
Waqf Bill Sparks Controversy: Real Reform or Political Agenda?
वक़्फ़ बिल: असल मुद्दों से ध्यान भटकाने की भाजपा की नई चाल?
भाजपा द्वारा लाया गया वक़्फ़ बिल देश में बहस का केंद्र बन गया है। क्या यह असल मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश है या सांप्रदायिक राजनीति का हिस्सा? जानिए विस्तार से।
नई दिल्ली ,(Shah Times) । केंद्र सरकार द्वारा लाया गया वक़्फ़ संशोधन विधेयक इन दिनों राजनीतिक और सामाजिक हलकों में गहन बहस का विषय बना हुआ है। विपक्षी दलों और कई सामाजिक संगठनों का मानना है कि यह विधेयक न केवल संवैधानिक अधिकारों का हनन है, बल्कि यह भाजपा द्वारा अपने पिछले वादों और नीतिगत विफलताओं से ध्यान भटकाने की एक सोची-समझी सियासी रणनीति है।
असली मुद्दे गायब, दिखावे की राजनीति ज़ोरों पर
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, भाजपा सरकार नोटबंदी, जीएसटी, बढ़ती महंगाई, बेरोज़गारी, स्वास्थ्य, शिक्षा और आवास जैसे मूलभूत मुद्दों का समाधान देने में असफल रही है। ऐसे में वक़्फ़ संशोधन विधेयक जैसे विषयों को उठाकर जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश की जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब चीन भारत की ज़मीन पर अपने गाँव बसा चुका है, तब सरकार की चुप्पी सवाल खड़े करती है। लेकिन इन मुद्दों पर बहस न हो, इसके लिए सरकार वक़्फ़ जैसी संवेदनशील भूमि पर कानून लाकर ‘ध्रुवीकरण’ की राजनीति को हवा देना चाहती है।
विधेयक में क्या है आपत्तिजनक?
- धार्मिक स्वतंत्रता पर अघात: विधेयक में ऐसी धाराएँ जो वक़्फ़ प्रॉपर्टी के धार्मिक प्रबंधन को सरकारी हस्तक्षेप के अधीन करती हैं, उन्हें मुस्लिम समुदाय के संवैधानिक अधिकारों पर आघात माना जा रहा है।
- बाहरी हस्तक्षेप का प्रावधान: वक़्फ़ बोर्ड में बाहरी लोगों की नियुक्ति और कलेक्टर के ज़रिये सर्वेक्षण कराना समुदाय की आस्था और स्वायत्तता पर सवाल खड़े करता है।
- ट्रिब्यूनल का अधिकार सीमित: वक़्फ़ ट्रिब्यूनल के फ़ैसले को अंतिम न मानकर उच्च न्यायालय में चुनौती देने का विकल्प ज़मीनी विवादों को लंबा खींचने और ज़मीन पर कब्ज़ा बनाए रखने की साज़िश के तौर पर देखा जा रहा है।
भाजपा की नीयत पर सवाल
राजनीतिक टिप्पणीकारों का कहना है कि भाजपा वक़्फ़ की ज़मीनों पर निगाहें गड़ाए बैठी है। वह इन संपत्तियों को अप्रत्यक्ष रूप से अपने समर्थकों को सौंपने की योजना पर काम कर रही है। इससे न केवल मुस्लिम समुदाय में असुरक्षा की भावना बढ़ेगी, बल्कि देश की धर्मनिरपेक्ष छवि को भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नुकसान पहुंचेगा।
विपक्ष का विरोध
विपक्षी दलों का कहना है कि जब देश की अर्थव्यवस्था चरमराई हुई है, युवा बेरोज़गारी की मार झेल रहे हैं, और आम आदमी महंगाई से त्रस्त है, तब सरकार को असली मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए। वक़्फ़ विधेयक को लाना भाजपा का ‘सियासी हठ’ और ‘वोटबैंक ध्रुवीकरण’ की रणनीति है।
वक़्फ़ बिल एक संवेदनशील विषय है और इसे केवल राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल करना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ़ है। सरकार को चाहिए कि वह सभी धार्मिक और सामाजिक समुदायों के अधिकारों की रक्षा करते हुए पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से विधेयक पर पुनर्विचार करे। अन्यथा, यह विधेयक भाजपा के लिए वही साबित हो सकता है जो वाटरलू की जंग ने नेपोलियन के लिए किया था — एक ऐतिहासिक पराजय।