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Uttar Pradesh

19 साल पुराने बुखारी आचार संहिता केस में कोर्ट से जमानत

Wasi Siddiqui • 2026-07-24 17:54:43
19 साल पुराने बुखारी आचार संहिता केस में कोर्ट से जमानत

शाही इमाम बुखारी आचार संहिता केस में कोर्ट पहुंचे, मिली जमानत



19 साल पुराने चुनावी केस में शाही इमाम बुखारी को राहत



मुजफ्फरनगर कोर्ट में पेश हुए शाही इमाम बुखारी, वारंट रिकॉल


मुजफ्फरनगर की सीजेएम कोर्ट में दिल्ली जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी ने वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव से जुड़े आचार संहिता उल्लंघन मामले में पेश होकर जमानत प्राप्त की। अदालत ने गैर-जमानती वारंट रिकॉल करते हुए अगली सुनवाई 23 अगस्त तय की। यह मामला चुनावी नियमों के पालन और न्यायिक प्रक्रिया की निरंतरता के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


📍 मुजफ्फरनगर | 📰 24 जुलाई 2026 | ✍️ Wasi Siddiqui


FULL ARTICLE


19 साल बाद अदालत में पेशी, शाही इमाम बुखारी को मिली जमानत


दिल्ली की जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी शुक्रवार को वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव से जुड़े आचार संहिता उल्लंघन मामले में मुजफ्फरनगर की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) कोर्ट में पेश हुए। लंबे समय तक अदालत में उपस्थित न होने के कारण उनके विरुद्ध जारी गैर-जमानती वारंट को अदालत ने रिकॉल करते हुए उन्हें जमानत प्रदान कर दी। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 23 अगस्त निर्धारित की है।


यह मामला लगभग दो दशक पुराना होने के बावजूद इसलिए चर्चा में है क्योंकि इसमें चुनावी प्रक्रिया, न्यायिक अनुपालन और सार्वजनिक पदाधिकारियों तथा प्रभावशाली धार्मिक हस्तियों की कानूनी जवाबदेही जैसे महत्वपूर्ण पहलू जुड़े हुए हैं।


क्या है पूरा मामला


वर्ष 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान खतौली विधानसभा क्षेत्र में यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) के प्रत्याशी साबिर अली के समर्थन में एक चुनावी सभा आयोजित की गई थी। आरोप है कि सभा स्थल पर सैयद अहमद बुखारी का हेलीकॉप्टर प्रशासनिक अनुमति के बिना उतारा गया था।


चुनाव आयोग के निर्देशों के बाद खतौली कोतवाली में शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी, जामा मस्जिद की सलाहकार समिति के सदस्य ईनाम कुरैशी तथा तत्कालीन प्रत्याशी साबिर अली के विरुद्ध चुनाव आचार संहिता उल्लंघन का मुकदमा दर्ज किया गया था।


लंबे समय तक अदालत में पेश नहीं हुए


मामले की सुनवाई के दौरान अदालत में लगातार अनुपस्थित रहने के कारण बुखारी के खिलाफ समय-समय पर गैर-जमानती वारंट जारी किए जाते रहे। शुक्रवार को वे अपने अधिवक्ताओं के साथ अदालत पहुंचे, जहां वारंट रिकॉल की अर्जी दाखिल की गई।


अदालत ने प्रस्तुत परिस्थितियों पर विचार करने के बाद वारंट रिकॉल करते हुए उन्हें जमानत दे दी। इसके साथ ही मुकदमे की नियमित सुनवाई आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो गया।


गोपनीय रही पूरी न्यायिक प्रक्रिया


शाही इमाम की पेशी को प्रशासन ने सुरक्षा कारणों से बेहद गोपनीय रखा। सुबह से ही कोर्ट परिसर और आसपास पुलिस तथा खुफिया एजेंसियां सक्रिय रहीं। दिल्ली पुलिस की सुरक्षा व्यवस्था के बीच लगभग साढ़े दस बजे वे अदालत पहुंचे।


मीडिया को भी उनकी पेशी की जानकारी काफी देर बाद मिल सकी। सुरक्षा व्यवस्था को देखते हुए प्रशासन ने पूरे घटनाक्रम को नियंत्रित तरीके से संपन्न कराया।


बुखारी ने क्या कहा


कोर्ट परिसर के बाहर पत्रकारों से बातचीत में सैयद अहमद बुखारी ने कहा कि उन्हें लंबे समय तक इस मुकदमे की जानकारी नहीं थी। उनका कहना था कि जैसे ही उन्हें मामले की जानकारी मिली, वे न्यायालय में उपस्थित होकर कानूनी प्रक्रिया का पालन करने पहुंचे हैं।


यह उनका पक्ष है। दूसरी ओर, मामले के कानूनी पहलुओं और आरोपों पर अंतिम निर्णय अदालत की सुनवाई पूरी होने के बाद ही होगा।


चुनावी आचार संहिता क्यों महत्वपूर्ण है


चुनाव आचार संहिता का उद्देश्य सभी राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना तथा चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाए रखना है। प्रशासनिक अनुमति, सरकारी संसाधनों का उपयोग, सार्वजनिक सभाओं की व्यवस्था और सुरक्षा संबंधी नियम इसी व्यवस्था का हिस्सा होते हैं।


यदि किसी भी स्तर पर इन नियमों के उल्लंघन के आरोप लगते हैं तो चुनाव आयोग और स्थानीय प्रशासन कानूनी कार्रवाई कर सकते हैं। हालांकि प्रत्येक आरोपी को अदालत में अपना पक्ष रखने और न्यायिक प्रक्रिया के तहत निष्पक्ष सुनवाई का अधिकार प्राप्त होता है।


कानूनी प्रक्रिया का संदेश


यह मामला इस बात का उदाहरण भी है कि पुराने मामलों में भी न्यायिक प्रक्रिया समाप्त नहीं होती। अदालत में अनुपस्थिति की स्थिति में वारंट जारी होना और बाद में अदालत के समक्ष प्रस्तुत होकर कानूनी राहत प्राप्त करना भारतीय न्याय व्यवस्था की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है।


विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में अंतिम निष्कर्ष केवल न्यायालय के निर्णय के बाद ही निकाला जाना चाहिए। आरोप लगना और दोष सिद्ध होना दोनों अलग-अलग कानूनी अवस्थाएं हैं।


आगे क्या होगा


अब मामले की अगली सुनवाई 23 अगस्त को होगी। उस दौरान अदालत में उपलब्ध साक्ष्यों, अभियोजन पक्ष की दलीलों और बचाव पक्ष के तर्कों पर आगे की सुनवाई होगी।


इस मामले पर सभी पक्षों की कानूनी दलीलों के आधार पर ही न्यायालय अंतिम निर्णय देगा। फिलहाल अदालत ने केवल जमानत प्रदान की है, जिसे आरोपों पर अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता।


निष्कर्ष


करीब 19 वर्ष पुराने इस चुनावी मामले में शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी की अदालत में पेशी और जमानत ने एक बार फिर पुराने लंबित चुनावी मामलों की ओर ध्यान आकर्षित किया है। यह घटनाक्रम याद दिलाता है कि न्यायिक प्रक्रिया समय लेने वाली हो सकती है, लेकिन कानून के समक्ष उपस्थित होना और अदालत के आदेशों का पालन करना प्रत्येक पक्ष की जिम्मेदारी है। अंतिम सत्य और कानूनी निष्कर्ष अब आगामी न्यायिक सुनवाई पर निर्भर करेगा।

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Wasi Siddiqui

Wasi Siddiqui

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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