मुजफ्फरनगर में एडीजे रवि कुमार दिवाकर की अदालत से 97 लंबित आपराधिक मामले जिला एवं सत्र न्यायाधीश वीरेंद्र कुमार सिंह की अदालत में ट्रांसफर किए गए हैं। यह घटनाक्रम उनकी अदालत द्वारा चार महीनों में 10 मामलों में 22 दोषियों को मृत्युदंड सुनाए जाने के बाद सामने आया। मृत्युदंड पर हाईकोर्ट की पुष्टि जरूरी है।
Location: मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश
Date: 20 अगस्त 2026
By: Apurva Choudhary
मुजफ्फरनगर जज से 97 केस ट्रांसफर, 4 महीने में 22 को मौत की सजा
मुजफ्फरनगर में एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज रवि कुमार दिवाकर की अदालत से 97 लंबित आपराधिक मामलों को प्रशासनिक आदेश के तहत वापस लेकर जिला एवं सत्र न्यायाधीश वीरेंद्र कुमार सिंह की अदालत में ट्रांसफर किया गया है। इन मामलों में हत्या और ऐसे गंभीर अपराध शामिल हैं, जिनमें कानून के तहत आजीवन कारावास या मृत्युदंड तक का प्रावधान हो सकता है।
यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब रवि कुमार दिवाकर की अदालत ने पिछले करीब चार महीनों में 10 मामलों में कुल 22 दोषियों को मृत्युदंड सुनाया है। सरकारी अधिवक्ता के हवाले से रिपोर्टों में इन 10 मामलों और 22 मृत्युदंड की पुष्टि की गई है।
क्या हुआ?
97 लंबित आपराधिक केस रवि कुमार दिवाकर की अदालत से हटाकर जिला एवं सत्र न्यायाधीश वीरेंद्र कुमार सिंह की अदालत में भेजे गए हैं। रिपोर्टों के मुताबिक यह कार्रवाई प्रशासनिक आदेश के जरिए हुई है।
जिला बार एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रमोद त्यागी ने इस घटनाक्रम को लेकर वकीलों और पक्षकारों में मौजूद आशंकाओं का जिक्र किया है। हालांकि उपलब्ध रिपोर्टों में ऐसा कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है जिसमें इन मामलों के ट्रांसफर को जज के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई या मिसकंडक्ट बताया गया हो।
इसलिए यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि 97 केस केवल इसलिए हटाए गए क्योंकि जज ने बड़ी संख्या में मृत्युदंड दिए थे। दोनों घटनाओं का समय भले ही जुड़ा हुआ दिखाई देता हो, लेकिन कारण-परिणाम का आधिकारिक संबंध सार्वजनिक रूप से स्थापित नहीं हुआ है।
97 केस और 22 मौत की सजा का क्या संबंध है?
यहां दो अलग घटनाक्रमों को अलग-अलग समझना जरूरी है।
पहला घटनाक्रम 97 लंबित मामलों के ट्रांसफर का है। इन मामलों में संबंधित अदालत ने अभी अंतिम फैसला नहीं सुनाया था।
दूसरा घटनाक्रम 10 मामलों में 22 दोषियों को मृत्युदंड सुनाए जाने का है। इन मामलों में ट्रायल कोर्ट अपने फैसले दे चुका है और मृत्युदंड की आगे की कानूनी प्रक्रिया अलग है।
इसलिए 97 मामलों के ट्रांसफर का मतलब यह नहीं है कि पहले सुनाए गए 22 मृत्युदंड के फैसले भी दूसरी अदालत को सौंप दिए गए हैं या वे फैसले रद्द हो गए हैं।
चार महीनों में 22 मृत्युदंड कैसे दिए गए?
रिपोर्टों के मुताबिक रवि कुमार दिवाकर की अदालत में मृत्युदंड के फैसलों का सिलसिला 6 अप्रैल 2026 को शुरू हुआ। उस दिन 2019 में अधिवक्ता मोहम्मद समीर की हत्या से जुड़े मामले में तीन दोषियों को मृत्युदंड सुनाया गया।
28 अप्रैल को एक अन्य हत्या मामले में एक महिला और उसके तीन बेटों समेत चार दोषियों को मृत्युदंड दिया गया। इसके बाद मई और जून में भी मृत्युदंड के फैसले आए। जुलाई में तीन अलग-अलग मामलों में कुल सात दोषियों को मृत्युदंड सुनाया गया।
अगस्त में भी यह सिलसिला जारी रहा। 12 अगस्त को 1999 के अपहरण और हत्या के मामले में शाहनवाज को मृत्युदंड सुनाया गया। 13 अगस्त को पवन कुमार की हत्या के मामले में चार दोषियों को मृत्युदंड दिया गया।
कुल मिलाकर सरकारी अधिवक्ता के हवाले से प्रकाशित रिपोर्टों में चार महीनों में 10 मामलों में 22 दोषियों को मृत्युदंड दिए जाने की बात कही गई है।
किन मामलों में सुनाई गई मौत की सजा?
इन मामलों में हत्या, अपहरण के बाद हत्या और लूट से जुड़े गंभीर अपराध शामिल रहे। 12 अगस्त के फैसले में अदालत ने 1999 में लकड़ी कारोबारी सलीम के अपहरण और हत्या के मामले में शाहनवाज को दोषी ठहराकर मृत्युदंड दिया था। रिपोर्ट के मुताबिक घटना के करीब 27 साल बाद यह फैसला आया।
13 अगस्त को 2014 में पवन कुमार की हत्या के मामले में चार लोगों को मृत्युदंड दिया गया। अदालत ने मामले को ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ श्रेणी में माना। अभियोजन के अनुसार घटना में पवन कुमार की हत्या हुई थी और उनके भाई अशोक कुमार घायल हुए थे।
मृत्युदंड वाले मामलों में अदालतों को अपराध की प्रकृति, परिस्थितियों और दोषी तथा अपराध से जुड़े अन्य प्रासंगिक पहलुओं का मूल्यांकन करना होता है। इसलिए केवल मृत्युदंड की संख्या के आधार पर किसी फैसले की कानूनी वैधता या औचित्य पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है।
क्या 22 दोषियों को तुरंत फांसी होगी?
नहीं।
यह इस खबर का सबसे अहम कानूनी पहलू है। सत्र अदालत द्वारा सुनाया गया मृत्युदंड अपने आप अंतिम रूप से लागू नहीं हो जाता। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 407 के तहत सत्र अदालत द्वारा दिया गया मृत्युदंड पुष्टि के लिए हाईकोर्ट को भेजा जाता है और हाईकोर्ट की पुष्टि के बिना उसे लागू नहीं किया जा सकता।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा उपलब्ध कराई गई बीएनएसएस सामग्री में भी मृत्युदंड की पुष्टि के बाद सत्र अदालत द्वारा आगे की कार्रवाई की प्रक्रिया दर्ज है।
इसका अर्थ है कि मुजफ्फरनगर की अदालत द्वारा सुनाए गए 22 मृत्युदंड अभी अंतिम फांसी के आदेश नहीं हैं। संबंधित मामलों में हाईकोर्ट की न्यायिक समीक्षा और पुष्टि की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।
क्या केस ट्रांसफर जज के खिलाफ कार्रवाई है?
उपलब्ध जानकारी के आधार पर ऐसा कहना सही नहीं होगा।
97 केसों को दूसरी अदालत में भेजे जाने की कार्रवाई प्रशासनिक आदेश के रूप में रिपोर्ट की गई है। उपलब्ध सार्वजनिक रिपोर्टों में जिला न्यायपालिका की ओर से यह नहीं कहा गया कि जज रवि कुमार दिवाकर के खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई है।
बार एसोसिएशन की ओर से आशंकाओं का उल्लेख जरूर किया गया है। लेकिन वकीलों या पक्षकारों की आशंका और किसी न्यायिक प्रशासनिक निर्णय का आधिकारिक कारण एक ही बात नहीं हैं।
इसलिए खबर में “22 मौत की सजाओं के कारण जज से केस छीन लिए गए” जैसी भाषा इस्तेमाल करना उपलब्ध प्रमाण से आगे निकलना होगा।
कौन हैं रवि कुमार दिवाकर?
रवि कुमार दिवाकर उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा के अधिकारी हैं और नवंबर 2025 से मुजफ्फरनगर में एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज के रूप में कार्यरत बताए गए हैं। उन्होंने 2009 में आजमगढ़ में एडिशनल सिविल जज के तौर पर न्यायिक सेवा शुरू की थी।
वह 2022 में वाराणसी के ज्ञानवापी परिसर से जुड़े मामले में वीडियोग्राफिक सर्वे का आदेश देने के बाद राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आए थे। उनके हालिया मृत्युदंड के फैसलों ने एक बार फिर उनकी न्यायिक कार्यप्रणाली को सार्वजनिक बहस के केंद्र में ला दिया है।
‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ का क्या महत्व है?
भारतीय न्याय व्यवस्था में मृत्युदंड सामान्य सजा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट की स्थापित न्यायिक व्यवस्था के तहत मृत्युदंड को ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ मामलों तक सीमित रखने का सिद्धांत विकसित हुआ है।
मुजफ्फरनगर के हालिया फैसलों में भी कम-से-कम कुछ मामलों में अदालत ने अपराध की गंभीरता और परिस्थितियों को ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ मानने का आधार बनाया। 13 अगस्त के पवन कुमार हत्याकांड के फैसले में अदालत ने अपराध की प्रकृति को बेहद गंभीर माना था।
लेकिन किसी मामले में यह कसौटी पूरी होती है या नहीं, इसका अंतिम न्यायिक मूल्यांकन अपील और मृत्युदंड पुष्टि की प्रक्रिया में भी हो सकता है।
अब 97 मामलों में क्या होगा?
इन 97 लंबित मामलों की सुनवाई अब जिला एवं सत्र न्यायाधीश वीरेंद्र कुमार सिंह की अदालत में होगी, जैसा कि उपलब्ध रिपोर्टों में बताया गया है।
इन मामलों की आगे की सुनवाई, साक्ष्य, गवाहों की स्थिति और अभियोजन तथा बचाव पक्ष की दलीलों के आधार पर न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। सिर्फ केस ट्रांसफर होने से इन मामलों के संभावित परिणाम के बारे में कोई पूर्वानुमान लगाना उचित नहीं होगा।
इसी तरह पहले से सुनाए गए 22 मृत्युदंड के मामलों की प्रक्रिया अलग रहेगी। उन फैसलों पर हाईकोर्ट की पुष्टि और संबंधित अपीलों की स्थिति महत्वपूर्ण होगी।
कौन से सवाल अभी अनुत्तरित हैं?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि 97 मामलों को ट्रांसफर करने के प्रशासनिक आदेश में इस फैसले का विस्तृत कारण क्या दर्ज है। सार्वजनिक रिपोर्टों में प्रशासनिक कार्रवाई की जानकारी सामने आई है, लेकिन आदेश का पूरा कारण सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं बताया गया है।
दूसरा सवाल यह है कि इन 97 मामलों की सुनवाई के लिए नई अदालत में क्या प्राथमिकता तय की जाएगी और क्या इससे लंबित मुकदमों के निपटारे की गति प्रभावित होगी।
तीसरा अहम पहलू 22 मृत्युदंड वाले मामलों की हाईकोर्ट में पुष्टि और अपील की स्थिति है। इन मामलों का अंतिम न्यायिक परिणाम अभी सामने नहीं आया है।
आगे क्या होगा?
97 मामलों की सुनवाई अब वीरेंद्र कुमार सिंह की अदालत में आगे बढ़ेगी। वहीं 22 मृत्युदंड वाले मामलों की न्यायिक यात्रा संबंधित हाईकोर्ट में पुष्टि और अपील की प्रक्रिया से होकर गुजरेगी।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रशासनिक केस ट्रांसफर और न्यायिक फैसलों को अलग-अलग प्रक्रियाओं के रूप में देखा जाए। उपलब्ध प्रमाण अभी यह स्थापित नहीं करते कि 97 मामलों का ट्रांसफर किसी अनुशासनात्मक कार्रवाई का परिणाम था।