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अस्पतालों का मुनाफा और मरीजों की मजबूरी, स्वास्थ्य व्यवस्था की जवाबदेही पर गंभीर सवाल
Asif Khan
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2026-10-23 20:38:40
* अस्पतालों के भारी मुनाफे पर सवाल, सुप्रीम कोर्ट में केंद्र ने मानी मरीजों की परेशानी
* कैंसर की दवाओं पर 700% तक मार्जिन का दावा, अस्पतालों की कीमतों पर उठे सवाल
* अस्पतालों में दवाओं की कीमतों पर कैसे लगेगा अंकुश? सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने दिया जवाब
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार के शपथपत्र से अस्पतालों में दवाओं और मेडिकल सामान की कीमतों को लेकर गंभीर सवाल सामने आए हैं। सरकार के हवाले से प्रकाशित जानकारी के मुताबिक, मरीजों की कमजोर सौदेबाजी की स्थिति और दवाओं के ऊंचे ट्रेड मार्जिन को समस्या का अहम हिस्सा बताया गया है।
📍 नई दिल्ली, भारत
🗓️ 23 अक्टूबर 2026 ✍️ आसिफ खान
### अस्पतालों में दवाओं की कीमतों पर केंद्र सरकार का अहम रुख
नई दिल्ली। देश के निजी अस्पतालों में इलाज के दौरान मरीजों से दवाओं और चिकित्सा उपकरणों के नाम पर वसूली जाने वाली रकम एक बार फिर न्यायिक बहस का हिस्सा बन गई है। सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार के शपथपत्र से संबंधित रिपोर्ट में दवाओं और मेडिकल उपभोग्य सामग्रियों के ऊंचे ट्रेड मार्जिन को लेकर अहम जानकारी सामने आई है।
रिपोर्ट के मुताबिक, रसायन और उर्वरक मंत्रालय ने अदालत में दाखिल शपथपत्र में माना है कि स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में मरीजों और अस्पतालों के बीच जानकारी तथा सौदेबाजी की असमानता के कारण अनुचित व्यावसायिक व्यवहार की गुंजाइश बनती है।
सरकार ने इस समस्या की जानकारी होने, इसकी जांच करने और संबंधित पक्षों से विचार-विमर्श के बाद उचित कदम उठाने की बात कही है।
हालांकि, शपथपत्र की मूल प्रति और अदालत के संबंधित आदेश का स्वतंत्र परीक्षण अभी नहीं हो सका है।
### कैंसर की दवाओं पर 170% से 700% तक मार्जिन का दावा
उपलब्ध रिपोर्ट में सरकार के शपथपत्र के हवाले से बताया गया है कि कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कुछ दवाओं पर ट्रेड मार्जिन 170% से 700% या उससे अधिक तक पहुंच सकता है।
मेडिकल उपभोग्य सामग्रियों के मामले में भी 100% से 1000% या उससे अधिक मार्जिन का उल्लेख किया गया है।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। ट्रेड मार्जिन और मरीज से एमआरपी से अधिक रकम वसूलना अलग-अलग मुद्दे हैं। ऊंचा ट्रेड मार्जिन अपने आप में हर मामले में गैरकानूनी वसूली साबित नहीं करता।
रिपोर्ट में कहा गया है कि कुछ अस्पताल उन उत्पादों को प्राथमिकता देते हैं जिन पर अधिक ट्रेड मार्जिन उपलब्ध होता है। इससे अस्पताल की खरीद कीमत और मरीज से ली जाने वाली रकम के बीच बड़ा अंतर पैदा होने की आशंका रहती है।
### मरीजों की कमजोर स्थिति पर सरकार ने जताई चिंता
रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार ने माना है कि अस्पताल में इलाज कराने वाला मरीज सामान्य बाजार के ग्राहक जैसी स्थिति में नहीं होता।
इलाज की जरूरत, चिकित्सकीय जानकारी का अभाव और अस्पताल पर निर्भरता मरीज की सौदेबाजी की क्षमता सीमित कर सकते हैं।
इस परिस्थिति में मरीज के लिए दवाओं और मेडिकल सामान की कीमतों की तुलना करना मुश्किल हो जाता है।
शपथपत्र से जुड़ी जानकारी में इसी असमानता को स्वास्थ्य क्षेत्र में अनुचित व्यापारिक व्यवहार की एक प्रमुख वजह बताया गया है।
### सरकार ने कितनी दवाओं की कीमतें तय की हैं?
उपलब्ध रिपोर्ट में सरकार के हवाले से 2 महत्वपूर्ण आंकड़े दिए गए हैं।
### 935
अनुसूचित दवा फॉर्मूलेशन की अधिकतम कीमतें तय होने का दावा
### 3,881
नई दवाओं की खुदरा कीमतें निर्धारित होने का दावा
ये आंकड़े उपलब्ध रिपोर्ट में शपथपत्र के हवाले से दिए गए हैं। संबंधित सरकारी रिकॉर्ड से स्वतंत्र मिलान बाकी है।
सरकार का पक्ष है कि भारतीय दवा बाजार में प्रतिस्पर्धा मौजूद है, लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं की विशेष परिस्थितियों में केवल बाजार की प्रतिस्पर्धा मरीजों के हितों की पूरी सुरक्षा नहीं करती।
### सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा मामला?
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह मुद्दा डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ की याचिका के सिलसिले में सामने आया है।
याचिका में दवाओं और चिकित्सा उपभोग्य सामग्रियों की कीमतों पर नियंत्रण से जुड़े सवाल उठाए गए हैं।
रिपोर्ट में नीति आयोग के एक दस्तावेज और पूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन के 2020 के एक बयान का भी जिक्र है। हालांकि, इन संदर्भों की मूल प्रतियां उपलब्ध नहीं होने के कारण उनसे जुड़े आंकड़ों को स्वतंत्र रूप से प्रमाणित नहीं माना जा सकता।
### क्या सभी अस्पतालों पर कार्रवाई होगी?
फिलहाल उपलब्ध जानकारी से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि सभी निजी अस्पतालों के खिलाफ कार्रवाई का कोई आदेश जारी हो चुका है।
सरकार ने समस्या की जांच और उचित कदम उठाने की बात कही है। लेकिन किसी नए व्यापक मूल्य नियंत्रण आदेश, दंडात्मक कार्रवाई या लागू होने की निश्चित तारीख की पुष्टि उपलब्ध सामग्री में नहीं है।
इसलिए प्रस्तावित सरकारी कदमों और लागू हो चुके नियमों के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है।
### मरीजों के लिए क्या है महत्वपूर्ण?
अस्पताल में इलाज कराने वाले मरीजों और उनके परिजनों के लिए दवाओं की कीमत तथा बिलिंग में पारदर्शिता एक अहम विषय है।
मरीज अपने इलाज से जुड़े दस्तावेजों में दवाओं के नाम, मात्रा, दर्ज कीमत और अन्य शुल्क की जानकारी जांच सकते हैं। किसी बिल पर आपत्ति होने पर अस्पताल से मदवार स्पष्टीकरण मांगना उपयोगी कदम है।
हालांकि, किसी विशेष शुल्क की वैधता संबंधित दवा, लागू मूल्य नियंत्रण नियमों और वास्तविक बिलिंग रिकॉर्ड पर निर्भर करेगी।
### आगे क्या होगा?
अब इस मामले में अदालत की अगली कार्यवाही और केंद्र सरकार के संभावित नीतिगत कदम महत्वपूर्ण होंगे।
क्या दवाओं के ट्रेड मार्जिन पर अतिरिक्त नियंत्रण लगाया जाएगा? क्या अस्पतालों की बिलिंग व्यवस्था के लिए नए निर्देश जारी होंगे? इन सवालों का जवाब आधिकारिक फैसलों और अधिसूचनाओं से ही स्पष्ट होगा।
फिलहाल इतना सामने आया है कि सरकार ने समस्या को स्वीकार करते हुए इस पर विचार और कार्रवाई की आवश्यकता जताई है।
अस्पतालों में दवाओं की कीमतों को लेकर उठे सवाल केवल व्यापारिक मुनाफे तक सीमित नहीं हैं। यह मरीजों को उपलब्ध जानकारी, इलाज के दौरान उनकी निर्भरता और स्वास्थ्य सेवाओं की जवाबदेही से भी जुड़ा विषय है।
नीतिगत दृष्टि से 3 अलग पहलुओं पर ध्यान देना जरूरी है: दवा की निर्धारित अधिकतम कीमत, अस्पताल का वास्तविक खरीद मूल्य और मरीज से वसूली गई रकम।
इनके बीच अंतर का अध्ययन किए बिना किसी अस्पताल की बिलिंग को अवैध घोषित करना उचित नहीं होगा।
साथ ही, अधिक ट्रेड मार्जिन की समस्या को समझने के लिए खरीद व्यवस्था, अस्पतालों की मूल्य निर्धारण नीति और लागू सरकारी नियमों का परीक्षण जरूरी है।
Asif Khan
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक,
अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।