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सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर की मस्जिद पर चला बुलडोजर, जिला अदालत के फैसले के बाद कार्रवाई

Mohammad Naved • 2026-09-05 11:16:19
सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर की मस्जिद पर चला बुलडोजर, जिला अदालत के फैसले के बाद कार्रवाई

सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर की मस्जिद को सरकारी भूमि पर अवैध निर्माण मानने वाले आदेश के बरकरार रहने के बाद प्रशासन ने पुलिस सुरक्षा के बीच ढांचा हटाने की कार्रवाई की।


लोकेशन

सहारनपुर, उत्तर प्रदेश

Date 5/9/2026

By Mohd Naved

सहारनपुर कलेक्ट्रेट की मस्जिद पर बुलडोजर कार्रवाई, अदालत के फैसले के बाद प्रशासन ने हटाया ढांचा

सहारनपुर के कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित मस्जिद को लेकर चल रहा विवाद अब प्रशासनिक कार्रवाई तक पहुंच गया है। जिला अदालत द्वारा निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखने के बाद शनिवार को प्रशासन ने पुलिस सुरक्षा के बीच मस्जिद के ढांचे को हटाने की कार्रवाई की।

मामला सरकारी भूमि पर कथित अनधिकृत कब्जे और निर्माण से जुड़ा है। प्रशासन का कहना है कि कार्रवाई न्यायिक आदेश के अनुपालन में की गई है। पूरे इलाके में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सुरक्षा व्यवस्था कड़ी रखी गई।

क्या है पूरा मामला

सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद को लेकर विवाद की शुरुआत सरकारी भूमि पर निर्माण के आरोपों से हुई थी। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, शिकायत के बाद प्रशासन ने भूमि और निर्माण से जुड़े रिकॉर्ड की जांच कराई।

मामला खसरा संख्या ५३९ में स्थित करीब ३१५ वर्ग मीटर भूमि से संबंधित बताया गया है। राजस्व अभिलेखों में इस जमीन को कचहरी और कलेक्ट्रेट परिसर के रूप में दर्ज बताया गया है। प्रशासन के पक्ष के अनुसार यह भूमि राज्य सरकार में निहित है।

विवाद में बजरंग दल के पूर्व प्रांत संयोजक विकास त्यागी की शिकायत का भी उल्लेख सामने आया है। शिकायत में सरकारी भूमि पर मस्जिद निर्माण के अलावा परिसर में मौजूद अन्य कमरों और डाकघर के इस्तेमाल से जुड़े आरोप लगाए गए थे। इन आरोपों को रिपोर्टिंग में शिकायतकर्ता के दावे के तौर पर ही देखा जाना चाहिए।

जुलाई में सिटी मजिस्ट्रेट का फैसला

इस मामले में नगर मजिस्ट्रेट कुलदीप सिंह की अदालत ने जुलाई २०२६ में फैसला सुनाया था। अदालत ने उपलब्ध रिकॉर्ड और साक्ष्यों के आधार पर मस्जिद को सरकारी भूमि पर अनधिकृत निर्माण माना और निर्धारित अवधि में परिसर खाली करने का आदेश दिया।

अदालत ने करीब ६ करोड़ ४१ लाख रुपये की क्षतिपूर्ति वसूली का आदेश भी दिया था। आदेश के मुताबिक संबंधित भूमि के कब्जे और उपयोग के एवज में यह राशि निर्धारित की गई थी।

सुनवाई के दौरान मस्जिद पक्ष की ओर से इसके पुराने होने का दावा रखा गया था। अलग-अलग रिपोर्टों में इस दावे को करीब ७० वर्ष से लेकर १५० वर्ष पुराने होने के रूप में दर्ज किया गया है। अदालत के सामने इस दावे के समर्थन में पर्याप्त दस्तावेज पेश नहीं किए जाने की बात भी रिपोर्टों में सामने आई है।

जिला अदालत में चुनौती

सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश के बाद मस्जिद पक्ष ने जिला अदालत का रुख किया। याचिका में निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी गई और भूमि के स्वामित्व तथा मस्जिद की वक्फ स्थिति से संबंधित दलीलें रखी गईं।

मस्जिद पक्ष की ओर से यह तर्क भी दिया गया कि मस्जिद सुन्नी वक्फ बोर्ड में पंजीकृत है और इसलिए संपत्ति से संबंधित विवाद की सुनवाई का अधिकार वक्फ प्राधिकरण के दायरे में आता है। दूसरी ओर प्रशासन ने भूमि को सरकारी संपत्ति बताते हुए बेदखली की कार्रवाई को उचित ठहराया।

जिला जज सतेंद्र कुमार की अदालत ने सुनवाई के बाद सिटी मजिस्ट्रेट के १६ जुलाई के आदेश को बरकरार रखा। रिपोर्टों के मुताबिक, जिला अदालत ने मस्जिद पक्ष की अपील खारिज कर दी और विवादित भूमि को सरकारी भूमि मानने वाले निचली अदालत के निष्कर्ष को कायम रखा।

अदालत के फैसले के बाद क्या हुआ

जिला अदालत के फैसले के बाद प्रशासन ने कलेक्ट्रेट परिसर में कार्रवाई की तैयारी की। शनिवार को भारी पुलिस बल की मौजूदगी में मस्जिद के ढांचे को हटाने की कार्रवाई की गई।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, अधिकारियों ने कहा कि ढांचा सरकारी जमीन पर अनधिकृत रूप से बना था और कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद कार्रवाई की गई। सहारनपुर के पुलिस अधिकारियों की ओर से भी कानून के मुताबिक कार्रवाई किए जाने की बात कही गई।

कलेक्ट्रेट परिसर संवेदनशील प्रशासनिक क्षेत्र है। इसलिए कार्रवाई के दौरान सुरक्षा व्यवस्था को प्राथमिकता दी गई। शहर के विभिन्न हिस्सों में भी पुलिस बल की तैनाती की खबरें सामने आई हैं।

राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया

मस्जिद के खिलाफ कार्रवाई के बाद मामला राजनीतिक बहस का हिस्सा भी बना। सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद ने पहले मस्जिद की मिल्कियत और भूमि के स्वामित्व पर सवाल उठाए थे। उन्होंने प्रशासन से भूमि के मालिकाना हक को स्पष्ट करने की मांग की थी।

दूसरी ओर प्रशासनिक पक्ष का रुख रिकॉर्ड और न्यायिक आदेश पर आधारित रहा है। अधिकारियों के मुताबिक, कार्रवाई धार्मिक पहचान के आधार पर नहीं, बल्कि सरकारी भूमि पर कथित अनधिकृत निर्माण से संबंधित न्यायिक प्रक्रिया के तहत हुई है।

ऐसे मामलों में आरोप और न्यायिक निष्कर्ष के बीच फर्क बनाए रखना जरूरी है। मस्जिद पक्ष के स्वामित्व और वक्फ संबंधी दावों पर अदालत में जो दलीलें रखी गईं, उनका अंतिम आकलन न्यायिक आदेशों के आधार पर ही किया जाना चाहिए।

सुरक्षा व्यवस्था क्यों बढ़ाई गई

धार्मिक स्थल से जुड़ा कोई भी प्रशासनिक फैसला स्थानीय स्तर पर संवेदनशील प्रतिक्रिया पैदा कर सकता है। इसी वजह से प्रशासन ने कार्रवाई से पहले सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की।

कलेक्ट्रेट परिसर में बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों की मौजूदगी रही। शहर में भी निगरानी और पुलिस तैनाती बढ़ाई गई, ताकि किसी तरह की अप्रिय स्थिति से बचा जा सके। उपलब्ध रिपोर्टों में प्रशासन का फोकस कानून-व्यवस्था बनाए रखने पर बताया गया है।

यह स्थिति इसलिए भी अहम है क्योंकि मामला लंबे समय से कानूनी प्रक्रिया में था और इसके दौरान अलग-अलग पक्षों ने भूमि के स्वामित्व, निर्माण की पुरानियत और वक्फ संबंधी स्थिति को लेकर दावे किए।

विवाद में सबसे अहम कानूनी बिंदु

पूरे प्रकरण का केंद्रीय सवाल भूमि के स्वामित्व और उस पर बने ढांचे की वैधानिक स्थिति रहा। प्रशासनिक रिकॉर्ड में जमीन को कलेक्ट्रेट परिसर की सरकारी भूमि बताया गया, जबकि मस्जिद पक्ष ने इसके पुराने अस्तित्व और वक्फ पंजीकरण से जुड़े तर्क रखे।

सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने प्रशासन के रिकॉर्ड और उपलब्ध साक्ष्यों को स्वीकार करते हुए बेदखली का आदेश दिया। जिला अदालत ने अपील खारिज करके इस आदेश को बरकरार रखा।

इसलिए मौजूदा स्थिति को केवल धार्मिक विवाद के रूप में देखना अधूरा होगा। कानूनी स्तर पर यह सरकारी भूमि, अनधिकृत कब्जे, सार्वजनिक परिसर और धार्मिक ढांचे की वैधानिक स्थिति से जुड़ा मामला है।

आगे क्या हो सकता है

जिला अदालत के फैसले के बाद प्रशासन ने ध्वस्तीकरण की कार्रवाई कर दी है। हालांकि मस्जिद पक्ष के प्रतिनिधियों ने पहले कहा था कि आदेश का अध्ययन करने के बाद आगे की कानूनी कार्रवाई पर फैसला लिया जाएगा।

ऐसे मामलों में आगे की राह उच्च न्यायालय में चुनौती से जुड़ सकती है, लेकिन इस संबंध में कोई नया न्यायिक कदम आधिकारिक रूप से सामने आने तक उसे तथ्य के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा।

६ करोड़ ४१ लाख रुपये से अधिक की क्षतिपूर्ति के आदेश का भी अलग कानूनी प्रभाव है। इसकी वसूली और उससे जुड़ी आगे की प्रक्रिया संबंधित प्रशासनिक तथा न्यायिक कार्रवाई पर निर्भर करेगी।

बड़ी तस्वीर

सहारनपुर का यह मामला उत्तर प्रदेश में सरकारी जमीन और सार्वजनिक परिसरों में धार्मिक या अन्य अनधिकृत निर्माण को लेकर चल रही प्रशासनिक कार्रवाई की व्यापक बहस से भी जुड़ता है। जुलाई में सहारनपुर प्रशासन ने सरकारी भूमि पर स्थित कुछ अन्य धार्मिक ढांचों और मदरसों को लेकर भी नोटिस जारी किए थे।

फिर भी हर मामले की भूमि स्थिति, रिकॉर्ड, निर्माण की तारीख और न्यायिक स्थिति अलग होती है। इसलिए एक मामले के आधार पर सभी धार्मिक स्थलों के बारे में सामान्य निष्कर्ष निकालना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।

सहारनपुर कलेक्ट्रेट मस्जिद प्रकरण में फिलहाल महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि निचली अदालत के आदेश को जिला अदालत ने बरकरार रखा और इसके बाद प्रशासन ने ढांचा हटाने की कार्रवाई की। आगे की कानूनी प्रक्रिया, यदि कोई होती है, तो वह इस विवाद की अगली दिशा तय करेगी।

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Mohammad Naved

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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