोबाइल ब्रांड्स को विकसित और मजबूत करने के लिए बनाया गया है।
पहले सेगमेंट यानी TS1 के तहत पात्र कंपनियों को अलग-अलग स्तर पर 2.25 फीसदी से 5 फीसदी तक इंसेंटिव दिया जाएगा। दूसरे सेगमेंट TS2 में पात्र भारतीय ब्रांड्स को 5 फीसदी इंसेंटिव मिलेगा और भारतीय डिजाइन तथा आरएंडडी के लिए अतिरिक्त 3 फीसदी इंसेंटिव का प्रावधान है।
इसके अलावा दोनों सेगमेंट में प्रमुख कंपोनेंट और सब-असेंबली की घरेलू सोर्सिंग को बढ़ावा देने के लिए 1.5 फीसदी तक अतिरिक्त इंसेंटिव का प्रावधान किया गया है। इसका सीधा उद्देश्य मोबाइल फोन के भीतर इस्तेमाल होने वाले ज्यादा से ज्यादा महत्वपूर्ण हिस्सों की मैन्युफैक्चरिंग भारत में बढ़ाना है।
भारतीय ब्रांड पर खास फोकस
इस स्कीम की एक अहम खासियत यह है कि सरकार सिर्फ विदेशी कंपनियों के भारत में उत्पादन बढ़ाने पर निर्भर नहीं रहना चाहती। योजना में भारतीय स्वामित्व वाले मोबाइल ब्रांड्स को अलग से सपोर्ट देने का प्रावधान किया गया है।
सरकार के मुताबिक भारतीय ब्रांड के लिए कंपनी का भारत में रजिस्ट्रेशन या इनकॉरपोरेशन होना, भारत में आईपी और ट्रेडमार्क का स्वामित्व, भारतीय नागरिकों के पास मैनेजमेंट कंट्रोल और 51 फीसदी से अधिक शेयरहोल्डिंग भारतीय नागरिकों के पास होना जरूरी है। इसके साथ देश में इन-हाउस डिजाइन और आरएंडडी क्षमता भी आवश्यक होगी।
इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा है कि योजना के तहत वास्तविक भारतीय स्वामित्व वाले ब्रांड, डिजाइन और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी को महत्व दिया जाएगा। सरकार ने यह भी कहा है कि आईपी के भारतीय स्वामित्व की विस्तृत जांच की जाएगी।
किन कंपनियों को मिलेगा फायदा?
TS1 के तहत भारत में रजिस्टर्ड मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरर्स और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सर्विसेज यानी EMS कंपनियां पात्र हो सकती हैं। इसके लिए वित्त वर्ष 2025-26 में न्यूनतम ₹10,000 करोड़ के टर्नओवर की शर्त रखी गई है।
मौजूदा ब्रांड्स को वित्त वर्ष 2025-26 की बिक्री सीमा के ऊपर हर साल कम से कम ₹5,000 करोड़ का अतिरिक्त वार्षिक सेल्स थ्रेशोल्ड पूरा करना होगा। नए ब्रांड के लिए भारत में ₹10,000 करोड़ की सालाना बिक्री हासिल करने के बाद आगे निर्धारित वार्षिक बिक्री सीमा लागू होगी।
TS2 में प्रवेश की शर्त अपेक्षाकृत अलग है। इसमें आवेदक के लिए वित्त वर्ष 2025-26 में न्यूनतम ₹1,000 करोड़ का टर्नओवर और भारतीय ब्रांड की निर्धारित शर्तों को पूरा करना जरूरी है।
लोकल कंपोनेंट बनाने पर अतिरिक्त फायदा
सरकार ने योजना में घरेलू कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग को भी अहम जगह दी है। प्रमुख कंपोनेंट और सब-असेंबली की भारत में सोर्सिंग करने वाली कंपनियों को 1.5 फीसदी तक अतिरिक्त इंसेंटिव मिल सकता है।
इसके लिए संबंधित कंपोनेंट को किसी वित्त वर्ष में कंपनी द्वारा बनाए गए कुल मोबाइल फोन यूनिट्स के कम से कम 25 फीसदी के लिए लोकलाइज करना होगा। यानी सिर्फ मोबाइल को भारत में असेंबल करना पर्याप्त नहीं होगा; योजना घरेलू सप्लाई चेन की गहराई बढ़ाने पर भी जोर देती है।
यही पहल भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स इकोसिस्टम के लिए अहम हो सकती है। मोबाइल फोन की अंतिम असेंबली के साथ अगर डिस्प्ले, कैमरा मॉड्यूल, बैटरी, पीसीबी और दूसरे प्रमुख हिस्सों की स्थानीय सप्लाई बढ़ती है, तो उत्पादन से पैदा होने वाला आर्थिक मूल्य भी देश के भीतर ज्यादा रह सकता है।
PLI के बाद MPMS क्यों लाई गई?
नई योजना ऐसे समय आई है जब बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग के लिए पहले लागू PLI-LSEM योजना का कार्यकाल 31 मार्च 2026 को समाप्त हो चुका है। सरकार के अनुसार उस योजना ने भारत को मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपोर्ट के ग्लोबल इकोसिस्टम में स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई।
अब MPMS के जरिए सरकार अगले चरण पर फोकस कर रही है। इसका जोर उत्पादन का पैमाना बढ़ाने के साथ-साथ घरेलू वैल्यू एडिशन, सप्लाई चेन रेजिलिएंस और भारतीय ब्रांड्स की क्षमता विकसित करने पर है।
यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग में केवल असेंबली और वास्तविक घरेलू मैन्युफैक्चरिंग के बीच बड़ा अंतर होता है। ज्यादा लोकल कंपोनेंट और भारतीय डिजाइन आने से उद्योग की वैल्यू चेन में भारत की हिस्सेदारी बढ़ सकती है।
भारत की मौजूदा स्थिति क्या है?
सरकार के आंकड़ों के मुताबिक भारत अब वॉल्यूम के लिहाज से दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरर है। देश में इस्तेमाल होने वाले करीब 99.2 फीसदी मोबाइल फोन भारत में ही बनाए जाते हैं।
सरकारी आंकड़ों में यह भी कहा गया है कि 2025 में स्मार्टफोन भारत की सबसे बड़ी एक्सपोर्टेड प्रोडक्ट कैटेगरी बन गई। इसने डीजल फ्यूल और कट डायमंड्स जैसी पारंपरिक प्रमुख एक्सपोर्ट कैटेगरी को पीछे छोड़ा।
इससे मोबाइल फोन सेक्टर की अहमियत सिर्फ कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स तक सीमित नहीं रहती। यह भारत के एक्सपोर्ट, मैन्युफैक्चरिंग, रोजगार और ग्लोबल वैल्यू चेन में हिस्सेदारी से भी जुड़ गया है।
क्या ₹39 लाख करोड़ का उत्पादन लक्ष्य हासिल होगा?
सरकार ने MPMS की पांच वर्षीय अवधि में करीब ₹39 लाख करोड़ के संचयी मोबाइल फोन उत्पादन का अनुमान लगाया है। साथ ही एक्सपोर्ट में उल्लेखनीय वृद्धि और करीब 60,000 डायरेक्ट जॉब्स की उम्मीद जताई गई है।
हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये सरकारी अनुमान हैं। वास्तविक उत्पादन और रोजगार इस बात पर निर्भर करेंगे कि कितनी कंपनियां योजना में निवेश करती हैं, इंसेंटिव का इस्तेमाल किस स्तर पर होता है, ग्लोबल डिमांड कैसी रहती है और भारत कितनी तेजी से कंपोनेंट सप्लाई चेन को लोकलाइज कर पाता है।
यानी योजना का बजटीय आकार बड़ा है, लेकिन इसका वास्तविक इम्पैक्ट केवल घोषित राशि से नहीं बल्कि निवेश, उत्पादन, एक्सपोर्ट और घरेलू वैल्यू एडिशन में दिखाई देगा।
भारतीय मोबाइल ब्रांड्स के लिए क्या मायने?
MPMS का दूसरा टारगेट सेगमेंट भारतीय मोबाइल ब्रांड्स के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। सरकार चाहती है कि भारत सिर्फ दूसरे देशों की कंपनियों के लिए मैन्युफैक्चरिंग बेस न बने, बल्कि देश से अपने ब्रांड, डिजाइन और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी भी ग्लोबल मार्केट में जाएं।
भारतीय ब्रांड्स के लिए 5 फीसदी इंसेंटिव और डिजाइन-आरएंडडी पर अतिरिक्त 3 फीसदी इंसेंटिव इसी दिशा में दिया गया है। साथ ही सरकार ने गैर-वित्तीय सपोर्ट देने की भी बात कही है।
अगर यह मॉडल सफल होता है, तो भारत की इलेक्ट्रॉनिक्स इंडस्ट्री में मूल्य का बड़ा हिस्सा केवल मैन्युफैक्चरिंग से नहीं बल्कि डिजाइन, टेक्नोलॉजी और ब्रांडिंग से भी पैदा हो सकता है।
उपभोक्ताओं पर क्या असर पड़ेगा?
MPMS का प्राथमिक उद्देश्य सीधे तौर पर मोबाइल फोन की खुदरा कीमत कम करना नहीं है। योजना का फोकस मैन्युफैक्चरिंग स्केल, घरेलू वैल्यू एडिशन, ब्रांड्स और सप्लाई चेन पर है।
लंबी अवधि में घरेलू उत्पादन और कंपोनेंट इकोसिस्टम मजबूत होने से कंपनियों को सप्लाई चेन में ज्यादा विकल्प मिल सकते हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि योजना लागू होते ही बाजार में मोबाइल फोन सस्ते हो जाएंगे।
मोबाइल की कीमतों पर ग्लोबल कंपोनेंट कॉस्ट, सेमीकंडक्टर कीमत, करेंसी मूवमेंट, टैक्स, ब्रांड स्ट्रेटेजी और अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन जैसे कई फैक्टर असर डालते हैं।
आगे की चुनौती क्या होगी?
MPMS के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि घरेलू वैल्यू एडिशन को वास्तविक रूप से गहरा करना होगी। भारत अगर लंबे समय में ग्लोबल इलेक्ट्रॉनिक्स हब बनना चाहता है तो कंपोनेंट, डिजाइन, आरएंडडी और आईपी में भी क्षमता बढ़ानी होगी।
इंसेंटिव का प्रभाव इस बात से भी तय होगा कि पात्र कंपनियां किस स्तर पर निवेश करती हैं और भारतीय ब्रांड्स कितनी तेजी से वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा कर पाते हैं। इसके अलावा स्थानीय सप्लायर नेटवर्क और कुशल मानव संसाधन का विकास भी जरूरी होगा।
सरकार ने योजना को पांच साल के लिए डिजाइन किया है, इसलिए इसका पूरा असर तत्काल नहीं बल्कि चरणबद्ध तरीके से सामने आने की संभावना है।
मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग स्कीम भारत की इलेक्ट्रॉनिक्स इंडस्ट्री के लिए PLI-LSEM के बाद अगला बड़ा पॉलिसी फ्रेमवर्क है। ₹62,500 करोड़ के बजटीय परिव्यय वाली इस योजना में मैन्युफैक्चरिंग, भारतीय ब्रांड, डिजाइन-आरएंडडी और घरेलू कंपोनेंट सोर्सिंग को एक साथ प्रोत्साहन देने की कोशिश की गई है।
सरकार का अनुमान है कि पांच साल में मोबाइल उत्पादन करीब ₹39 लाख करोड़ तक पहुंच सकता है और लगभग 60,000 डायरेक्ट रोजगार पैदा हो सकते हैं। लेकिन ये लक्ष्य हैं, गारंटीकृत नतीजे नहीं।
इस योजना की असली कामयाबी इस बात से मापी जाएगी कि भारत मोबाइल असेंबली से आगे बढ़कर कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग, भारतीय डिजाइन, आरएंडडी, आईपी और ग्लोबल ब्रांड वैल्यू में कितनी हिस्सेदारी हासिल करता है। यही MPMS को सिर्फ एक इंसेंटिव स्कीम से आगे भारत की इलेक्ट्रॉनिक्स इंडस्ट्री की दीर्घकालिक रणनीति बना सकता है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।