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भारत का ‘फर्स्ट एड मैन’: डॉ. शबाब आलम की इंस्पायरिंग जर्नी

None 2025-10-20 19:04:50
भारत का ‘फर्स्ट एड मैन’: डॉ. शबाब आलम की इंस्पायरिंग जर्नी

जब एक डॉक्टर ने हर नागरिक को ‘प्राथमिक चिकित्सक’ बनाने का सपना देखा

दिल्ली से निकली वह मुहिम जिसने बदल दी भारत की हेल्थ सोच

📍नई दिल्ली 🗓️20 अक्तूबर 2025 ✍️आसिफ़ ख़ान

राजधानी दिल्ली के डॉक्टर शबाब आलम की कहानी सिर्फ प्रेरक नहीं बल्कि भारत के हेल्थ सेक्टर में एक नई सोच का प्रतीक है। उन्होंने ‘फर्स्ट एड काउंसिल ऑफ इंडिया’ के ज़रिए हर भारतीय को प्रशिक्षित प्राथमिक चिकित्सक बनाने की दिशा में अनोखी पहल की, ताकि हादसे या बीमारी के वक्त कोई ज़िंदगी सिर्फ मदद न मिलने के कारण न जाए।

दिल्ली की गलियों में पली-बढ़ी एक कहानी आज पूरे देश के दिल में जगह बना चुकी है। यह कहानी है डॉ. शबाब आलम की — जिन्हें लोग आज प्यार से ‘फर्स्ट एड मैन ऑफ इंडिया’ कहते हैं। यह नाम सिर्फ एक उपाधि नहीं, बल्कि लाखों ज़िंदगियों को बचाने वाले एक मिशन की पहचान है।

डॉ. आलम बताते हैं कि उनकी यह यात्रा एक घटना से शुरू हुई — जब उन्होंने अपनी आंखों के सामने एक व्यक्ति को सीपीआर (Cardio Pulmonary Resuscitation) देकर बचाते हुए देखा। उसी पल उन्हें महसूस हुआ कि यह छोटा-सा स्किल किसी की पूरी ज़िंदगी बदल सकता है। उन्होंने सोचा, अगर हर इंसान को यह सिखा दिया जाए, तो भारत में कोई भी इंसान मदद के बिना नहीं मरेगा।

आज भी भारत में हर 23 सेकेंड में एक मौत प्राथमिक उपचार न मिलने से होती है। यह आंकड़ा बताता है कि फर्स्ट एड न सिर्फ मेडिकल ट्रेनिंग है बल्कि एक सामाजिक ज़िम्मेदारी भी है।
डॉ. आलम कहते हैं –
“कोई भी इंसान, चाहे पढ़ा लिखा हो या नहीं, प्राथमिक चिकित्सा सीख सकता है। यह कोई रॉकेट साइंस नहीं, बल्कि इंसानियत की पहली सीढ़ी है।”

उनकी संस्था फर्स्ट एड काउंसिल ऑफ इंडिया (FACI) इसी विचार से बनी। 2019 में जब उन्होंने इसकी नींव रखी, तब कई लोगों को लगा कि यह बस एक छोटा सामाजिक प्रयोग है। लेकिन आज यही पहल एक राष्ट्रीय मुहिम बन चुकी है।

प्राथमिक चिकित्सा क्यों है ज़रूरी

जब किसी व्यक्ति को अचानक हार्ट अटैक आता है या एक्सीडेंट हो जाता है, तो अस्पताल तक पहुंचने के पहले के कुछ मिनट ही असली ‘गोल्डन टाइम’ होते हैं। अगर उस वक्त किसी ने सही तरह से सीपीआर या ब्लीडिंग कंट्रोल जैसे स्टेप्स कर दिए, तो जान बच सकती है।

https://youtu.be/AEcb46d8mbw?si=BPCuelGib95g_e41


डॉ. आलम कहते हैं,
“हम अपने बच्चों को मैथ्स और साइंस पढ़ाते हैं, लेकिन ज़िंदगी बचाने वाली स्किल्स नहीं सिखाते। यही हमारी सबसे बड़ी कमी है।”

इसी कमी को दूर करने के लिए उन्होंने एक ऐसा मॉडल बनाया जिसमें फर्स्ट एड को स्कूलों और कॉलेजों में अनिवार्य विषय के रूप में शामिल किया जा सके। उनका मानना है कि जैसे एनसीसी और स्काउट-गाइड से देशभक्ति की भावना आती है, वैसे ही फर्स्ट एड से सामाजिक ज़िम्मेदारी और संवेदनशीलता बढ़ती है।

इंसानियत का सबक किताबों से नहीं, हालात से सीखा जाता है।

डॉ. शबाब आलम फ़रमाते हैं,
“इंसानियत का सबक किताबों से नहीं, हालात से सीखा जाता है। जब एक घायल शख़्स तुम्हारे सामने तड़प रहा हो और तुम मदद कर दो — वही असली तालीम है।”
उनके मुताबिक, फर्स्ट एड एक इल्म नहीं, बल्कि एहसास है।
यह एहसास हर मज़हब, हर जात, हर तबक़े से ऊपर है।
ज़िंदगी की क़द्र करने का असल मतलब यही है कि हम किसी और की ज़िंदगी बचाने के क़ाबिल बनें।

वो कहते हैं,
“हर एक मोहल्ले में अगर एक ‘प्राथमिक चिकित्सक’ हो, तो अस्पतालों का बोझ भी कम होगा और इंसानियत की बुनियाद भी मज़बूत होगी।”

सिस्टम को बदलने की कोशिश

भारत जैसे विशाल देश में जहां हर एक लाख लोगों पर मुश्किल से एक डॉक्टर है, वहां यह सोच अपने आप में क्रांतिकारी है।
डॉ. आलम का कहना है —
“हर नागरिक को हेल्थ सोल्जर बनना होगा। सरकारों के भरोसे बैठने से कुछ नहीं होगा।”

उनका सुझाव है कि सरकारें स्कूलों में ‘फर्स्ट एड डिपार्टमेंट’ शुरू करें, और 1वीं से 12वीं तक फर्स्ट एड को अनिवार्य विषय बनाया जाए।
उनकी टीम ने कई राज्यों में इस विषय पर सेमिनार, ट्रेनिंग वर्कशॉप और पब्लिक डेमो आयोजित किए हैं।

सोशल इम्पैक्ट और रोजगार के अवसर

फर्स्ट एड सिर्फ सेवा नहीं, रोजगार का भी साधन बन सकता है।
भारत के कई अस्पतालों और नर्सिंग होम में ऐसे कर्मचारी हैं जो सालों से प्राथमिक उपचार का काम करते हैं, लेकिन उनके पास कोई आधिकारिक सर्टिफिकेट नहीं होता। इससे उन्हें प्रमोशन या इन्क्रीमेंट नहीं मिल पाता।
डॉ. आलम के कोर्स से अब वे एक प्रमाणित “फर्स्ट एडर” बन सकते हैं, जिससे उन्हें बेहतर नौकरी और इज़्ज़त दोनों मिलती है।

जिन इलाकों में डॉक्टरों की कमी है, वहां प्रशिक्षित व्यक्ति अपना छोटा फर्स्ट एड सेंटर भी खोल सकता है। यह न सिर्फ हेल्थ सर्विस को विकेंद्रीकृत करेगा, बल्कि बेरोज़गारी भी घटाएगा।

लोगों का बदलता नज़रिया

पहले भारत में हादसों के वक्त लोग कानूनी डर के कारण घायल व्यक्ति की मदद करने से कतराते थे।
डॉ. आलम ने इस डर को तोड़ने की ठानी। उन्होंने जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को बताया कि “गुड समैरिटन लॉ” के तहत मदद करने वाले व्यक्ति पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होती।
धीरे-धीरे लोग आगे आने लगे, और यही बदलाव की शुरुआत थी।

एक इंसान की कोशिश, एक देश की दिशा

आज ‘फर्स्ट एड काउंसिल ऑफ इंडिया’ न सिर्फ देश में बल्कि विदेशों में भी भारतीय मॉडल के तौर पर पहचानी जा रही है।
डॉ. आलम का विज़न है —
“हर गांव, हर शहर, हर गली में एक प्रशिक्षित फर्स्ट एडर हो — ताकि ज़िंदगी किसी छोटी सी लापरवाही की भेंट न चढ़े।”

उनका यह मिशन इस बात का सबूत है कि अगर नीयत साफ़ हो और मक़सद बड़ा हो, तो एक अकेला इंसान भी सिस्टम को बदल सकता है।

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शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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