राहुल गांधी को बॉम्बे हाई कोर्ट से झटका, पीएम मोदी पर टिप्पणी वाले मानहानि केस में समन बरकरार
Mohammad Naved
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2026-09-08 12:33:02
बॉम्बे हाई कोर्ट ने राहुल गांधी को राहत देने से इनकार किया। अदालत ने पीएम मोदी पर कथित टिप्पणी से जुड़े मानहानि मामले में 2019 में जारी मजिस्ट्रेट के समन को बरकरार रखा।
Location मुंबई, महाराष्ट्र
Date 08 September 2026
By Mohd Naved
बॉम्बे हाई कोर्ट ने कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित आपत्तिजनक टिप्पणी से जुड़े मानहानि मामले में तत्काल राहत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने मजिस्ट्रेट अदालत की ओर से जारी समन को रद्द करने की राहुल गांधी की मांग खारिज कर दी। यह मामला 2018 में राजस्थान में दिए गए एक राजनीतिक भाषण से जुड़ा है।
अदालत के इस फैसले के बाद राहुल गांधी के खिलाफ चल रही आपराधिक मानहानि कार्यवाही को आगे बढ़ने का रास्ता साफ हो गया है। हालांकि, इस आदेश का अर्थ यह नहीं है कि राहुल गांधी को मानहानि के आरोप में दोषी ठहराया गया है। मामला अभी आरोपों और न्यायिक प्रक्रिया के स्तर पर है।
क्या है पूरा मामला
मामला सितंबर 2018 में राजस्थान में राहुल गांधी की एक चुनावी रैली से जुड़ा है। शिकायतकर्ता महेश श्रीश्रीमाल ने आरोप लगाया था कि राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ मानहानिकारक टिप्पणी की थी।
शिकायत के मुताबिक राहुल गांधी ने अपने राजनीतिक भाषण में प्रधानमंत्री मोदी को ऐसे शब्दों से संबोधित किया जिन्हें शिकायतकर्ता ने अपमानजनक और मानहानिकारक बताया। इसी टिप्पणी को आधार बनाकर गिरगांव मजिस्ट्रेट अदालत में आपराधिक मानहानि की शिकायत दाखिल की गई थी।
शिकायतकर्ता भारतीय जनता पार्टी से जुड़े कार्यकर्ता हैं। उनका दावा था कि टिप्पणी का असर पार्टी के सदस्यों और समर्थकों की प्रतिष्ठा पर भी पड़ा। इसी आधार पर उन्होंने अपने लिए शिकायत दर्ज कराने का कानूनी अधिकार होने की दलील दी।
मजिस्ट्रेट अदालत ने जारी किया था समन
इस मामले में मजिस्ट्रेट अदालत ने अगस्त 2019 में राहुल गांधी के खिलाफ समन जारी किया था। बाद में जुलाई 2021 में समन की जानकारी मिलने के बाद राहुल गांधी ने बॉम्बे हाई कोर्ट का रुख किया और निचली अदालत की कार्यवाही को चुनौती दी।
राहुल गांधी की तरफ से अदालत में यह दलील रखी गई कि शिकायत कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है। उनका तर्क था कि उन्होंने किसी स्पष्ट और पहचान योग्य वर्ग को निशाना नहीं बनाया था। उनके मुताबिक टिप्पणी प्रधानमंत्री के राजनीतिक पद और व्यक्ति से जुड़ी थी, इसलिए शिकायतकर्ता के पास मानहानि की कार्यवाही शुरू करने का पर्याप्त कानूनी आधार नहीं था।
राहुल गांधी की मुख्य दलील क्या थी
राहुल गांधी की ओर से अदालत में यह सवाल उठाया गया कि यदि टिप्पणी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ थी, तो किसी व्यक्तिगत पार्टी कार्यकर्ता को शिकायतकर्ता के तौर पर मानहानि की कार्यवाही शुरू करने का अधिकार किस आधार पर मिला।
उनकी दलील का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह था कि किसी राजनीतिक पार्टी को अपने आप में ऐसी निश्चित और पहचान योग्य श्रेणी नहीं माना जा सकता, जिसके प्रत्येक सदस्य को कथित टिप्पणी से व्यक्तिगत मानहानि का अधिकार मिल जाए।
राहुल गांधी की ओर से यह भी कहा गया कि निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के खिलाफ राजनीतिक गतिविधियों के दौरान कई मुकदमे दर्ज होते हैं और अदालत को शुरुआती चरण में ऐसी कार्यवाहियों की कानूनी वैधता पर सावधानी से विचार करना चाहिए।
महाराष्ट्र सरकार का पक्ष
महाराष्ट्र सरकार की ओर से एडवोकेट जनरल मिलिंद साठे ने राहुल गांधी की याचिका का विरोध किया। उनका तर्क था कि शुरुआती स्तर पर शिकायत में प्रथम दृष्टया अपराध के तत्व मौजूद दिखाई देते हैं। ऐसे में हाई कोर्ट को अपनी असाधारण अधिकारिता का इस्तेमाल कर कार्यवाही को खत्म करने में सावधानी बरतनी चाहिए।
सरकार की ओर से यह भी दलील दी गई कि मजिस्ट्रेट ने शिकायत और उपलब्ध प्रारंभिक सामग्री पर विचार करने के बाद समन जारी किया था। इसलिए केवल इस आधार पर कि आरोपी नेता राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं, न्यायिक प्रक्रिया को शुरुआती स्तर पर समाप्त नहीं किया जाना चाहिए।
अदालत ने क्या कहा
बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस नितिन बोरकर ने राहुल गांधी की दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत के सामने यह सवाल भी था कि शिकायतकर्ता के पास इस मामले में कानूनी हैसियत है या नहीं।
अदालत ने प्रथम दृष्टया इस तर्क को स्वीकार किया कि भारतीय जनता पार्टी एक पंजीकृत राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी है और शिकायतकर्ता लंबे समय से पार्टी से जुड़े होने का दावा करते हैं। इसलिए शुरुआती स्तर पर यह कहना उचित नहीं होगा कि टिप्पणी केवल पार्टी के शीर्ष नेतृत्व तक सीमित थी।
अदालत की टिप्पणी का महत्व इसलिए है क्योंकि इससे यह संकेत मिलता है कि मामले की सुनवाई के इस चरण में अदालत ने शिकायत को पूरी तरह निराधार मानकर कार्यवाही खत्म करने से इनकार किया है।
मानहानि कानून का सवाल
इस मामले में आपराधिक मानहानि से जुड़े पुराने भारतीय दंड संहिता के प्रावधान भी महत्वपूर्ण हैं। शिकायत उस समय की है जब भारतीय दंड संहिता लागू थी। मानहानि से जुड़े प्रावधानों में किसी व्यक्ति या पहचान योग्य समूह की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाली कथित अभिव्यक्ति पर आपराधिक कार्यवाही का प्रावधान था।
मामले में यह कानूनी सवाल भी उठा कि किसी राजनीतिक पार्टी के सदस्य को पार्टी या उसके सदस्यों से जुड़ी कथित मानहानिकारक टिप्पणी पर शिकायत दर्ज कराने का अधिकार किस परिस्थिति में प्राप्त होता है।
यही सवाल राहुल गांधी की याचिका का एक प्रमुख आधार बना। दूसरी ओर, शिकायतकर्ता और सरकार की ओर से यह कहा गया कि मामले के तथ्य और प्रारंभिक साक्ष्य अदालत को कार्यवाही जारी रखने का आधार देते हैं।
मामला 2018 की राजनीतिक बयानबाजी से जुड़ा
यह विवाद ऐसे समय का है जब राफेल लड़ाकू विमान सौदा भारतीय राजनीति में बड़ा मुद्दा बना हुआ था। राहुल गांधी ने उस दौर में केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर लगातार राजनीतिक हमले किए थे।
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि राजस्थान की रैली में की गई टिप्पणी केवल प्रधानमंत्री पर राजनीतिक आलोचना तक सीमित नहीं थी, बल्कि उससे भाजपा के कार्यकर्ताओं और समर्थकों की प्रतिष्ठा प्रभावित हुई।
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि शिकायत में लगाए गए आरोप और अदालत में किसी आरोप का प्रथम दृष्टया संज्ञान, अंतिम दोषसिद्धि के बराबर नहीं होता।
पहले भी हाई कोर्ट में चली लंबी कानूनी प्रक्रिया
इस मामले में राहुल गांधी की याचिका पर सुनवाई लंबे समय से चलती रही है। पहले भी बॉम्बे हाई कोर्ट ने कार्यवाही से जुड़े अंतरिम आदेश दिए थे और मामले की सुनवाई अलग-अलग चरणों में आगे बढ़ी।
फरवरी 2026 में हाई कोर्ट ने मामले में सुनवाई पूरी करने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रखा था। उस समय अदालत के सामने राहुल गांधी की ओर से समन और आपराधिक मानहानि की कार्यवाही को खत्म करने की मांग थी।
अब 8 सितंबर 2026 को अदालत ने याचिका पर फैसला सुनाते हुए समन को रद्द करने से इनकार कर दिया है। इससे मामले की न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है।
राजनीतिक असर क्या होगा
फैसले का सीधा राजनीतिक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि आगे की न्यायिक कार्यवाही किस दिशा में जाती है। राहुल गांधी विपक्ष के प्रमुख नेता हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ उनकी राजनीतिक आलोचना राष्ट्रीय राजनीति में लगातार चर्चा का विषय रहती है।
कांग्रेस इस मामले को राजनीतिक बयानबाजी और विपक्षी नेताओं के खिलाफ कानूनी कार्रवाई के व्यापक संदर्भ में देख सकती है। दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी और शिकायतकर्ता पक्ष अदालत के आदेश को अपनी कानूनी स्थिति की पुष्टि के रूप में पेश कर सकते हैं।
लेकिन पत्रकारिता के लिहाज से दोनों पक्षों की राजनीतिक व्याख्याओं और अदालत के वास्तविक आदेश के बीच फर्क रखना जरूरी है। अदालत ने फिलहाल केवल समन को रद्द करने से इनकार किया है। उसने राहुल गांधी को इस मामले में दोषी घोषित नहीं किया है।
आगे क्या होगा
अब मामला संबंधित निचली अदालत की न्यायिक प्रक्रिया में आगे बढ़ सकता है। वहां शिकायत, साक्ष्य और दोनों पक्षों की दलीलों पर कानून के मुताबिक सुनवाई होगी।
आगे की कार्यवाही में यह तय होना बाकी है कि शिकायत में लगाए गए आरोप अंतिम रूप से किस स्तर तक साबित होते हैं। राहुल गांधी के पास उपलब्ध कानूनी विकल्पों के तहत आगे चुनौती देने की संभावना भी मामले की अगली प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।
निष्कर्ष
बॉम्बे हाई कोर्ट का 8 सितंबर का फैसला राहुल गांधी के लिए तत्काल कानूनी राहत वाला आदेश नहीं है। अदालत ने 2019 में जारी समन को रद्द करने से इनकार किया है और मानहानि मामले को शुरुआती स्तर पर खत्म करने की मांग स्वीकार नहीं की।
मामले का अगला महत्वपूर्ण चरण निचली अदालत की कार्यवाही होगी। वहां आरोपों और साक्ष्यों की न्यायिक जांच होगी। इसलिए मौजूदा स्थिति को राहुल गांधी की दोषसिद्धि के रूप में पेश करना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा। फिलहाल अदालत का फैसला केवल यह बताता है कि मानहानि की शिकायत को इस चरण पर समाप्त करने का आधार पर्याप्त नहीं माना गया।
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Mohammad Naved
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक,
अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।