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पीरान कलियर में अरशद मदनी का बयान: ‘देश मोहब्बत से चलेगा, नफरत से नहीं’

Asif Khan 2026-06-24 15:28:54
पीरान कलियर में अरशद मदनी का बयान: ‘देश मोहब्बत से चलेगा, नफरत से नहीं’

अरशद मदनी का बड़ा बयान, बोले- देश नफरत से नहीं चल सकता


पीरान कलियर से उठी एकता की आवाज, मदनी ने सरकारों पर साधा निशाना


मदरसों पर कार्रवाई से लेकर भाईचारे तक, मदनी के भाषण की बड़ी बातें



जमीअत उलेमा-ए-हिन्द के अध्यक्ष मौलाना सैय्यद अरशद मदनी ने पीरान कलियर में आयोजित अधिवेशन में सामाजिक सौहार्द, बुल्डोजर कार्रवाई और देश के मौजूदा माहौल पर अपनी राय रखी। उनके भाषण में सरकार की नीतियों पर आलोचना के साथ-साथ हिंदू-मुस्लिम एकता और इंसानियत का संदेश भी प्रमुख रहा। यह बयान ऐसे समय आया है जब पहचान, धर्म और सामाजिक सद्भाव से जुड़े मुद्दे राष्ट्रीय बहस के केंद्र में हैं।


📍पीरान कलियर, हरिद्वार

📰 24 जून 2026

✍️ Shahnazar



देश की सियासत और समाज के बीच उठे सवाल

पीरान कलियर शरीफ में आयोजित जमीअत उलेमा उत्तराखंड के प्रदेश कार्यकारिणी अधिवेशन ने केवल संगठनात्मक बैठक का रूप नहीं लिया, बल्कि यह देश में सामाजिक सौहार्द, धार्मिक पहचान और संवैधानिक मूल्यों पर चर्चा का मंच भी बन गया। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता जमीअत उलेमा-ए-हिन्द के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना सैय्यद अरशद मदनी रहे।

अपने संबोधन में मदनी ने कहा कि कोई भी मुल्क लंबे समय तक नफरत के सहारे नहीं चल सकता। उनके मुताबिक किसी भी समाज की मजबूती का आधार मोहब्बत, इंसाफ और आपसी भरोसा होता है। उन्होंने यह भी कहा कि राजनीतिक सत्ता अस्थायी होती है, जबकि ईश्वर में आस्था विभिन्न धर्मों को जोड़ने वाली स्थायी शक्ति है।

अरशद मदनी बयान और उसका राजनीतिक संदर्भ

हाल के वर्षों में देश में बुल्डोजर कार्रवाई, धार्मिक पहचान और सांप्रदायिक तनाव जैसे मुद्दे राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बने हैं। ऐसे माहौल में अरशद मदनी का बयान केवल धार्मिक मंच तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे व्यापक सामाजिक और राजनीतिक बहस से जोड़कर देखा जा रहा है।

मदनी ने अपने भाषण में मदरसों और मस्जिदों पर हो रही कार्रवाई को लेकर चिंता जताई। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ संस्थानों को निशाना बनाया जा रहा है। हालांकि इन कार्रवाइयों को लेकर संबंधित राज्य सरकारें और प्रशासनिक एजेंसियां अक्सर यह तर्क देती रही हैं कि कार्रवाई अवैध निर्माण या कानूनी प्रक्रियाओं के तहत की जाती है।

यही वह बिंदु है जहां बहस दो अलग-अलग दृष्टिकोणों में विभाजित दिखाई देती है।

बुल्डोजर कार्रवाई पर दो पक्ष

मदनी का कहना है कि धार्मिक और शैक्षणिक संस्थानों पर की जा रही कार्रवाई न्याय और संविधान की भावना के अनुरूप नहीं है। उनके अनुसार जिन संस्थानों ने शिक्षा और सामाजिक विकास में योगदान दिया, उन्हें संदेह की नजर से नहीं देखा जाना चाहिए।

दूसरी ओर सरकारों और प्रशासन का पक्ष यह रहा है कि कानून सभी पर समान रूप से लागू होता है और अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई किसी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं बल्कि नियमों के पालन के लिए की जाती है।

यही कारण है कि यह विषय केवल धार्मिक नहीं बल्कि कानूनी और संवैधानिक बहस का भी हिस्सा बन चुका है। अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता मानकों के अनुसार दोनों पक्षों के तर्कों को समझना आवश्यक है।

आजादी की विरासत पर जोर

अपने संबोधन में मदनी ने स्वतंत्रता आंदोलन में मुस्लिम उलेमा और जमीअत उलेमा-ए-हिन्द की भूमिका का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि संगठन का इतिहास देश की आजादी की लड़ाई से जुड़ा रहा है और कई उलेमा ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष किया।

इतिहासकारों के अनुसार भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में विभिन्न धर्मों, विचारधाराओं और संगठनों ने अलग-अलग भूमिकाएं निभाईं। कांग्रेस, क्रांतिकारी संगठनों, समाज सुधार आंदोलनों, उलेमा, सिख नेताओं और अनेक क्षेत्रीय समूहों ने अपने-अपने स्तर पर योगदान दिया।

इसलिए स्वतंत्रता संग्राम की विरासत को किसी एक समुदाय या संगठन तक सीमित करना इतिहास की जटिलता को सरल बनाना होगा।

हिंदू-मुस्लिम एकता का संदेश

मदनी के भाषण का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हिंदू-मुस्लिम संबंधों पर केंद्रित रहा। उन्होंने कहा कि सामाजिक तनाव का समाधान टकराव नहीं बल्कि संवाद और आपसी सम्मान है।

उन्होंने उपस्थित लोगों से अपने पड़ोस, समाज और स्थानीय स्तर पर भाईचारा मजबूत करने की अपील की। उनके अनुसार राजनीतिक मतभेदों के बावजूद आम नागरिकों के बीच रिश्ते मजबूत बने रहने चाहिए।

विश्लेषकों का मानना है कि भारत जैसे बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश में सामाजिक स्थिरता काफी हद तक समुदायों के बीच भरोसे पर निर्भर करती है। इसलिए ऐसे संदेशों का प्रभाव राजनीतिक सीमाओं से आगे जाकर सामाजिक स्तर पर भी देखा जाता है।

राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनते मुद्दे

पीरान कलियर का यह अधिवेशन ऐसे समय हुआ है जब देश में धार्मिक पहचान, वक्फ संपत्तियों, शिक्षा संस्थानों और सामाजिक ध्रुवीकरण जैसे मुद्दों पर लगातार चर्चा हो रही है।

अधिवेशन में शिक्षा के विस्तार, मदरसों के आधुनिकीकरण, वक्फ संपत्तियों के संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक सौहार्द से जुड़े प्रस्ताव भी पारित किए गए। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि संगठन केवल धार्मिक मुद्दों तक सीमित रहने के बजाय सामाजिक और शैक्षिक विषयों को भी अपने एजेंडा में शामिल करना चाहता है।

हालांकि इन प्रस्तावों के वास्तविक प्रभाव का आकलन उनके क्रियान्वयन और जनभागीदारी पर निर्भर करेगा।

क्या केवल भाषण से बदल सकता है माहौल?

यह एक महत्वपूर्ण सवाल है। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में भाषण प्रतीकात्मक महत्व रखते हैं, लेकिन वास्तविक बदलाव नीतियों, न्यायिक प्रक्रियाओं, प्रशासनिक पारदर्शिता और सामाजिक व्यवहार से आता है।

यदि सामाजिक सौहार्द की बात की जाती है तो उसकी जिम्मेदारी केवल राजनीतिक दलों या धार्मिक संगठनों की नहीं बल्कि पूरे समाज की होती है। इसी तरह यदि किसी कार्रवाई पर सवाल उठाए जाते हैं तो उनके कानूनी और तथ्यात्मक पक्ष की भी जांच जरूरी होती है।

यही लोकतांत्रिक विमर्श की मूल भावना है।

 मोहब्बत, संविधान और संवाद की चुनौती

पीरान कलियर से दिया गया अरशद मदनी का संदेश समर्थकों और आलोचकों दोनों के बीच चर्चा का विषय बन गया है। एक तरफ उन्होंने नफरत की राजनीति पर सवाल उठाए, दूसरी तरफ हिंदू-मुस्लिम एकता और इंसानियत की बात की।

लेकिन असली चुनौती भाषणों से आगे बढ़कर विश्वास बहाली की है। भारत की लोकतांत्रिक ताकत उसकी विविधता में निहित है। ऐसे में किसी भी पक्ष की राजनीति, धार्मिक बयानबाजी या सामाजिक प्रतिक्रिया का अंतिम मूल्यांकन इसी आधार पर होगा कि वह समाज को जोड़ती है या और अधिक विभाजित करती है।

राष्ट्रीय स्तर पर चल रही बहसों के बीच पीरान कलियर से उठी यह आवाज एक बार फिर याद दिलाती है कि लोकतंत्र केवल सत्ता का प्रश्न नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व और संवाद की निरंतर प्रक्रिया भी है।

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Asif Khan

Asif Khan

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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