यूपी चुनाव 2027 से पहले बीजेपी के कथित ५के फॉर्मूले की चर्चा तेज है। कुर्मी, कायस्थ, कुम्हार, कहार और कोइरी समुदायों पर फोकस को अखिलेश यादव के पीडीए के जवाब के तौर पर देखा जा रहा है।
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
०८ सितंबर २०२६
Wasi Siddiqui
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव २०२७ में अभी समय बाकी है, लेकिन राजनीतिक दलों ने सामाजिक समीकरणों की नई बिसात बिछानी शुरू कर दी है। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव का पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक गठजोड़ बीजेपी के लिए बड़ी राजनीतिक चुनौती माना जा रहा है। इसी पृष्ठभूमि में न्यूज़१८ की एक रिपोर्ट में बीजेपी के कथित “५के” फॉर्मूले की चर्चा की गई है।
इस कथित रणनीति में कुर्मी, कायस्थ, कुम्हार, कहार और कोइरी समुदायों को एक संभावित सामाजिक समूह के तौर पर देखा गया है। हालांकि, उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड में बीजेपी की ओर से इन पाँच समुदायों को एक औपचारिक और घोषित “५के” चुनावी फॉर्मूले के रूप में पेश किए जाने की पुष्टि नहीं होती। इसलिए इसे फिलहाल रिपोर्टेड राजनीतिक रणनीति के तौर पर देखना ज्यादा सटीक होगा।
अखिलेश यादव की राजनीति में पीडीए पिछले कुछ वर्षों में प्रमुख राजनीतिक नैरेटिव बना है। समाजवादी पार्टी ने इसे यादव और मुस्लिम आधार से आगे बढ़कर पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समुदायों के व्यापक गठजोड़ के रूप में पेश किया है।
२०२४ के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने ३७ सीटें जीतकर अपने प्रदर्शन में बड़ा सुधार किया। कांग्रेस ने छह सीटें जीतीं। दूसरी तरफ बीजेपी ३३ सीटों पर सिमट गई। इन नतीजों ने राज्य के पुराने जातीय समीकरणों को लेकर बीजेपी के भीतर नए सिरे से मंथन की जमीन तैयार की।
बीजेपी अब गैर-यादव पिछड़ी जातियों, दलित समूहों, सवर्ण समुदायों और महिलाओं तथा युवाओं के बीच अपने सामाजिक आधार को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। जून २०२६ में बीजेपी की नई प्रदेश टीम में ओबीसी और दलित प्रतिनिधित्व बढ़ाने को भी इसी व्यापक सामाजिक रणनीति से जोड़कर देखा गया।
पाँच समूहों में कुर्मी और कोइरी सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक घटक इसलिए हैं क्योंकि दोनों समुदायों को उत्तर प्रदेश के ओबीसी सामाजिक समीकरण में प्रभावशाली माना जाता है।
लोकनीति-सीएसडीएस के २०२२ उत्तर प्रदेश पोस्ट-पोल सर्वे में कुर्मी समुदाय का नमूना हिस्सा ४.७ प्रतिशत था, जबकि कोइरी, मौर्य, कुशवाहा और सैनी समूह को संयुक्त श्रेणी में ४.१ प्रतिशत दर्ज किया गया। यह सर्वे ७,२११ लोगों और ७० विधानसभा क्षेत्रों के नमूने पर आधारित था। इसे राज्य की वास्तविक जातीय आबादी का आधिकारिक जनगणना आंकड़ा नहीं माना जाना चाहिए।
२०२४ के लोकसभा चुनाव में सीएसडीएस-लोकनीति के पोस्ट-पोल आंकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश के कुर्मी-कोइरी मतदाताओं में ६१ प्रतिशत ने एनडीए और ३४ प्रतिशत ने इंडिया गठबंधन को वोट दिया। २०१९ में एनडीए का समर्थन इसी समूह में करीब ८० प्रतिशत बताया गया था। यानी बीजेपी के लिए यह सामाजिक समूह अभी भी महत्वपूर्ण है, लेकिन २०२४ में इसमें गिरावट भी दर्ज हुई।
यही बदलाव २०२७ की चुनावी रणनीति में कुर्मी और कोइरी मतदाताओं को अहम बनाता है।
कुम्हार और कहार समुदाय संख्या के लिहाज से कुर्मी या कोइरी जितने बड़े राजनीतिक समूह नहीं हैं, लेकिन कई विधानसभा क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर इनका प्रभाव चुनावी मुकाबले को प्रभावित कर सकता है।
लोकनीति-सीएसडीएस के २०२२ पोस्ट-पोल सर्वे में कुम्हार समुदाय का नमूना हिस्सा १.८ प्रतिशत और कहार समुदाय का ०.५ प्रतिशत था। ये आंकड़े सर्वेक्षण के नमूने से जुड़े हैं, इसलिए इन्हें उत्तर प्रदेश की कुल आबादी का प्रतिशत समझना उचित नहीं होगा।
उत्तर प्रदेश सरकार की पिछड़ा वर्ग सूची में कहार, कोइरी और कुम्हार जैसे समुदाय शामिल हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि इन समुदायों का राजनीतिक विमर्श राज्य के ओबीसी सामाजिक ढांचे से जुड़ा हुआ है।
बीजेपी के लिए चुनौती यह होगी कि छोटे और मध्यम आकार के समुदायों को केवल चुनावी गणित के रूप में नहीं, बल्कि स्थानीय नेतृत्व, प्रतिनिधित्व और संगठनात्मक भागीदारी के जरिए जोड़ा जाए।
कायस्थ समुदाय इस कथित ५के समूह में बाकी चार समुदायों से अलग सामाजिक श्रेणी रखता है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में कायस्थ मतदाताओं को लंबे समय से शहरी और शिक्षित मध्यवर्गीय सामाजिक आधार के संदर्भ में देखा जाता रहा है।
२०२२ के लोकनीति-सीएसडीएस सर्वे में कायस्थ और श्रीवास्तव समुदाय का नमूना हिस्सा ०.६ प्रतिशत था। यह भी सर्वे नमूना है, आधिकारिक जनसंख्या आंकड़ा नहीं।
इसलिए कायस्थों को ओबीसी रणनीति के साथ जोड़ने के बजाय बीजेपी के व्यापक सामाजिक गठजोड़ में एक अलग घटक के रूप में समझना अधिक उचित होगा।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरण महत्वपूर्ण हैं, लेकिन अकेले जाति के आधार पर चुनावी नतीजे तय नहीं होते। २०२४ के लोकसभा चुनाव ने इसका एक उदाहरण दिया।
सीएसडीएस-लोकनीति के आंकड़ों के मुताबिक गैर-यादव ओबीसी समूहों में ५९ प्रतिशत मतदाताओं ने एनडीए का समर्थन किया, जबकि ३४ प्रतिशत इंडिया गठबंधन के साथ गए। गैर-जाटव दलितों में तस्वीर उलट रही। इस समूह में ५६ प्रतिशत ने इंडिया गठबंधन का समर्थन किया और २९ प्रतिशत एनडीए के साथ रहे।
इससे संकेत मिलता है कि बीजेपी को २०२७ में गैर-यादव ओबीसी समर्थन को बनाए रखने के साथ दलित और अन्य सामाजिक समूहों में भी अपनी पकड़ मजबूत करनी होगी।
२०२७ की तैयारी केवल सामाजिक समीकरण तक सीमित नहीं है। बीजेपी ने उत्तर प्रदेश संगठन में भी बदलाव किए हैं।
जून २०२६ में पार्टी ने नई प्रदेश टीम घोषित की, जिसमें युवा, महिला, ओबीसी और दलित प्रतिनिधित्व को जगह दी गई। राजनीतिक विश्लेषण में इसे समाजवादी पार्टी के पीडीए नैरेटिव का मुकाबला करने की कोशिश के तौर पर देखा गया।
सितंबर २०२६ में बीजेपी के उत्तर प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े ने भी पीडीए को लेकर समाजवादी पार्टी पर राजनीतिक हमला किया और २०२७ में बीजेपी-नेतृत्व वाले गठबंधन की वापसी का दावा किया।
यानी पार्टी की रणनीति में संगठन, सामाजिक प्रतिनिधित्व और चुनावी संदेश तीनों पहलू साथ दिखाई दे रहे हैं।
समाजवादी पार्टी के लिए चुनौती यह है कि पीडीए को केवल नारे के स्तर से आगे ले जाकर अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच भरोसे और प्रतिनिधित्व में बदला जाए।
अखिलेश यादव ने २०२६ में पीडीए की राजनीतिक व्याख्या को व्यापक करने की कोशिश भी की है। हाल में उन्होंने ब्राह्मण सम्मेलन में पीडीए के “पी” को पंडित और पीड़ित जैसे संदर्भों से जोड़कर नया राजनीतिक संदेश दिया। इससे संकेत मिलता है कि समाजवादी पार्टी भी अपने सामाजिक गठजोड़ का दायरा बढ़ाने की कोशिश कर रही है।
इसलिए २०२७ का मुकाबला केवल बीजेपी बनाम समाजवादी पार्टी नहीं रहेगा। असली लड़ाई उन मतदाताओं को लेकर होगी जो किसी एक पार्टी के स्थायी वोट बैंक के बजाय स्थानीय उम्मीदवार, सरकार के काम, प्रतिनिधित्व और सामाजिक पहचान के आधार पर फैसला करते हैं।
किसी भी जातीय फॉर्मूले की वास्तविक ताकत सीट स्तर पर सामने आती है। उत्तर प्रदेश में एक ही समुदाय अलग-अलग क्षेत्रों में अलग राजनीतिक विकल्प चुन सकता है। पूर्वांचल, अवध, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बुंदेलखंड में सामाजिक संरचना एक जैसी नहीं है।
इसलिए ५के जैसे किसी संभावित समूह को पूरे उत्तर प्रदेश पर एक समान लागू करना राजनीतिक रूप से जोखिम भरा होगा। बीजेपी के लिए जरूरी होगा कि वह विधानसभा क्षेत्रवार सामाजिक समीकरण, स्थानीय नेतृत्व और उम्मीदवार चयन को साथ लेकर चले।
समाजवादी पार्टी के लिए भी यही चुनौती है। पीडीए का समर्थन अगर अलग-अलग समुदायों में स्थायी राजनीतिक गठजोड़ में बदलता है, तो बीजेपी के लिए मुकाबला कठिन होगा। अगर इसमें सामाजिक या क्षेत्रीय स्तर पर बिखराव आता है, तो बीजेपी के लिए गैर-यादव ओबीसी और अन्य सामाजिक समूहों को फिर से संगठित करना आसान हो सकता है।
उत्तर प्रदेश में २०२७ का चुनाव अभी दूर है, लेकिन राजनीतिक गतिविधियां तेज हो चुकी हैं। बीजेपी के कथित ५के फॉर्मूले की चर्चा इसी व्यापक सामाजिक पुनर्संयोजन का हिस्सा है।
फिलहाल इसे बीजेपी की आधिकारिक घोषित चुनावी नीति मानना जल्दबाजी होगी। उपलब्ध सर्वेक्षण केवल अलग-अलग समुदायों के मतदान रुझान दिखाते हैं। वे यह साबित नहीं करते कि कुर्मी, कायस्थ, कुम्हार, कहार और कोइरी एक साझा राजनीतिक वोट बैंक के रूप में मतदान करेंगे।
आखिरकार २०२७ का फैसला जातीय समीकरण, उम्मीदवार चयन, स्थानीय मुद्दे, सरकार के कामकाज, बेरोजगारी, कानून-व्यवस्था, किसान और कल्याणकारी योजनाओं समेत कई कारकों के संयुक्त असर से तय होगा।
उत्तर प्रदेश की सियासत में फिलहाल तस्वीर साफ है। समाजवादी पार्टी पीडीए के जरिए अपना सामाजिक आधार मजबूत करना चाहती है, जबकि बीजेपी गैर-यादव ओबीसी और दूसरे सामाजिक समूहों के बीच अपनी पकड़ कायम रखने और २०२४ के नुकसान की भरपाई करने की कोशिश में है। ५के की चर्चा इसी बड़ी चुनावी जंग का एक हिस्सा है, लेकिन इसकी असली परीक्षा २०२७ में विधानसभा सीटों पर होगी।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।