यूपीआई शुल्क विवाद में 5 कांग्रेस सांसदों की संसदीय समिति में मौजूदगी चर्चा का केंद्र है। समिति ने राजस्व मॉडल की सिफारिश की थी, लेकिन कांग्रेस ने मौजूदा शुल्क से सहमति से इनकार किया।
📍 नई दिल्ली
🗓️ 17 सितंबर 2026
✍️ Wasi Siddiqui
यूपीआई पर प्रस्तावित शुल्क को लेकर केंद्र सरकार और कांग्रेस के बीच सियासी तकरार तेज हो गई है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सरकार के फैसले का विरोध करते हुए इसे वापस लेने की मांग की है। इसी बीच सरकार ने अगस्त में संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कांग्रेस के 5 सांसदों की भूमिका पर सवाल उठाया है।
सरकारी पक्ष का तर्क है कि समिति ने यूपीआई के लिए एक स्तरीय मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर आधारित राजस्व ढांचे की सिफारिश की थी। इस समिति में कांग्रेस के पी. चिदंबरम, मनीष तिवारी, गौरव गोगोई, किशोरी लाल और के. गोपीनाथ शामिल थे और रिपोर्ट अपनाए जाने के समय ये पांचों सांसद मौजूद थे। प्रकाशित कार्यवाही में उनकी ओर से असहमति दर्ज नहीं होने की बात सामने आई है।
इस पूरे विवाद में पहला नाम पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम का है। वित्त और आर्थिक नीतियों पर उनकी लंबी संसदीय भूमिका रही है। वह वित्त संबंधी स्थायी समिति के सदस्य रहे और अगस्त में रिपोर्ट अपनाए जाने वाली बैठक में मौजूद थे।
दूसरा नाम मनीष तिवारी का है। वह पूर्व केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं और वित्त संबंधी संसदीय समिति के सदस्य हैं। रिपोर्ट अपनाने वाली बैठक में उनकी मौजूदगी भी दर्ज बताई गई है।
तीसरे सांसद गौरव गोगोई हैं। असम से कांग्रेस सांसद गोगोई ने इस विवाद के बाद यह स्पष्ट किया कि समिति की बैठक में सरकार की मौजूदा यूपीआई शुल्क योजना का कोई विशिष्ट प्रस्ताव सामने नहीं रखा गया था। उनके मुताबिक एमडीआर पर सवाल जरूर उठे थे, लेकिन सरकार की ओर से कोई स्पष्ट और संतोषजनक प्रस्ताव उस समय मौजूद नहीं था।
चौथा नाम किशोरी लाल का है। वह भी वित्त संबंधी स्थायी समिति के सदस्य हैं और अगस्त में रिपोर्ट अपनाए जाने वाली बैठक में मौजूद बताए गए हैं।
पांचवें सांसद के. गोपीनाथ हैं। वह भी उसी समिति के सदस्य थे और रिपोर्ट अपनाए जाने के समय मौजूद थे। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक प्रकाशित कार्यवाही में इन पांचों सांसदों की ओर से अलग असहमति दर्ज नहीं की गई।
विवाद का केंद्र यूपीआई पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर का नया ढांचा है। सरकार के घोषित ढांचे के अनुसार 15 अक्टूबर 2026 से 2,000 रुपये से अधिक के कुछ कारोबारी यूपीआई भुगतान पर अधिकतम 0.4 प्रतिशत एमडीआर लागू होगा। व्यक्ति से व्यक्ति के बीच होने वाले यूपीआई भुगतान इस व्यवस्था से बाहर रहेंगे।
सरकार का कहना है कि यह शुल्क उपभोक्ता से सीधे वसूल किया जाने वाला कर नहीं है। एमडीआर भुगतान पारिस्थितिकी तंत्र में शामिल पक्षों के बीच वितरित होने वाला शुल्क है। सरकार ने उपभोक्ता पर सीधे अतिरिक्त बोझ से भी इनकार किया है।
राहुल गांधी ने इसके विपरीत इस व्यवस्था का राजनीतिक विरोध किया है और सरकार से फैसला वापस लेने की मांग की है। कांग्रेस की आपत्ति का एक प्रमुख आधार यह है कि शुल्क का आर्थिक असर अंततः व्यापारियों और उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है।
अगस्त में संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति ने यूपीआई के लिए एक स्थायी और स्तरीय राजस्व मॉडल की जरूरत पर जोर दिया था। समिति ने तर्क दिया कि यूपीआई व्यवस्था की वित्तीय स्थिरता के लिए ऐसा मॉडल जरूरी है जिससे पूरे तंत्र का खर्च लगातार सरकारी खजाने पर निर्भर न रहे।
रिपोर्ट में यूपीआई पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बजटीय आवंटन और अनुमानित परिचालन लागत के बीच बड़े अंतर का उल्लेख किया गया था। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक समिति ने 2026-27 के लिए करीब 2,000 करोड़ रुपये के बजटीय आवंटन की तुलना लगभग 20,700 करोड़ रुपये की अनुमानित परिचालन लागत से की थी।
समिति ने वित्तीय स्थिरता के साथ साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी रोकथाम और डिजिटल भुगतान के बुनियादी ढांचे में निवेश की जरूरत को भी संदर्भ में रखा था।
यहीं इस विवाद का सबसे अहम तथ्य सामने आता है। उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर यह कहना अधिक सटीक है कि पांच कांग्रेस सांसद उस संसदीय समिति का हिस्सा थे जिसने स्तरीय राजस्व मॉडल की सिफारिश वाली रिपोर्ट अपनाई और उस बैठक में उनकी ओर से दर्ज असहमति सामने नहीं आई। लेकिन इससे यह स्वतः साबित नहीं होता कि पांचों सांसदों ने सितंबर में घोषित मौजूदा शुल्क व्यवस्था के हर प्रावधान को व्यक्तिगत तौर पर मंजूरी दी थी।
गौरव गोगोई का बयान इसी अंतर को सामने लाता है। उन्होंने कहा कि समिति की बैठक के दौरान यूपीआई टैक्स का कोई विशिष्ट प्रस्ताव मौजूद नहीं था। उनका कहना था कि एमडीआर से जुड़े सवाल जरूर उठे, लेकिन सरकार की ओर से कोई ठोस प्रस्ताव समिति के सामने नहीं था।
इसलिए “समिति की सिफारिश” और “मौजूदा सरकारी शुल्क व्यवस्था का समर्थन” को एक ही बात मानना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।
राहुल गांधी ने सरकार के मौजूदा यूपीआई शुल्क ढांचे पर तीखी आपत्ति जताई है और इसे वापस लेने की मांग की है। उनका तर्क है कि डिजिटल भुगतान पर शुल्क लगाने से आम लोगों और कारोबारियों पर आर्थिक असर पड़ सकता है। उन्होंने इस मुद्दे को केंद्र सरकार की आर्थिक और विदेशी नीति से भी जोड़ा है।
केंद्र सरकार ने राहुल गांधी के आरोपों को खारिज किया है। सरकार का कहना है कि एमडीआर कोई ऐसा कर नहीं है जिसे सरकार सीधे उपभोक्ताओं से वसूल करेगी। उसका उद्देश्य यूपीआई व्यवस्था के वित्तीय ढांचे को टिकाऊ बनाना है।
यूपीआई भारत के डिजिटल भुगतान ढांचे का सबसे बड़ा हिस्सा बन चुका है। भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार अगस्त 2026 में यूपीआई पर लगभग 24,509 मिलियन लेनदेन हुए, जिनका कुल मूल्य करीब 29,82,356 करोड़ रुपये रहा।
इतने बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाली भुगतान व्यवस्था में शुल्क का कोई भी बदलाव बैंक, भुगतान ऐप, व्यापारी और ग्राहक सभी के लिए महत्वपूर्ण है। यही वजह है कि एमडीआर को लेकर आर्थिक बहस के साथ राजनीतिक विवाद भी तेज हुआ है।
एमडीआर सीधे तौर पर कारोबारी भुगतान से जुड़ा शुल्क है। सरकार की मौजूदा व्यवस्था में 2,000 रुपये से अधिक के कुछ मर्चेंट यूपीआई भुगतान इसके दायरे में आएंगे। व्यक्ति से व्यक्ति के भुगतान पर यह शुल्क लागू नहीं होगा।
इस व्यवस्था का वास्तविक आर्थिक असर इस बात पर भी निर्भर करेगा कि व्यापारी इस लागत को किस तरह वहन करते हैं। सरकार का कहना है कि उपभोक्ताओं से इसे अलग शुल्क के रूप में वसूलने की अनुमति नहीं होगी। दूसरी ओर, कारोबारी संगठनों ने चिंता जताई है कि अतिरिक्त लागत छोटे मार्जिन वाले कारोबार पर दबाव डाल सकती है।
कांग्रेस के लिए मुख्य सवाल संसदीय समिति की पुरानी सिफारिश और मौजूदा सरकारी व्यवस्था के बीच अंतर स्पष्ट करने का है। पार्टी को यह बताना होगा कि समिति ने जिस दीर्घकालिक राजस्व मॉडल की सिफारिश की थी, वह मौजूदा 0.4 प्रतिशत एमडीआर व्यवस्था से किस तरह अलग है।
दूसरी तरफ सरकार के लिए भी सवाल कम नहीं हैं। उसे यह स्पष्ट करना होगा कि नए शुल्क की सीमा कैसे तय हुई, इससे भुगतान पारिस्थितिकी तंत्र में कितना राजस्व आएगा और छोटे कारोबारियों पर आर्थिक प्रभाव को कम करने के लिए कौन से सुरक्षा उपाय लागू होंगे।
इस विवाद को केवल “राहुल गांधी बनाम कांग्रेस के पांच सांसद” के रूप में देखना अधूरा होगा। उपलब्ध रिकॉर्ड एक संसदीय समिति की ऐसी सिफारिश दिखाते हैं जिसमें यूपीआई के लिए टिकाऊ राजस्व मॉडल की जरूरत बताई गई थी। उसी समिति की बैठक में पांच कांग्रेस सांसद मौजूद थे और प्रकाशित कार्यवाही में उनके नाम से अलग असहमति दर्ज नहीं है।
लेकिन कांग्रेस सांसदों का कहना है कि अगस्त की समिति चर्चा को सितंबर में घोषित मौजूदा यूपीआई शुल्क प्रस्ताव की स्वीकृति मानना सही नहीं है। गौरव गोगोई का बयान इस दावे को सीधे चुनौती देता है।
इसलिए फिलहाल सबसे तथ्यपरक निष्कर्ष यही है कि संसद की समिति ने यूपीआई के लिए राजस्व मॉडल की जरूरत का समर्थन किया था, जबकि मौजूदा शुल्क व्यवस्था पर कांग्रेस ने राजनीतिक विरोध दर्ज किया है। दोनों घटनाओं के बीच संबंध है, लेकिन उन्हें एक ही फैसला मानना सही नहीं होगा।
यूपीआई शुल्क विवाद अब केवल भुगतान नीति का मुद्दा नहीं रह गया है। यह संसदीय रिपोर्ट, सरकारी नीति, विपक्ष की राजनीति और डिजिटल अर्थव्यवस्था की वित्तीय स्थिरता, चारों को एक साथ सामने ला रहा है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।