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चांद पर परमाणु रिएक्टर लगाने की होड़, अमेरिका के सामने रूस-चीन की चुनौती

Harish Qureshi • 2026-10-31 14:42:49
चांद पर परमाणु रिएक्टर लगाने की होड़, अमेरिका के सामने रूस-चीन की चुनौती

चंद्रमा पर स्थायी ठिकाने बनाने की तैयारी के बीच अमेरिका, रूस और चीन परमाणु ऊर्जा को भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों का अहम हिस्सा बनाने में जुटे हैं। अमेरिका ने 2030 तक चंद्र परमाणु रिएक्टर तैयार करने का लक्ष्य रखा है, जबकि रूस और चीन की साझा परियोजना के लिए 2036 की समयसीमा सामने आई है।


वॉशिंगटन/मॉस्को/बीजिंग | 31 अक्टूबर 2026

By Mohd Haris


चंद्रमा पर अब परमाणु ऊर्जा की नई प्रतिस्पर्धा

चंद्रमा पर इंसान की स्थायी मौजूदगी सुनिश्चित करने की कोशिशों के बीच दुनिया की 3 प्रमुख अंतरिक्ष शक्तियों अमेरिका, रूस और चीन के बीच नई तकनीकी प्रतिस्पर्धा सामने आई है। अब मुकाबला केवल चंद्रमा तक पहुंचने या वहां वैज्ञानिक उपकरण भेजने का नहीं है। असल चुनौती चंद्रमा की सतह पर लंबे समय तक बिजली पैदा करने, वैज्ञानिक केंद्र संचालित करने और वहां मौजूद प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल की है।

31 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट में अमेरिका, रूस और चीन की उन योजनाओं का ज़िक्र किया गया है, जिनके तहत चंद्रमा पर परमाणु विखंडन आधारित रिएक्टर स्थापित करने की तैयारी चल रही है।

इन योजनाओं के पीछे वैज्ञानिक अनुसंधान के साथ रणनीतिक हित भी जुड़े हैं। चंद्रमा पर लंबे समय तक काम करने के लिए लगातार बिजली की ज़रूरत होगी। परमाणु रिएक्टर इस समस्या का एक संभावित समाधान माने जा रहे हैं।


अमेरिका की योजना, 2030 तक रिएक्टर तैयार करने का लक्ष्य

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा चंद्रमा पर परमाणु ऊर्जा के इस्तेमाल की संभावनाओं पर काम कर रही है। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका ने 2030 तक चंद्रमा के लिए परमाणु रिएक्टर तैयार करने का लक्ष्य निर्धारित किया है।

प्रस्तावित व्यवस्था से लगभग 20 किलोवाट बिजली उत्पादन की योजना बताई गई है। इस ऊर्जा का इस्तेमाल वैज्ञानिक उपकरणों, संचार प्रणालियों और भविष्य के चंद्र ठिकानों को संचालित करने के लिए किया जा सकेगा।

चंद्रमा पर किसी रिएक्टर को पहुंचाना और उसे सुरक्षित ढंग से संचालित करना अपने आप में बड़ी तकनीकी चुनौती है। पृथ्वी से प्रक्षेपण, अंतरिक्ष यात्रा, चंद्रमा की सतह पर लैंडिंग और उसके बाद लंबे समय तक संचालन के लिए विशेष सुरक्षा इंतज़ाम आवश्यक होंगे।


रूस और चीन की साझा परियोजना क्यों अहम?

अमेरिका के समानांतर रूस और चीन भी चंद्रमा पर परमाणु ऊर्जा आधारित व्यवस्था विकसित करने की दिशा में काम कर रहे हैं।

रूस और चीन की साझा चंद्र अनुसंधान परियोजना के तहत भविष्य में चंद्रमा पर वैज्ञानिक केंद्र स्थापित करने की योजना है। इसके लिए परमाणु रिएक्टर को ऊर्जा के संभावित स्रोत के रूप में देखा जा रहा है।

रिपोर्ट में रूस की प्रस्तावित सेलेना परियोजना का ज़िक्र किया गया है। इसके तहत लगभग 10 किलोवाट बिजली उत्पादन करने वाला रिएक्टर विकसित करने की योजना सामने आई है।

रूस और चीन की साझा चंद्र परियोजना के लिए लगभग 2036 की समयसीमा बताई गई है। हालांकि दोनों देशों की योजनाओं का वास्तविक परिणाम तकनीकी परीक्षणों, अंतरिक्ष अभियानों की सफलता और सुरक्षित संचालन की क्षमता पर निर्भर करेगा।


चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर क्यों टिकी हैं महाशक्तियों की निगाहें?

चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव अंतरिक्ष अनुसंधान के लिहाज़ से बेहद अहम क्षेत्र बनता जा रहा है। वैज्ञानिक अध्ययनों से संकेत मिले हैं कि यहां मौजूद कुछ गहरे क्रेटरों में पानी की बर्फ सुरक्षित हो सकती है। इन इलाकों में लाखों वर्षों से सूर्य की सीधी रोशनी नहीं पहुंची है। भविष्य में इस बर्फ से पानी निकालकर अंतरिक्ष यात्रियों की ज़रूरतें पूरी की जा सकती हैं। पानी से ऑक्सीजन हासिल करने और उसे रॉकेट ईंधन तैयार करने में इस्तेमाल करने की संभावनाओं पर भी काम हो रहा है।

यदि चंद्रमा पर उपलब्ध संसाधनों का सफलतापूर्वक इस्तेमाल शुरू होता है, तो अंतरिक्ष अभियानों के लिए पृथ्वी से हर ज़रूरी सामग्री पहुंचाने की निर्भरता कम हो सकती है।

लेकिन बर्फ निकालने, उसे पानी में बदलने, शुद्ध करने और उससे उपयोगी पदार्थ तैयार करने के लिए बड़े पैमाने पर ऊर्जा चाहिए। यही वजह है कि परमाणु रिएक्टरों को भविष्य के चंद्र अभियानों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


चांद पर सौर ऊर्जा के बजाय परमाणु बिजली की ज़रूरत क्यों?

चंद्रमा पर सौर ऊर्जा उत्पादन संभव है, लेकिन इसकी अपनी सीमाएं हैं। चंद्रमा के अधिकांश इलाकों में लगभग 14 पृथ्वी दिनों तक लगातार रात रहती है। इस दौरान सौर पैनलों से बिजली उत्पादन प्रभावित होता है।

इसके अलावा दक्षिणी ध्रुव के कुछ क्रेटर स्थायी छाया में रहते हैं, जहां सीधे सूर्य के प्रकाश से ऊर्जा हासिल करना और भी मुश्किल है।

परमाणु विखंडन आधारित रिएक्टर सूर्य की रोशनी के बिना भी बिजली पैदा कर सकते हैं। यही विशेषता उन्हें चंद्रमा पर लंबे समय तक चलने वाले अभियानों के लिए उपयोगी बनाती है।

बांगोर यूनिवर्सिटी के न्यूक्लियर फ्यूचर्स इंस्टीट्यूट के निदेशक साइमन मिडलबर्ग के आकलन के मुताबिक, चंद्रमा पर वैज्ञानिक ठिकानों और बर्फ निकालने की गतिविधियों को पर्याप्त ऊर्जा देने के लिए 3 से 4 रिएक्टरों की आवश्यकता पड़ सकती है।

परमाणु रिएक्टर को चंद्रमा तक पहुंचाना कितनी बड़ी चुनौती?

चंद्रमा पर परमाणु रिएक्टर स्थापित करने की प्रक्रिया कई तकनीकी चरणों से गुज़रेगी। सबसे पहले पृथ्वी पर रिएक्टर तैयार किया जाएगा। इसके बाद उसे अंतरिक्ष यान के ज़रिये चंद्रमा तक पहुंचाना होगा।

रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका और रूस की योजनाओं में रिएक्टर को चंद्रमा तक पहुंचने से पहले बंद रखने की बात कही गई है। इसका उद्देश्य यात्रा और लैंडिंग के दौरान रेडियोधर्मी जोखिम को सीमित रखना है।

लेकिन चंद्रमा की सतह पर सुरक्षित लैंडिंग के बाद रिएक्टर को स्थापित करना, चालू करना और लंबे समय तक बिना नियमित रखरखाव के संचालित करना भी चुनौतीपूर्ण होगा।

नासा ने 13 जनवरी 2026 को अमेरिकी ऊर्जा विभाग के साथ सहयोग बढ़ाने की आधिकारिक घोषणा की थी। दोनों संस्थाओं ने चंद्रमा पर परमाणु विखंडन आधारित बिजली व्यवस्था विकसित करने की प्रतिबद्धता जताई थी।

नासा के मुताबिक, ऐसी व्यवस्था भविष्य के चंद्र अभियानों को सूर्य की रोशनी और तापमान पर निर्भर हुए बिना लगातार बिजली उपलब्ध कराने में मदद करेगी।


अंतरिक्ष में परमाणु रिएक्टर का इस्तेमाल पहले भी हो चुका है

अंतरिक्ष में परमाणु रिएक्टर भेजने का विचार नया नहीं है। शीतयुद्ध के दौर में सोवियत संघ ने पृथ्वी की कक्षा में परमाणु ऊर्जा से संचालित कई उपग्रह भेजे थे।

1960 के दशक के आख़िरी वर्षों से 1980 के दशक तक सोवियत संघ ने 30 से अधिक परमाणु विखंडन रिएक्टर अंतरिक्ष में भेजे। इनका इस्तेमाल मुख्य रूप से निगरानी और रडार प्रणालियों को बिजली देने के लिए किया गया।

अमेरिका ने भी 1965 में अंतरिक्ष में परमाणु रिएक्टर का प्रयोग किया था। शुरुआती परीक्षण सफल रहा, लेकिन लगभग 43 दिनों बाद उपग्रह के एक गैर-परमाणु विद्युत उपकरण में ख़राबी आने से रिएक्टर बंद हो गया।

इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से स्पष्ट है कि परमाणु ऊर्जा का अंतरिक्ष में इस्तेमाल पहले भी किया जा चुका है। हालांकि चंद्रमा की सतह पर वर्षों तक चलने वाला बिजली उत्पादन केंद्र स्थापित करना एक अलग तकनीकी चुनौती है।


परमाणु हादसा हुआ तो क्या होगा?

चंद्रमा पर परमाणु रिएक्टर लगाने की योजनाओं के साथ सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल भी उठ रहे हैं।

वैज्ञानिकों के मुताबिक, रिएक्टर के सक्रिय होने से पहले और उसके लंबे समय तक संचालित होने के बाद रेडियोधर्मी जोखिम की प्रकृति अलग होती है।

यदि कोई सक्रिय परमाणु रिएक्टर दुर्घटनाग्रस्त होता है, तो रेडियोधर्मी सामग्री फैलने का ख़तरा पैदा हो सकता है।

इस संदर्भ में 1978 का एक हादसा महत्वपूर्ण माना जाता है। उस वर्ष सोवियत संघ का कॉसमॉस-954 उपग्रह पृथ्वी पर गिर गया था। उसमें मौजूद परमाणु रिएक्टर से रेडियोधर्मी सामग्री उत्तरी कनाडा के बड़े इलाके में फैल गई थी।

हादसे के बाद प्रभावित क्षेत्र में सफाई अभियान चलाना पड़ा था।

विशेषज्ञों के अनुसार, चंद्रमा पर ऐसी दुर्घटना होने की स्थिति में प्रदूषण का असर स्थानीय क्षेत्र तक सीमित रह सकता है। फिर भी वैज्ञानिक उपकरणों, भविष्य के ठिकानों और आसपास संचालित अभियानों के लिए जोखिम बना रहेगा।

इसलिए अंतरिक्ष में परमाणु ऊर्जा के इस्तेमाल के लिए सुरक्षा मानकों और दुर्घटना प्रबंधन की स्पष्ट व्यवस्था आवश्यक मानी जा रही है।


क्या चंद्रमा पर परमाणु रिएक्टर लगाने वाला देश उस इलाके पर कब्ज़ा कर लेगा?

चंद्रमा पर परमाणु रिएक्टर लगाने की प्रतिस्पर्धा ने अंतरिक्ष कानून से जुड़े सवाल भी खड़े किए हैं।

1967 की आउटर स्पेस ट्रीटी के अनुसार, कोई देश चंद्रमा या किसी अन्य खगोलीय पिंड पर अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता स्थापित नहीं कर सकता।

हालांकि अंतरिक्ष में शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए परमाणु ऊर्जा का इस्तेमाल पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं है।

कानूनी विशेषज्ञों की चिंता यह है कि यदि कोई देश चंद्रमा के ऐसे क्षेत्र में रिएक्टर स्थापित करता है, जहां पानी की बर्फ जैसे महत्वपूर्ण संसाधन मौजूद हैं, तो उसके आसपास सुरक्षा क्षेत्र निर्धारित करने की आवश्यकता पड़ सकती है।

ऐसा क्षेत्र कानूनी तौर पर ज़मीन पर अधिकार नहीं देगा, लेकिन व्यवहार में दूसरे देशों के अभियानों की पहुंच प्रभावित हो सकती है।

लूनर पॉलिसी प्लेटफॉर्म के निदेशक एंटोनिनो सालमेरी ने इस बात की ओर ध्यान दिलाया है कि परमाणु रिएक्टर के आसपास सुरक्षा संबंधी पाबंदियां दूसरे अभियानों के लिए व्यावहारिक बाधा बन सकती हैं।

एक अन्य अहम सवाल यह है कि चंद्रमा पर परमाणु दुर्घटना होने की स्थिति में जवाबदेही किसकी होगी और नुकसान की भरपाई किस नियम के तहत तय की जाएगी।


अंतरिक्ष प्रतिस्पर्धा के पीछे रणनीतिक हित भी

अमेरिका, रूस और चीन की चंद्र परमाणु परियोजनाओं को केवल वैज्ञानिक प्रयोग के तौर पर नहीं देखा जा रहा है।

चंद्रमा पर लंबे समय तक बिजली उपलब्ध कराने की क्षमता भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों में महत्वपूर्ण बढ़त दे सकती है।

जिस देश के पास भरोसेमंद ऊर्जा व्यवस्था होगी, वह वैज्ञानिक अनुसंधान, संसाधनों के इस्तेमाल और लंबे अभियानों के संचालन में बेहतर स्थिति हासिल कर सकता है।

अमेरिका के लिए यह योजना उसके व्यापक चंद्र अन्वेषण कार्यक्रम का हिस्सा है। दूसरी तरफ रूस और चीन अपने साझा चंद्र अनुसंधान केंद्र के लिए बुनियादी ढांचा तैयार करना चाहते हैं।

दिसंबर 2025 में रूस के राष्ट्रीय केंद्र की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक, रूसी अंतरिक्ष एजेंसी रोस्कोस्मोस ने 2036 तक चंद्र बिजली केंद्र विकसित करने का लक्ष्य रखा है। परियोजना में रूस की परमाणु ऊर्जा संस्था रोसाटॉम और कुरचातोव इंस्टीट्यूट की भागीदारी भी बताई गई है।


क्या चंद्रमा पर परमाणु बिजली से मंगल मिशन को भी फायदा होगा?

चंद्रमा पर परमाणु बिजली उत्पादन की तकनीक भविष्य के मंगल अभियानों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकती है।

मंगल ग्रह पर लंबे समय तक वैज्ञानिक उपकरण और मानव आवास संचालित करने के लिए भरोसेमंद ऊर्जा व्यवस्था की आवश्यकता होगी।

चंद्रमा पर विकसित परमाणु रिएक्टरों से वैज्ञानिकों को अंतरिक्ष के कठिन वातावरण में बिजली उत्पादन, ताप प्रबंधन, उपकरणों की सुरक्षा और लंबे समय तक संचालन का अनुभव मिलेगा।

हालांकि चंद्रमा और मंगल की परिस्थितियां अलग हैं। इसलिए चंद्रमा पर सफल तकनीक को मंगल पर इस्तेमाल करने से पहले अतिरिक्त परीक्षण और बदलाव की आवश्यकता होगी।


2030 और 2036 की समयसीमा कितनी महत्वपूर्ण?

अमेरिका का 2030 का लक्ष्य और रूस का 2036 तक चंद्र बिजली केंद्र तैयार करने का प्रस्ताव आने वाले वर्षों में अंतरिक्ष अनुसंधान की दिशा तय करने वाले महत्वपूर्ण पड़ाव बन सकते हैं।

लेकिन परियोजना तैयार होना, उसे अंतरिक्ष में भेजना और चंद्रमा की सतह पर सफलतापूर्वक संचालित करना अलग-अलग चरण हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक, परमाणु तकनीक विकसित करने के अलावा प्रक्षेपण की अनुमति, उपयुक्त रॉकेट, सुरक्षित लैंडिंग और संचालन की व्यवस्था भी बड़ी चुनौतियां हैं।

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Harish Qureshi

Harish Qureshi

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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