हरियाली तीज क्यों मनाई जाती है? जानिए पूरी कहानी
हरियाली तीज का क्या है धार्मिक महत्व? जानिए इतिहास
शिव-पार्वती से कैसे जुड़ी है हरियाली तीज की परंपरा?
हरियाली तीज सावन शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाने वाला प्रमुख मानसूनी पर्व है। इसकी धार्मिक मान्यता शिव और पार्वती के मिलन से जुड़ी है। महिलाएं पूजा, व्रत, मेहंदी, झूले और लोकगीतों के जरिए पर्व मनाती हैं। 2026 में हरियाली तीज 15 अगस्त को मनाई जाएगी, जबकि क्षेत्रीय परंपराओं में कुछ अंतर मिलता है।
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भारत | 13 अगस्त 2026 | ✍️ नीलम सैनी
हरियाली तीज क्यों मनाई जाती है?
सावन का महीना आते ही उत्तर भारत के कई हिस्सों में हरियाली तीज की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। यह पर्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि मानसून, प्रकृति की हरियाली, लोक संस्कृति और महिलाओं की सामाजिक भागीदारी से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल के मुताबिक हरियाली तीज को श्रावणी तीज भी कहा जाता है और यह सावन महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है। साल 2026 में भारत सरकार के आधिकारिक पर्यटन पोर्टल ‘इनक्रेडिबल इंडिया’ के अनुसार तीज उत्सव 15 अगस्त को मनाया जाएगा। हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों में तीज की स्थानीय परंपराओं और आयोजन के तौर-तरीकों में अंतर देखा जाता है।
शिव-पार्वती के मिलन से जुड़ी है धार्मिक मान्यता
हरियाली तीज की सबसे प्रमुख धार्मिक मान्यता भगवान शिव और माता पार्वती के मिलन से जुड़ी है। प्रचलित मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की और उनकी भक्ति के बाद दोनों का मिलन हुआ। इसी वजह से तीज को दांपत्य जीवन, समर्पण और वैवाहिक सुख से जोड़कर देखा जाता है। भारत सरकार के पर्यटन स्रोत भी तीज को शिव-पार्वती के मिलन और पार्वती की तपस्या की परंपरा से जोड़ते हैं। यहां यह समझना जरूरी है कि शिव-पार्वती से जुड़ी कथा धार्मिक और पौराणिक परंपरा का हिस्सा है। इसे ऐतिहासिक घटना के रूप में पेश करने के बजाय भारतीय धार्मिक संस्कृति में प्रचलित मान्यता के रूप में देखना अधिक उपयुक्त है।
हरियाली तीज नाम क्यों पड़ा?
हरियाली तीज का नाम ही इसके मौसम और प्रकृति से संबंध को दर्शाता है। सावन के दौरान बारिश के बाद पेड़-पौधों और खेतों में हरियाली दिखाई देने लगती है। इसी प्राकृतिक बदलाव के बीच मनाया जाने वाला यह पर्व मानसून के आगमन और प्रकृति के नवजीवन का सांस्कृतिक उत्सव भी बन गया है। हरियाणा के ऐतिहासिक जिला गजेटियर में भी तीज को सावन शुक्ल तृतीया से जुड़ा पर्व बताया गया है और इसे शुष्क मौसम के बाद बारिश तथा हरियाली के आगमन से जोड़ा गया है। गजेटियर में यह भी दर्ज है कि ग्रामीण इलाकों में महिलाएं और लड़कियां पेड़ों की छांव में एकत्र होकर झूले झूलती और लोकगीत गाती थीं।
महिलाएं हरियाली तीज पर व्रत क्यों रखती हैं?
हरियाली तीज मुख्य रूप से महिलाओं का पर्व माना जाता है। कई क्षेत्रों में विवाहित महिलाएं अपने पति के स्वास्थ्य और दीर्घायु तथा परिवार के सुख-समृद्धि की कामना से व्रत रखती हैं। अविवाहित महिलाएं भी अच्छे वैवाहिक जीवन की कामना के साथ इस पर्व में हिस्सा लेती हैं। हालांकि व्रत रखने की विधि हर परिवार और क्षेत्र में एक जैसी नहीं है। कहीं निर्जला व्रत की परंपरा मिलती है तो कहीं महिलाएं फलाहार या अन्य स्थानीय नियमों के अनुसार उपवास करती हैं। इसलिए किसी एक तरीके को पूरे देश की अनिवार्य परंपरा बताना सही नहीं होगा।
हरे रंग का क्या है महत्व?
हरियाली तीज के साथ हरे रंग का विशेष सांस्कृतिक जुड़ाव दिखाई देता है। महिलाएं हरी चूड़ियां, हरे वस्त्र और मेहंदी को पर्व की सजावट का हिस्सा बनाती हैं। भारत सरकार के पर्यटन स्रोतों में भी तीज के दौरान हरे और लाल रंग के परिधानों तथा चूड़ियों की परंपरा का उल्लेख मिलता है। हरे रंग को मानसून, हरियाली, उर्वरता और प्रकृति के नवजीवन से जोड़कर देखा जाता है। इस वजह से तीज की दृश्य संस्कृति में हरे रंग की मौजूदगी केवल श्रृंगार नहीं, बल्कि मौसम और प्रकृति के साथ सांस्कृतिक जुड़ाव का प्रतीक भी बन गई है।
झूला झूलने की परंपरा कहां से आई?
हरियाली तीज का जिक्र झूलों के बिना अधूरा माना जाता है। सावन के दौरान पेड़ों पर झूले लगाए जाते हैं और महिलाएं समूह में झूला झूलते हुए लोकगीत गाती हैं। यह परंपरा विशेष रूप से उत्तर भारत के ग्रामीण और अर्धशहरी समाज में सामाजिक मेल-मिलाप का माध्यम रही है। झूले से जुड़ी परंपरा का एक सामाजिक पक्ष भी है। विवाहित बेटियों का मायके आना, सहेलियों और परिवार की महिलाओं के साथ समय बिताना तथा लोकगीतों के जरिए अपनी भावनाओं को व्यक्त करना तीज की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा रहा है।
मेहंदी और श्रृंगार का क्या महत्व है?
हरियाली तीज पर मेहंदी लगाने की परंपरा भी काफी लोकप्रिय है। हाथों पर मेहंदी, चूड़ियां, पारंपरिक परिधान और आभूषण पर्व की सांस्कृतिक पहचान बन चुके हैं। भारत सरकार के पर्यटन पोर्टल पर भी तीज के अवसर पर मेहंदी, पारंपरिक कपड़ों, चूड़ियों और लोकगीतों की परंपरा का उल्लेख है। यह श्रृंगार केवल व्यक्तिगत सजावट नहीं है। कई समुदायों में यह विवाहित महिलाओं के उत्सव, सामूहिक सहभागिता और पारिवारिक रिश्तों को मजबूत करने की सामाजिक परंपरा से जुड़ा हुआ है।
सिंधारा की परंपरा क्यों खास है?
हरियाली तीज से जुड़ी एक महत्वपूर्ण सामाजिक परंपरा सिंधारा है। कई उत्तर भारतीय समुदायों में विवाहित बेटियों को मायके से कपड़े, श्रृंगार सामग्री, मेहंदी, मिठाइयां और अन्य उपहार भेजे जाते हैं। दिल्ली स्थित भारत सरकार के पर्यटन स्रोत में भी तीज से पहले नवविवाहित महिलाओं को मायके बुलाने और ससुराल पक्ष की ओर से कपड़े, आभूषण, श्रृंगार सामग्री, मेहंदी और मिठाइयां देने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। क्षेत्र के अनुसार इसे सिंधारा, सिंजारा या अन्य स्थानीय नामों से जाना जा सकता है। इसके पीछे मूल भावना बेटी और मायके के रिश्ते को बनाए रखने तथा त्योहार के बहाने पारिवारिक मेल-मिलाप को बढ़ावा देने की रही है।
तीज और लोकगीतों का रिश्ता
हरियाली तीज धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ लोक संस्कृति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। महिलाएं समूह में पारंपरिक गीत गाती हैं, जिनमें सावन, प्रेम, मायका, दांपत्य जीवन और सामाजिक रिश्तों से जुड़े भाव मिलते हैं। हरियाणा के जिला गजेटियर में तीज के अवसर पर महिलाओं और लड़कियों के समूह में लोकगीत गाने की परंपरा दर्ज है। यही वजह है कि तीज को केवल एक धार्मिक पर्व के रूप में देखना इसके व्यापक सांस्कृतिक पक्ष को सीमित कर देता है। लोकगीतों और सामूहिक आयोजनों ने इसे पीढ़ियों के बीच सांस्कृतिक परंपराओं को आगे बढ़ाने का माध्यम भी बनाया है।
हरियाली तीज और मानसून का संबंध
भारत के उत्तरी और पश्चिमी हिस्सों में तीज के आयोजन का समय मानसून से जुड़ा हुआ है। बारिश के बाद सूखी धरती पर हरियाली लौटती है और खेती-किसानी वाले समाज में यह मौसम महत्वपूर्ण बदलाव लेकर आता है। पर्यटन मंत्रालय के अनुसार तीज के विभिन्न रूप मानसून, हरियाली और प्रकृति की समृद्धि से जुड़े हुए हैं। इस दृष्टि से हरियाली तीज का एक सामाजिक-पर्यावरणीय पहलू भी सामने आता है। हालांकि इसे आधुनिक अर्थों में पर्यावरण संरक्षण अभियान कहना उचित नहीं होगा, लेकिन पर्व की सांस्कृतिक पहचान में पेड़, झूले, बारिश और हरियाली की मौजूदगी स्पष्ट है।
हरियाली तीज और दूसरी तीज में क्या अंतर है?
भारत में तीज एक ही पर्व का नाम नहीं है। हरियाली तीज सावन शुक्ल पक्ष की तृतीया से जुड़ी है, जबकि कजरी तीज और हरतालिका तीज अलग समय और अलग क्षेत्रीय परंपराओं में मनाई जाती हैं। भारतीय खाद्य विरासत से जुड़े एक सरकारी सम्मेलन दस्तावेज में भी हरियाली, कजरी और हरतालिका तीज को अलग-अलग रूपों में दर्ज किया गया है। इसलिए हरियाली तीज को हरतालिका तीज के साथ एक ही पर्व समझना सही नहीं है। दोनों में शिव-पार्वती की धार्मिक मान्यताओं का संबंध जरूर मिलता है, लेकिन तिथि, कथा और स्थानीय अनुष्ठानों में अंतर है।
राजस्थान से हरियाणा तक अलग-अलग रंग
हरियाली तीज का उत्सव राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और अन्य क्षेत्रों में अलग-अलग सांस्कृतिक रूपों में दिखाई देता है। राजस्थान में जयपुर और उदयपुर जैसे शहरों में तीज से जुड़े सार्वजनिक आयोजन, सांस्कृतिक कार्यक्रम और पारंपरिक जुलूसों की परंपरा रही है। हरियाणा में तीज का ग्रामीण और लोक-सांस्कृतिक पक्ष विशेष रूप से दिखाई देता है। झूले, समूह में गीत, पारंपरिक परिधान और नवविवाहित महिलाओं की भागीदारी इस पर्व को सामाजिक पहचान देते हैं। ऐतिहासिक हरियाणा गजेटियर भी तीज के स्थानीय महत्व और सामूहिक आयोजनों का उल्लेख करता है।
आज के दौर में हरियाली तीज का बदलता स्वरूप
समय के साथ हरियाली तीज के उत्सव का स्वरूप भी बदला है। पहले जहां गांवों और घरों में पेड़ों पर झूले और सामूहिक लोकगीत प्रमुख हुआ करते थे, वहीं अब शहरों में सामुदायिक कार्यक्रम, सांस्कृतिक मंच, मेहंदी आयोजन और तीज मेलों का चलन बढ़ा है। जयपुर में 2026 का तीज उत्सव 14 और 15 अगस्त को आयोजित होने की जानकारी भारत सरकार के ‘इनक्रेडिबल इंडिया’ पोर्टल पर दी गई है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि तीज आज धार्मिक आयोजन के साथ-साथ सांस्कृतिक पर्यटन और स्थानीय विरासत से जुड़ा सार्वजनिक उत्सव भी बन चुका है।
निष्कर्ष
हरियाली तीज की पहचान तीन प्रमुख आयामों से बनती है—धार्मिक आस्था, मानसून की हरियाली और महिलाओं की लोक-सांस्कृतिक भागीदारी। धार्मिक परंपरा में यह पर्व शिव-पार्वती के मिलन और माता पार्वती की तपस्या से जोड़ा जाता है, जबकि सामाजिक जीवन में यह मायके-ससुराल के रिश्तों, महिलाओं के मेल-मिलाप और लोकगीतों की परंपरा को आगे बढ़ाता है। हरियाली तीज के बारे में स्थापित तथ्य यह है कि यह सावन शुक्ल पक्ष की तृतीया से जुड़ा मानसूनी पर्व है और इसके धार्मिक केंद्र में पार्वती तथा शिव की आराधना है। वहीं इसके पीछे मौजूद पौराणिक कथाएं धार्मिक मान्यताओं का हिस्सा हैं, जिनकी व्याख्या समुदाय और क्षेत्र के अनुसार अलग हो सकती है। 2026 में 15 अगस्त को मनाई जाने वाली यह तीज आज भी भारतीय लोक संस्कृति, पारिवारिक रिश्तों और सावन की हरियाली को एक साथ जोड़ने वाला महत्वपूर्ण पर्व बनी हुई है।