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हरियाली तीज क्यों मनाई जाती है? जानिए हरी चूड़ियों का महत्व

Neelam Saini 2026-08-09 14:19:00
हरियाली तीज क्यों मनाई जाती है? जानिए हरी चूड़ियों का महत्व

हरियाली तीज क्यों मनाई जाती है? जानिए हरी चूड़ियों का राज

शिव-पार्वती के मिलन से जुड़ी है हरियाली तीज की परंपरा

हरियाली तीज पर महिलाएं क्यों पहनती हैं हरी चूड़ियां? जानिए वजह

हरियाली तीज सावन की शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाई जाती है और इसे भगवान शिव व माता पार्वती के पुनर्मिलन से जोड़ा जाता है। महिलाएं इस अवसर पर व्रत, पूजा, मेहंदी और झूले की परंपरा निभाती हैं। हरा रंग सावन की हरियाली, प्रकृति, नवजीवन और शुभता का प्रतीक माना जाता है।

सावन में क्यों मनाई जाती है हरियाली तीज?

सावन का महीना आते ही देश के कई हिस्सों में धार्मिक उत्सवों की रौनक बढ़ जाती है। इन्हीं प्रमुख पर्वों में हरियाली तीज का विशेष स्थान है। यह पर्व खास तौर पर उत्तर भारत में महिलाओं के बीच आस्था, उत्साह और पारिवारिक परंपराओं से जुड़ा हुआ है। हरियाली तीज श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है। वर्ष 2026 में यह पर्व 15 अगस्त, शनिवार को मनाया जाएगा। पंचांग के अनुसार तृतीया तिथि 14 अगस्त की शाम से शुरू होकर 15 अगस्त की शाम तक रहेगी। ‘हरियाली’ नाम ही इस पर्व के मौसम और प्रकृति से संबंध को दर्शाता है। सावन में बारिश के बाद पेड़-पौधों और खेतों में हरियाली छा जाती है, इसलिए यह पर्व प्रकृति के नवजीवन और monsoon season की खूबसूरती से भी जुड़ा माना जाता है। 

शिव-पार्वती के मिलन से जुड़ी है मान्यता

धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक हरियाली तीज भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य मिलन का प्रतीक है। पौराणिक परंपरा में माता पार्वती की कठोर तपस्या और भगवान शिव को पति रूप में पाने की उनकी इच्छा की कथा इस पर्व से जोड़ी जाती है।इसी वजह से विवाहित महिलाएं हरियाली तीज पर माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा करती हैं और अपने वैवाहिक जीवन में सुख, प्रेम और समृद्धि की कामना करती हैं। द इंडियन एक्सप्रेस भी हरियाली तीज को शिव-पार्वती के पवित्र मिलन से जुड़ा पर्व बताता है। यहां यह समझना जरूरी है कि धार्मिक कथाएं आस्था और परंपरा का हिस्सा हैं। इनके विवरण अलग-अलग क्षेत्रों और धार्मिक परंपराओं में कुछ भिन्न रूपों में मिल सकते हैं।

हरियाली तीज पर महिलाएं क्यों रखती हैं व्रत?

हरियाली तीज की प्रमुख परंपराओं में व्रत और पूजा शामिल हैं। विवाहित महिलाएं अपने पति के सुख, स्वास्थ्य और दीर्घ वैवाहिक जीवन की कामना के साथ व्रत रखती हैं। अविवाहित युवतियां भी अच्छे जीवनसाथी की कामना से इस पर्व में भाग लेती हैं। हालांकि व्रत रखने का तरीका हर परिवार और क्षेत्र में समान नहीं होता। इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि हर महिला हरियाली तीज पर एक ही प्रकार का उपवास रखती है।धार्मिक दृष्टि से व्रत को श्रद्धा, संकल्प और आत्मसंयम से जोड़ा जाता है। आधुनिक संदर्भ में भी यह पर्व महिलाओं के लिए धार्मिक आस्था के साथ परिवार और सामाजिक मेल-जोल का अवसर बनता है।

हरी चूड़ियां पहनने की परंपरा क्यों?

हरियाली तीज की सबसे पहचानने योग्य परंपराओं में महिलाओं का हरी चूड़ियां और हरे वस्त्र पहनना शामिल है। हरे रंग का संबंध सीधे सावन की हरियाली और प्रकृति के पुनर्जीवन से जोड़ा जाता है। मान्यता के स्तर पर हरा रंग उर्वरता, विकास, समृद्धि और नवजीवन का प्रतीक माना जाता है। हरियाली तीज के दौरान हरी चूड़ियां पहनना इसी प्रकृति और उत्सव की भावना को दर्शाता है। हरे रंग को माता पार्वती से जुड़ी भक्ति और वैवाहिक सुख की कामना से भी जोड़ा जाता है। हालांकि इन अर्थों को धार्मिक-सांस्कृतिक मान्यताओं के रूप में समझना चाहिए, इन्हें वैज्ञानिक तथ्य के तौर पर पेश करना उचित नहीं होगा।

चूड़ियां सिर्फ श्रृंगार नहीं, परंपरा का हिस्सा

भारतीय समाज में चूड़ियों का महत्व केवल आभूषण तक सीमित नहीं रहा है। कई समुदायों में चूड़ियां महिलाओं के श्रृंगार, उत्सव और वैवाहिक जीवन से जुड़ी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा रही हैं। हरियाली तीज पर हरी चूड़ियां पहनने से उत्सव का रंग और भी स्पष्ट दिखाई देता है। मेहंदी लगे हाथ, हरे वस्त्र, चूड़ियों की खनक और झूले इस पर्व की पारंपरिक तस्वीर बनाते हैं। द इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार हरियाली तीज के अवसर पर महिलाएं हरे या चमकीले पारंपरिक परिधान पहनती हैं, चूड़ियां पहनती हैं और हाथों पर मेहंदी लगाती हैं। 

हरा रंग प्रकृति से क्यों जुड़ा?

हरियाली तीज मानसून के दौरान आती है। बारिश के बाद सूखी धरती पर हरियाली लौटती है और पेड़-पौधे नए रूप में दिखाई देने लगते हैं। इसी प्राकृतिक बदलाव को पर्व के नाम और रंग से जोड़कर देखा जाता है। इस लिहाज से हरी चूड़ियां केवल धार्मिक श्रृंगार नहीं बल्कि मौसम और प्रकृति के साथ सांस्कृतिक जुड़ाव का भी प्रतीक बन जाती हैं। यही कारण है कि इस दिन हरे कपड़े, हरी चूड़ियां और हरे रंग की सजावट का चलन कई इलाकों में दिखाई देता है।

झूले और तीज के गीतों की भी है खास परंपरा

हरियाली तीज का संबंध केवल व्रत और पूजा से नहीं है। कई क्षेत्रों में महिलाएं और युवतियां झूले का आनंद लेती हैं तथा पारंपरिक तीज गीत गाती हैं। सावन के दौरान पेड़ों पर झूले डालने की परंपरा भारतीय लोक संस्कृति में लंबे समय से रही है। हरियाली तीज ने इस लोक परंपरा को धार्मिक उत्सव के साथ जोड़ दिया है। इन आयोजनों में महिलाएं एक-दूसरे से मिलती हैं, गीत गाती हैं और त्योहार की खुशियां साझा करती हैं। इस तरह तीज धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक मेल-जोल का अवसर भी बनती है।

सिंधारा की परंपरा क्या है?

हरियाली तीज से सिंधारा की परंपरा भी जुड़ी हुई है। कई परिवारों में विवाहित बेटी के मायके से उसके लिए कपड़े, मिठाई, मेहंदी, चूड़ियां और दूसरे श्रृंगार की वस्तुएं भेजी जाती हैं। इसी परंपरा के कारण हरियाली तीज को कुछ स्थानों पर सिंधारा तीज भी कहा जाता है। द्रिक पंचांग के अनुसार सिंधारा में मिठाई, घेवर, मेहंदी और चूड़ियां जैसी चीजें शामिल की जाती हैं। यह परंपरा केवल उपहार देने तक सीमित नहीं है। इसके जरिए मायके और बेटी के बीच भावनात्मक जुड़ाव को भी अभिव्यक्ति मिलती है।

क्या सिर्फ विवाहित महिलाएं ही मनाती हैं तीज?

हरियाली तीज को आम तौर पर विवाहित महिलाओं के पर्व के तौर पर ज्यादा जाना जाता है, लेकिन अविवाहित युवतियां भी इसमें हिस्सा लेती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार वे अच्छे जीवनसाथी और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं।  इससे स्पष्ट है कि हरियाली तीज का सामाजिक दायरा केवल विवाहित महिलाओं तक सीमित नहीं है। अलग-अलग क्षेत्रों में इस पर्व को मनाने के तौर-तरीकों में भी विविधता देखने को मिलती है।

हरियाली तीज का बदलता स्वरूप

समय के साथ हरियाली तीज मनाने के तरीकों में भी बदलाव आया है। पारंपरिक पूजा और व्रत के साथ अब महिलाएं तीज मिलन, सांस्कृतिक कार्यक्रम और मेहंदी समारोह भी आयोजित करती हैं। शहरी इलाकों में तीज से जुड़े कार्यक्रम सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजन का रूप भी ले चुके हैं। हालांकि इन बदलावों के बावजूद शिव-पार्वती की पूजा, हरे रंग का महत्व और सावन की हरियाली से जुड़ी परंपरा अब भी पर्व की पहचान बनी हुई है।

आस्था के साथ प्रकृति का संदेश

हरियाली तीज की एक खास खूबी यह है कि इसका धार्मिक पक्ष और प्राकृतिक पक्ष एक-दूसरे से जुड़े हुए दिखाई देते हैं। सावन की बारिश जहां प्रकृति को नया जीवन देती है, वहीं पर्व का नाम और हरे रंग की परंपरा इसी बदलाव को उत्सव का रूप देती है। इसे आधुनिक संदर्भ में पर्यावरण के प्रति जागरूकता से जोड़कर भी देखा जा सकता है, लेकिन यह कहना कि हरियाली तीज मूल रूप से पर्यावरण संरक्षण का पर्व ही है, ऐतिहासिक रूप से अधिक व्यापक दावा होगा। इसका धार्मिक केंद्र शिव-पार्वती और वैवाहिक मंगल की कामना से जुड़ा है।

निष्कर्ष

हरियाली तीज सिर्फ सजने-संवरने और व्रत रखने का पर्व नहीं है। यह भगवान शिव और माता पार्वती के पवित्र मिलन, वैवाहिक सुख, महिला आस्था, लोक संस्कृति और सावन की हरियाली से जुड़ी एक समृद्ध परंपरा है।

इस दिन महिलाओं का हरी चूड़ियां पहनना भी इसी सांस्कृतिक तस्वीर का हिस्सा है। हरा रंग सावन की हरियाली, प्रकृति के नवजीवन और शुभता का प्रतीक माना जाता है, जबकि चूड़ियां उत्सव और पारंपरिक श्रृंगार को अभिव्यक्त करती हैं।

यही वजह है कि सावन आते ही हरी चूड़ियों की खनक, मेहंदी की खुशबू और तीज के गीत वातावरण में एक अलग रंग भर देते हैं। हरियाली तीज की असली खूबसूरती इसी में है कि यहां आस्था के साथ प्रकृति, रिश्ते और लोक संस्कृति भी एक साथ उत्सव मनाते नजर आते हैं।


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Neelam Saini

Neelam Saini

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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