कश्मीर में आतंकी नेटवर्क की नई रणनीति का दावा
किशोरों और ओवर ग्राउंड वर्कर्स पर क्यों बढ़ा फोकस?
कश्मीर में बदला आतंकी नेटवर्क का ऑपरेशनल पैटर्न
आईएएनएस की रिपोर्ट में सुरक्षा आकलनों के हवाले से कहा गया है कि कश्मीर में पाकिस्तान-आधारित आतंकी नेटवर्क स्थानीय किशोरों और ओवर ग्राउंड वर्कर्स के इस्तेमाल का तरीका बदल रहा है। रिपोर्ट में अलग-अलग काम और हथियारों की गुप्त आपूर्ति का जिक्र है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि सीमित है।
श्रीनगर, जम्मू-कश्मीर | 13 अगस्त 2026 | शाह टाइम्स
By Mohd Haris
जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ सुरक्षा ग्रिड के सामने एक बदले हुए नेटवर्क मॉडल की चुनौती का दावा सामने आया है। 13 अगस्त की रिपोर्ट में सुरक्षा आकलनों के हवाले से कहा गया है कि पाकिस्तान-आधारित आतंकी नेटवर्क स्थानीय किशोरों, ओवर ग्राउंड वर्कर्स और छोटे स्तर के अलग-अलग कार्यों के जरिए अपनी गतिविधियों को कम दिखाई देने वाला बनाने की कोशिश कर रहा है।
रिपोर्ट में हथियारों की अलग-अलग स्तर पर आपूर्ति और छोटे कामों के लिए स्थानीय नेटवर्क के इस्तेमाल का जिक्र है। हालांकि, रिपोर्ट में दिए गए इन सुरक्षा आकलनों की स्वतंत्र पुष्टि सभी बिंदुओं पर उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे स्थापित तथ्य के बजाय सुरक्षा एजेंसियों के आकलन और रिपोर्टेड दावे के रूप में देखना जरूरी है।
ओवर ग्राउंड वर्कर यानी ओजीडब्ल्यू शब्द जम्मू-कश्मीर के सिक्योरिटी नैरेटिव में उन लोगों के लिए इस्तेमाल होता है, जिन पर आतंकियों को प्रत्यक्ष लड़ाई में शामिल हुए बिना लॉजिस्टिक या नेटवर्क सहायता देने का आरोप रहता है।
इंडियन एक्सप्रेस ने जुलाई 2026 में रिपोर्ट किया था कि केंद्र ने पाकिस्तान स्थित जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े 23 लोगों को यूएपीए के तहत आतंकवादी घोषित किया। रिपोर्ट के मुताबिक इन लोगों पर भर्ती, घुसपैठ, प्रशिक्षण, हथियारों की सप्लाई और जम्मू-कश्मीर में हमलों की योजना से जुड़े आरोप थे।
इससे एक व्यापक तस्वीर सामने आती है। सुरक्षा एजेंसियों की चिंता केवल सीमा पार से आने वाले सशस्त्र आतंकियों तक सीमित नहीं है। स्थानीय संपर्क, फंडिंग, भर्ती, डिजिटल रैडिकलाइजेशन और लॉजिस्टिक नेटवर्क भी काउंटर-टेररिज्म का अहम हिस्सा बन चुके हैं।
रिपोर्ट का सबसे गंभीर पहलू स्थानीय किशोरों के कथित इस्तेमाल से जुड़ा है। रिपोर्ट के अनुसार सुरक्षा आकलनों में ऐसे युवाओं को छोटे और सीमित कामों से जोड़ने की बात कही गई है, जिससे किसी एक व्यक्ति के पास पूरे नेटवर्क की जानकारी न हो।
यह मॉडल सुरक्षा एजेंसियों के लिए इसलिए चुनौतीपूर्ण माना जाता है क्योंकि छोटे स्तर के संपर्कों को एक बड़े नेटवर्क से जोड़ना कठिन होता है। लेकिन इस रिपोर्ट के विशिष्ट दावों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
किशोरों के कथित इस्तेमाल की चिंता पूरी तरह नई भी नहीं है। 2023 में तत्कालीन चिनार कॉर्प्स कमांडर ने पीटीआई को बताया था कि सुरक्षा एजेंसियों ने महिलाओं, लड़कियों और juveniles को संदेश, ड्रग्स और कभी-कभी हथियारों की आवाजाही में इस्तेमाल किए जाने के मामले देखे थे। यह एक पुराना सुरक्षा आकलन है और इसे 2026 के मौजूदा दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं माना जाना चाहिए।
रिपोर्ट में हथियारों के एक ही व्यक्ति या मॉड्यूल के पास लगातार रहने के बजाय अलग-अलग स्तर पर हाथ बदलने की बात कही गई है। एडिटोरियल तौर पर इसका महत्व नेटवर्क की पहचान और जांच को कठिन बनाने की संभावित कोशिश में है।
हालांकि, यहां भी सावधानी जरूरी है। किसी भी हथियार नेटवर्क की वास्तविक संरचना, उसके संचालन की सीमा और उसमें शामिल लोगों की संख्या केवल जांच एजेंसियों की विस्तृत जांच के बाद ही स्थापित हो सकती है।
गृह मंत्रालय से संबंधित जुलाई 2026 की रिपोर्टिंग में पाकिस्तान स्थित आतंकी नेटवर्क पर भर्ती, घुसपैठ और हथियारों की सप्लाई से जुड़े आरोपों का उल्लेख हुआ था। इससे यह जरूर स्पष्ट होता है कि भारत की सिक्योरिटी एजेंसियां हथियारों की सप्लाई और भर्ती नेटवर्क को अलग-अलग नहीं, बल्कि जुड़े हुए सुरक्षा जोखिम के तौर पर देख रही हैं।
कश्मीर और जम्मू क्षेत्र में आतंकवाद का एक दूसरा अहम पहलू भौगोलिक बदलाव है। इंडियन एक्सप्रेस ने फरवरी 2026 में रिपोर्ट किया था कि आतंकियों की गतिविधियां मुख्य घाटी से पहाड़ी और घने जंगलों वाले इलाकों की ओर खिसकने के कारण सुरक्षा एजेंसियों ने दोनों क्षेत्रों के बीच साप्ताहिक सुरक्षा समीक्षा शुरू की।
अप्रैल 2026 की एक अन्य इंडियन एक्सप्रेस रिपोर्ट में कहा गया कि पहलगाम हमले के बाद सुरक्षा रणनीति में बड़ा बदलाव आया और घने जंगलों में ऑपरेशन के लिए जम्मू-कश्मीर पुलिस ने विशेष इकाइयों को प्रशिक्षण दिया। रिपोर्ट के अनुसार सुरक्षा तंत्र ने डिफेंसिव मॉडल से प्री-एम्प्टिव और ऑफेंसिव सिक्योरिटी रणनीति की तरफ बदलाव किया।
इस पृष्ठभूमि में जंगलों का इस्तेमाल केवल भौगोलिक चुनौती नहीं है। यह इंटेलिजेंस, स्थानीय नेटवर्क और सुरक्षा बलों की तैनाती से जुड़ा जटिल मुआमला बन जाता है।
22 अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले के बाद जम्मू-कश्मीर में सिक्योरिटी स्ट्रैटेजी में कई बदलाव हुए। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक सुरक्षा बलों ने घने जंगलों में ऑपरेशन क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया और जम्मू-कश्मीर पुलिस ने ऊंचाई वाले इलाकों तथा जंगलों के लिए विशेष प्रशिक्षण शुरू किया।
इंडिया टुडे ने मई 2025 में रिपोर्ट किया था कि जम्मू-कश्मीर पुलिस के स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप को जंगल और हाई-एल्टीट्यूड वॉरफेयर की ट्रेनिंग दी जा रही थी। रिपोर्ट में इंटेलिजेंस, खास तौर पर ह्यूमन इंटेलिजेंस, को इस रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया था।
इसका मतलब यह है कि सुरक्षा एजेंसियां अब केवल हथियारबंद मुठभेड़ की क्षमता पर निर्भर नहीं रहना चाहतीं। स्थानीय जानकारी, नेटवर्क की पहचान और शुरुआती स्तर पर भर्ती रोकना भी उतना ही अहम हो गया है।
कश्मीर के मौजूदा सिक्योरिटी परिदृश्य में डिजिटल प्लेटफॉर्म की भूमिका भी बढ़ी है। फरवरी 2026 में इंडियन काउंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर्स की एक चर्चा में विशेषज्ञों ने कहा था कि आतंकवाद अब केवल kinetic threat नहीं है। भर्ती, रैडिकलाइजेशन, फंडिंग और प्रोपेगैंडा सोशल मीडिया, गेमिंग प्लेटफॉर्म, एन्क्रिप्टेड एप्लिकेशन और फिनटेक सिस्टम के जरिए भी आगे बढ़ सकते हैं।
इसलिए किशोरों की कथित भर्ती को केवल जमीन पर मौजूद नेटवर्क से जोड़ना अधूरा विश्लेषण होगा। ऑनलाइन रैडिकलाइजेशन, सोशल नेटवर्किंग और स्थानीय संपर्कों का मेल सुरक्षा एजेंसियों के लिए ज्यादा जटिल चुनौती पेश करता है।
यह कहना जल्दबाजी होगी कि कश्मीर में आतंकी नेटवर्क ने अचानक कोई बिल्कुल नई रणनीति अपनाई है। किशोरों, ओजीडब्ल्यू नेटवर्क और स्थानीय लॉजिस्टिक सपोर्ट की चर्चा सुरक्षा रिपोर्टों में पहले भी होती रही है।
अंतर अगर कोई है तो वह नेटवर्क की संरचना और काम बांटने के तरीके में संभावित बदलाव का हो सकता है। रिपोर्ट इसी पहलू पर जोर देती है, लेकिन उपलब्ध स्वतंत्र स्रोत इस विशिष्ट 2026 मॉडल की पूरी पुष्टि नहीं करते।
इसलिए खबर का सबसे सुरक्षित निष्कर्ष यह है कि सुरक्षा एजेंसियां आतंकवादी नेटवर्क के अधिक छोटे, बिखरे और स्थानीय संपर्कों वाले मॉडल को लेकर चिंतित हैं। इसे सीधे तौर पर आईएसआई की प्रमाणित नई रणनीति कहना उपलब्ध स्वतंत्र सबूतों से आगे जाना होगा।
भारत सरकार और भारतीय सुरक्षा एजेंसियां लंबे समय से पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों और उनके नेटवर्क को जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद का प्रमुख स्रोत बताती रही हैं। जुलाई 2026 में गृह मंत्रालय ने पाकिस्तान स्थित 23 लोगों को यूएपीए के तहत आतंकवादी घोषित किया। रिपोर्टों में इन पर भर्ती, घुसपैठ, हथियारों की सप्लाई और हमलों की साजिश जैसे आरोपों का उल्लेख किया गया।
लेकिन आईएसआई की किसी विशिष्ट 2026 रणनीति का स्वतंत्र दस्तावेज या सार्वजनिक प्राथमिक प्रमाण इस रिपोर्ट की पुष्टि के लिए उपलब्ध नहीं है। इसलिए आईएएनएस में प्रकाशित सुरक्षा आकलन को उसी attribution के साथ पेश करना ज्यादा क्रेडिबल एडिटोरियल तरीका है।
जम्मू-कश्मीर में आतंकी नेटवर्क पर सुरक्षा दबाव बढ़ा है, लेकिन सुरक्षा खतरा खत्म नहीं हुआ है। घने जंगल, कठिन पहाड़ी इलाकों और सीमित स्थानीय जानकारी वाले क्षेत्रों में आतंकवाद विरोधी ऑपरेशन अभी भी जटिल हैं।
साथ ही, सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती केवल हथियारबंद आतंकियों को पकड़ना नहीं है। भर्ती रोकना, संभावित ओजीडब्ल्यू नेटवर्क की पहचान करना, डिजिटल रैडिकलाइजेशन पर निगरानी रखना और स्थानीय आबादी का भरोसा बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
यही वह बिंदु है जहां सिक्योरिटी और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन का सवाल सामने आता है। ओजीडब्ल्यू जैसे लेबल के इस्तेमाल पर पहले भी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और स्थानीय राजनीतिक समूहों ने आपत्तियां उठाई हैं। इसलिए हर गिरफ्तारी या हिरासत को जांच और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर देखना जरूरी है।
उपलब्ध संकेत बताते हैं कि जम्मू-कश्मीर में काउंटर-टेररिज्म का अगला चरण नेटवर्क डिसरप्शन पर ज्यादा केंद्रित रहेगा। इसमें भर्ती चैनलों, वित्तीय प्रवाह, डिजिटल प्रोपेगैंडा और लॉजिस्टिक सपोर्ट की पहचान अहम होगी।
जंगल और पहाड़ी क्षेत्रों में सुरक्षा बलों की क्षमता बढ़ाने की कोशिश पहले से जारी है। साथ ही, स्थानीय इंटेलिजेंस और टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल का महत्व भी बढ़ रहा है।
लेकिन किसी भी नई रणनीति की सफलता केवल गिरफ्तारियों या मुठभेड़ों की संख्या से नहीं मापी जा सकती। लंबे समय में स्थानीय युवाओं को आतंकवादी नेटवर्क से दूर रखना और जनता का भरोसा बनाए रखना ज्यादा निर्णायक होगा।
कश्मीर में आतंकी नेटवर्क के कथित बदलते मॉडल को लेकर रिपोर्ट ने एक गंभीर सिक्योरिटी चिंता सामने रखी है। किशोरों और ओवर ग्राउंड वर्कर्स के संभावित इस्तेमाल, छोटे स्तर के अलग-अलग काम और हथियारों की गुप्त सप्लाई जैसे दावे सुरक्षा एजेंसियों के सामने नेटवर्क की बदलती प्रकृति की ओर इशारा करते हैं।
लेकिन इन दावों को प्रमाणित तथ्य के तौर पर पेश करना अभी उचित नहीं होगा। उपलब्ध स्वतंत्र स्रोत कश्मीर में ओजीडब्ल्यू नेटवर्क, डिजिटल रैडिकलाइजेशन, पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों और जंगल आधारित गतिविधियों को लेकर व्यापक सुरक्षा चिंताओं की पुष्टि करते हैं, मगर बताए गए इस विशिष्ट नए मॉडल की पूरी स्वतंत्र पुष्टि नहीं करते।
अगले चरण में सबसे अहम सवाल यही रहेगा कि सुरक्षा एजेंसियां स्थानीय भर्ती और लॉजिस्टिक नेटवर्क को कितनी जल्दी पहचान पाती हैं और आतंकवाद विरोधी कार्रवाई के साथ नागरिकों के भरोसे और कानूनी प्रक्रिया को कितना मजबूत रखती हैं।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।