
DM Umesh Mishra reviewing Swachh Bharat Mission rural sanitation work in Muzaffarnagar Shah Times
मुज़फ्फरनगर में स्वच्छ भारत मिशन की बड़ी समीक्षा, अफसरों को अलर्ट
90 गांवों में डोर टू डोर कूड़ा कलेक्शन का आदेश, रिपोर्ट तलब
मुज़फ्फरनगर में जिला स्वच्छ भारत मिशन ग्रामीण समिति की बैठक के दौरान जिलाधिकारी उमेश मिश्रा ने ग्रामीण स्वच्छता, शौचालय क्रियाशीलता और डोर टू डोर कूड़ा कलेक्शन को लेकर सख्त रुख दिखाया। प्रशासन ने 90 गांवों को प्राथमिकता सूची में शामिल करते हुए जवाबदेही तय करने के संकेत दिए हैं।
📍 Muzaffarnagar
📰 25 May 2026
✍️ Wasi Siddiqui
जिलाधिकारी की अध्यक्षता में जिला स्वच्छ भारत मिशन ग्रामीण समिति की बैठक, क्या अब बदलेगी ज़मीनी तस्वीर?
मुज़फ्फरनगर में आयोजित जिला स्वच्छ भारत मिशन ग्रामीण समिति की बैठक केवल एक प्रशासनिक रूटीन मीटिंग नहीं थी। इस बैठक ने यह संकेत दिया कि ग्रामीण स्वच्छता को लेकर अब जिला प्रशासन केवल कागज़ी दावों से संतुष्ट नहीं रहना चाहता। जिलाधिकारी उमेश मिश्रा ने जिस तरह व्यक्तिगत शौचालयों की क्रियाशीलता, सामुदायिक शौचालयों के सत्यापन और डोर टू डोर कूड़ा कलेक्शन पर सख्त निर्देश दिए, उससे साफ है कि प्रशासन अब “ग्राउंड रिपोर्ट” देखना चाहता है, केवल फाइलों का नैरेटिव नहीं।
भारत में स्वच्छ भारत मिशन ने पिछले वर्षों में बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा किया। लाखों शौचालय बने, गांवों को ओडीएफ घोषित किया गया और सरकारी रिपोर्टों में कई जिलों को मॉडल बताया गया। लेकिन असली सवाल हमेशा यही रहा कि क्या ये व्यवस्थाएं ज़मीन पर लगातार काम भी कर रही हैं?
मुज़फ्फरनगर की यह बैठक उसी पुराने लेकिन अहम सवाल की तरफ फिर से ध्यान खींचती है।
क्या हुआ बैठक में?
जिलाधिकारी आवास सभागार में हुई बैठक में मुख्य विकास अधिकारी, जिला पंचायत राज अधिकारी, मुख्य चिकित्सा अधिकारी, जल निगम के अधिकारी, शिक्षा विभाग, पंचायत विभाग और ब्लॉक स्तर के प्रशासनिक अधिकारी मौजूद रहे।
बैठक के दौरान जिलाधिकारी ने निर्देश दिया कि पात्र लाभार्थियों को व्यक्तिगत शौचालय निर्माण के लिए धनराशि हस्तांतरित की जाए और निर्माण कार्य गुणवत्तापूर्ण हो। साथ ही पहले से बने शौचालयों की वास्तविक स्थिति की जांच कर एक सप्ताह के भीतर रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा गया।
यह निर्देश केवल निर्माण तक सीमित नहीं था। प्रशासन ने साफ कहा कि सामुदायिक शौचालयों की “क्रियाशीलता” का भी सत्यापन किया जाए। कई राज्यों में पहले यह शिकायतें सामने आती रही हैं कि शौचालय बने लेकिन पानी नहीं, सफाई नहीं या उपयोग नहीं।
यही वजह है कि “क्रियाशीलता” शब्द इस बैठक का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।



केवल शौचालय बनाना काफी नहीं
स्वच्छ भारत मिशन की सबसे बड़ी आलोचना यही रही है कि कई जगह निर्माण पर ज़ोर रहा, लेकिन व्यवहार परिवर्तन और रखरखाव पीछे छूट गया।
कई ग्रामीण इलाकों में शौचालय स्टोर रूम बन गए। कहीं पानी की दिक्कत रही, कहीं रखरखाव का संकट। कुछ जगहों पर लाभार्थियों ने अधूरा निर्माण छोड़ दिया। सरकारी आंकड़े और ज़मीनी तस्वीर के बीच यही दूरी प्रशासनिक चुनौती बनती रही।
मुज़फ्फरनगर की बैठक में जब जिलाधिकारी ने सत्यापन रिपोर्ट मांगी, तो यह अप्रत्यक्ष रूप से उसी गैप को स्वीकार करने जैसा कदम माना जा सकता है।
अगर प्रशासन केवल “निर्माण संख्या” देखता, तो शायद ऐसी समीक्षा की ज़रूरत नहीं पड़ती।
90 गांवों पर फोकस क्यों अहम?
बैठक में 90 ग्रामों को प्राथमिकता के आधार पर चयनित कर डोर टू डोर कूड़ा कलेक्शन और सेग्रीगेशन सेंटर पर कचरे के पृथक्कीकरण की बात कही गई।
यह फैसला इसलिए अहम है क्योंकि ग्रामीण भारत में वेस्ट मैनेजमेंट अब नया संकट बनता जा रहा है। पहले गांवों में जैविक कचरा अधिक होता था, लेकिन अब प्लास्टिक, पैकेजिंग वेस्ट और मेडिकल कचरे तक की मौजूदगी बढ़ चुकी है।
ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर कूड़ा सड़क किनारे, नालों या खाली जमीनों पर फेंका जाता है। इसका असर केवल गंदगी तक सीमित नहीं रहता। इससे जल स्रोत, पशु स्वास्थ्य और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर असर पड़ता है।
अगर डोर टू डोर कलेक्शन और सेग्रीगेशन सही तरीके से लागू होता है, तो यह केवल सफाई अभियान नहीं बल्कि ग्रामीण हेल्थ सिस्टम के लिए भी राहत बन सकता है।
प्रशासन की सख्ती, क्या असर दिखेगा?
बैठक में जिलाधिकारी ने साफ चेतावनी दी कि कार्य में शिथिलता मिलने पर कठोर कार्रवाई होगी।
भारतीय प्रशासनिक सिस्टम में ऐसी चेतावनियां नई नहीं हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या जवाबदेही वास्तव में तय होगी?
कई बार स्थानीय स्तर पर संसाधनों की कमी, कर्मचारियों की संख्या और तकनीकी दिक्कतें भी बड़ी बाधा बनती हैं। पंचायत स्तर पर सफाई कर्मचारियों की उपलब्धता और मॉनिटरिंग की समस्या लंबे समय से बनी हुई है।
इसलिए केवल चेतावनी देना पर्याप्त नहीं होगा। प्रशासन को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि ज़मीनी अमला काम करने की स्थिति में हो।
ग्रामीण स्वच्छता और राजनीति
स्वच्छता अब केवल हेल्थ या डेवलपमेंट का मुद्दा नहीं रहा। यह राजनीतिक क्रेडिबिलिटी से भी जुड़ चुका है।
केंद्र और राज्य सरकारें स्वच्छ भारत मिशन को अपनी बड़ी उपलब्धियों में गिनाती रही हैं। ऐसे में किसी जिले की खराब ग्राउंड रिपोर्ट सीधे राजनीतिक नैरेटिव को प्रभावित कर सकती है।
यही वजह है कि जिलास्तर पर समीक्षा बैठकों की गंभीरता बढ़ गई है।
लेकिन दूसरी तरफ विपक्ष और कई सामाजिक संगठनों का तर्क है कि केवल फोटो-ऑप और पेंटिंग अभियान से स्थायी बदलाव नहीं आते। उनका कहना है कि ग्रामीण इलाकों में व्यवहार परिवर्तन, पानी की उपलब्धता और नियमित निगरानी पर अधिक निवेश होना चाहिए।
दोनों पक्षों के तर्कों में कुछ सच्चाई मौजूद है।
स्वास्थ्य पर सीधा असर
ग्रामीण स्वच्छता का सबसे बड़ा संबंध स्वास्थ्य से है। खुले में कचरा, गंदे नाले और अनुपयोगी शौचालय संक्रमण फैलाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं।
बरसात के मौसम में यह खतरा और बढ़ जाता है। डेंगू, मलेरिया, डायरिया और अन्य जलजनित बीमारियां अक्सर गंदगी से जुड़ी व्यवस्थागत विफलताओं के कारण फैलती हैं।
ऐसे में यदि प्रशासन वास्तव में नियमित मॉनिटरिंग और कलेक्शन सिस्टम लागू करता है, तो इसका असर केवल साफ गांवों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे हेल्थ एक्सपेंडिचर और बीमारी का दबाव भी कम हो सकता है।
क्या जनता की भागीदारी होगी?
ग्रामीण स्वच्छता की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि सरकार अकेले इसे सफल नहीं बना सकती।
अगर लोग घर का कचरा खुले में फेंकते रहेंगे, सामुदायिक शौचालयों का उपयोग नहीं करेंगे या पंचायत स्तर पर निगरानी में सहयोग नहीं करेंगे, तो कोई भी मिशन अधूरा रह जाएगा।
स्वच्छता का मॉडल केवल सरकारी आदेशों से नहीं चलता। इसके लिए सामाजिक भागीदारी, जागरूकता और स्थानीय नेतृत्व की जरूरत होती है।
मुज़फ्फरनगर प्रशासन के सामने भी यही असली परीक्षा होगी।
आगे क्या?
अब सबसे महत्वपूर्ण चरण होगा “फॉलो-अप”।
क्या एक सप्ताह बाद रिपोर्ट केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगी?
क्या वास्तव में शौचालयों की स्थिति का स्वतंत्र सत्यापन होगा?
क्या डोर टू डोर कलेक्शन स्थायी मॉडल बन पाएगा?
क्या पंचायत स्तर पर जवाबदेही तय होगी?
इन सवालों के जवाब आने वाले हफ्तों में सामने आएंगे।
फिलहाल इतना साफ है कि प्रशासन ने स्वच्छता को फिर से प्राथमिक एजेंडा बनाने की कोशिश की है। लेकिन असली सफलता तभी मानी जाएगी जब गांवों की ज़मीन पर बदलाव दिखाई दे, न कि केवल रिपोर्टों में।
ग्रामीण भारत में स्वच्छता की लड़ाई अब दूसरे चरण में प्रवेश कर चुकी है। पहला चरण निर्माण का था। दूसरा चरण रखरखाव, जवाबदेही और व्यवहार परिवर्तन का है।
मुज़फ्फरनगर की यह बैठक उसी दूसरे चरण की शुरुआत मानी जा सकती है।
DM Cracks Down on Rural Sanitation
Cleanliness Drive Gets Tough in Muzaffarnagar
Rural Waste Management Under Strict Review






