7 राज्यों में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले जेन-ज़ी वोटर अहम सियासी ताकत बन रहे हैं। मोदी और राहुल गांधी की युवा पहुंच के पीछे रोजगार, शिक्षा और चुनावी गणित बड़ा कारण है।
📍 नई दिल्ली
🗓️ 09 सितंबर 2026
✍️ Wasi Siddiqui
2027 के विधानसभा चुनावों की तैयारी के साथ भारतीय सियासत में युवा मतदाताओं की अहमियत तेजी से बढ़ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी, दोनों अलग-अलग राजनीतिक अभियानों के जरिए युवाओं और छात्रों तक पहुंच बनाने में जुटे हैं। इसके पीछे केवल राजनीतिक संवाद नहीं, बल्कि आने वाले चुनावों का बड़ा जनसांख्यिकीय और चुनावी गणित भी मौजूद है।
उत्तर प्रदेश, गुजरात, पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर और गोवा में 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं। उपलब्ध चुनावी आंकड़ों के विश्लेषण के मुताबिक इन 7 राज्यों में 18 से 29 वर्ष के मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 22 प्रतिशत बैठती है। यानी औसतन हर 5 मतदाताओं में करीब 1 युवा इस आयु वर्ग से जुड़ा है।
जेन-ज़ी की चुनावी अहमियत समझने के लिए केवल उनकी संख्या देखना पर्याप्त नहीं है। असली सवाल यह है कि इन मतदाताओं की मौजूदगी किन विधानसभा सीटों पर चुनावी मुकाबले को प्रभावित कर सकती है।
पिछले विधानसभा चुनावों के आंकड़ों के मुताबिक इन 7 राज्यों की कुल 940 विधानसभा सीटों में 257 सीटों पर जीत का अंतर 5 प्रतिशत या उससे कम रहा था। ऐसे मुकाबलों में मतदाताओं के छोटे समूह के रुख में बदलाव भी परिणाम पर असर डाल सकता है।
उत्तर प्रदेश में पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले युवा मतदाताओं का महत्व इसलिए भी बड़ा है क्योंकि राज्य में कुल विधानसभा सीटों की संख्या 403 है। 2026 में विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची में उत्तर प्रदेश में करीब 13.39 करोड़ मतदाता दर्ज हैं। चुनाव आयोग के अनुसार 18 से 19 वर्ष आयु वर्ग के करीब 17.63 लाख मतदाता सूची में शामिल हैं।
यह आंकड़ा पूरी जेन-ज़ी आबादी नहीं है। 18 से 29 वर्ष की श्रेणी इससे कहीं बड़ी है। इसी वजह से राजनीतिक दलों के लिए युवा मतदाता एक अलग चुनावी प्राथमिकता बन चुके हैं।
मीडिया रिपोर्टों में 18 से 29 वर्ष के मतदाताओं को करीब 4 करोड़ के आसपास बताया गया है। अलग-अलग स्रोतों में परिभाषा और मतदाता सूची के आधार पर आंकड़ों में अंतर दिखाई देता है। इसलिए इसे एक निश्चित संख्या के बजाय व्यापक युवा मतदाता आधार के रूप में देखना अधिक उचित है।
उत्तर प्रदेश में भाजपा, समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी, सभी युवा मतदाताओं के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। रोजगार, भर्ती परीक्षाएं, शिक्षा, कौशल, स्टार्टअप और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे इस संवाद का हिस्सा बन रहे हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल के महीनों में युवाओं से सीधे संवाद पर जोर बढ़ाया है। 8 सितंबर को गुजरात के वडोदरा में जेन-ज़ी युवाओं के साथ उनका कार्यक्रम भी इसी रणनीति का हिस्सा रहा। कार्यक्रम में छात्रों, स्टार्टअप संस्थापकों और युवा शोधकर्ताओं की भागीदारी हुई।
मोदी का संदेश रोजगार और शिक्षा तक सीमित नहीं है। तकनीक, नवाचार, स्टार्टअप, डिजिटल अर्थव्यवस्था और विकसित भारत जैसे मुद्दों के जरिए सरकार युवा मतदाताओं के भविष्य संबंधी सवालों से जुड़ने की कोशिश कर रही है।
रॉयटर्स की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक 2026 के युवा आंदोलनों के बाद भाजपा ने डिजिटल माध्यमों पर भी युवा संपर्क बढ़ाया है। प्रधानमंत्री की सोशल मीडिया रणनीति में अधिक अनौपचारिक और युवा-केंद्रित सामग्री पर जोर दिखाई दिया है।
हालांकि राजनीतिक संचार और वास्तविक चुनावी समर्थन एक ही चीज नहीं हैं। युवा वर्ग को साधने के लिए संदेश देने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि पूरा जेन-ज़ी वोट किसी एक दल के पक्ष में चला जाएगा।
राहुल गांधी ने भी युवाओं और छात्रों के बीच सीधा संवाद बढ़ाया है। कांग्रेस का “छात्रों की गूंज” अभियान इसी रणनीति का प्रमुख हिस्सा है।
रिपोर्टों के अनुसार इस अभियान के पहले चरण में देश के अलग-अलग राज्यों में कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। कांग्रेस की योजना छात्रों और जेन-ज़ी तक पहुंच बढ़ाने की है। राहुल गांधी ने कोटा, प्रयागराज, देहरादून और पुणे जैसे शहरों में युवाओं से संवाद किया है।
प्रयागराज के कार्यक्रम में राहुल गांधी ने रोजगार, महंगी शिक्षा और भर्ती परीक्षाओं से जुड़े सवाल उठाए। उन्होंने युवाओं को देश की बड़ी ताकत बताते हुए शिक्षा और रोजगार से जुड़े संकट को राजनीतिक बहस का मुद्दा बनाया। भाजपा ने इस पर राजनीतिक जवाब भी दिया।
राहुल गांधी ने डिजिटल माध्यम पर भी अपना तरीका बदला है। अगस्त में उन्होंने इंस्टाग्राम पर युवाओं के लिए सीधे सवाल-जवाब का कार्यक्रम शुरू किया, जिसमें छात्रों और जेन-ज़ी से सीधे संवाद की कोशिश की गई।
युवा मतदाताओं की प्राथमिकताओं को केवल चुनावी प्रचार से समझना अधूरा होगा। रोजगार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, भर्ती परीक्षाओं की विश्वसनीयता और भविष्य की आर्थिक सुरक्षा उनके लिए अहम सवाल हैं।
हालिया युवा आंदोलनों ने भी इन मुद्दों को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में रखा है। ऐसे आंदोलनों ने राजनीतिक दलों को यह संकेत दिया है कि युवा मतदाता केवल चुनाव के समय किए गए राजनीतिक वादों से संतुष्ट नहीं हैं।
यही वजह है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों अपने-अपने नैरेटिव में रोजगार, शिक्षा और अवसर को प्रमुखता दे रहे हैं। फर्क उनके राजनीतिक दृष्टिकोण और समाधान पेश करने के तरीके में दिखाई देता है।
गुजरात में भी युवा मतदाताओं का अनुपात चुनावी रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण है। हालिया मीडिया विश्लेषणों में राज्य में जेन-ज़ी मतदाताओं की हिस्सेदारी लगभग एक चौथाई के आसपास बताई गई है।
पंजाब में भी युवा मतदाता बड़ा राजनीतिक वर्ग हैं। राज्य में 2027 में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं और आम आदमी पार्टी की सरकार ने भी सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के जरिए युवा संपर्क बढ़ाने की कोशिश की है।
इससे एक बात स्पष्ट होती है। जेन-ज़ी को लेकर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा केवल भाजपा और कांग्रेस तक सीमित नहीं है। क्षेत्रीय दल भी इस वर्ग को अपने राजनीतिक संदेश से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।
इस सवाल का जवाब फिलहाल नहीं है।
उपलब्ध विश्लेषणों में यह भी सामने आया है कि जेन-ज़ी को किसी एक राजनीतिक दल का स्थायी वोट बैंक मानना जोखिम भरा होगा। युवा मतदाताओं का रुख मुद्दों, उम्मीदवार, स्थानीय परिस्थितियों और राजनीतिक माहौल के अनुसार बदल सकता है।
इसलिए राजनीतिक दलों के सामने केवल युवाओं तक पहुंच बनाने की चुनौती नहीं है। उन्हें यह साबित करना होगा कि रोजगार, शिक्षा, परीक्षा व्यवस्था और आर्थिक अवसर जैसे मुद्दों पर उनकी नीतियां जमीन पर असर डाल रही हैं।
7 राज्यों में 2027 के विधानसभा चुनाव होंगे। इन राज्यों में 18 से 29 वर्ष के मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 22 प्रतिशत बताई गई है। पिछले विधानसभा चुनावों में 257 सीटों पर जीत का अंतर 5 प्रतिशत या उससे कम था।
उत्तर प्रदेश में 131 विधानसभा सीटों पर पिछली बार जीत का अंतर 5 प्रतिशत से कम था। गुजरात में ऐसी सीटों की संख्या 27 और पंजाब में 24 रही। उत्तराखंड में 15 सीटों पर मुकाबला इस श्रेणी में आया।
इन आंकड़ों का मतलब यह नहीं है कि युवा मतदाता अकेले चुनाव का परिणाम तय करेंगे। लेकिन करीबी मुकाबलों में उनकी भागीदारी और मतदान का रुझान राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।
जेन-ज़ी को लेकर राजनीतिक दलों की रणनीति तेज है, लेकिन चुनावी असर का अंतिम आकलन मतदान और परिणाम के बाद ही संभव होगा।
युवा मतदाताओं की संख्या बड़ी है। मगर संख्या अपने आप में वोट नहीं बनती। मतदान प्रतिशत, उम्मीदवारों की स्वीकार्यता, स्थानीय मुद्दे, राजनीतिक गठबंधन और युवाओं की वास्तविक प्राथमिकताएं भी परिणाम को प्रभावित करेंगी।
इसलिए मोदी और राहुल गांधी का युवा संवाद एक व्यापक राजनीतिक बदलाव का संकेत जरूर है, लेकिन इसे किसी एक दल के पक्ष में जेन-ज़ी की निश्चित लामबंदी मानना जल्दबाजी होगी।
2027 के विधानसभा चुनावों में सबसे अहम सवाल यही रहेगा कि राजनीतिक दल युवाओं से किए गए संवाद को वास्तविक नीतिगत भरोसे में कितनी हद तक बदल पाते हैं। आंकड़े जेन-ज़ी की ताकत दिखाते हैं, लेकिन अंतिम फैसला युवा मतदाता अपने वोट से करेंगे।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।