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होर्मुज पर रुका ट्रंप का दांव, क्या टल जाएगी जंग?

None 2026-05-06 09:56:07
होर्मुज पर रुका ट्रंप का दांव, क्या टल जाएगी जंग?

ईरान-अमेरिका तनाव के बीच क्यों थमा होर्मुज ऑपरेशन

ट्रंप ने रोका “प्रोजेक्ट फ्रीडम”, अब क्या करेगा ईरान?

होर्मुज स्ट्रेट को लेकर अमेरिका और ईरान के दरमियान बढ़ा तनाव अब नए मोड़ पर पहुंच गया है। ट्रंप प्रशासन ने जहाज़ों को रास्ता दिलाने वाला सैन्य ऑपरेशन अचानक रोक दिया है। वॉशिंगटन इसे पीस टॉक्स की तरफ बढ़ता कदम बता रहा है, जबकि तेहरान की तरफ से अभी साफ सिग्नल नहीं आया। दुनिया की ऑयल सप्लाई, ग्लोबल मार्केट और मिडिल ईस्ट की सियासत पर इसका असर लगातार गहरा रहा है।

📍Washington 📰 May 6, 2026 ✍️ Asif Khan

होर्मुज पर ठहरा तनाव, लेकिन क्या सच में शांति करीब है?

मिडिल ईस्ट की सियासत एक बार फिर दुनिया की सबसे अहम समुद्री लाइन पर आकर अटक गई है। होर्मुज स्ट्रेट, जहां से दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल गुजरता है, अब सिर्फ एक समुद्री रास्ता नहीं बल्कि ग्लोबल पावर गेम का सेंटर बन चुका है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जिस “प्रोजेक्ट फ्रीडम” ऑपरेशन को कुछ दिन पहले बड़े आक्रामक अंदाज़ में शुरू किया था, उसे अचानक रोक देने का ऐलान किया है। व्हाइट हाउस का कहना है कि ईरान के साथ बातचीत में कुछ प्रोग्रेस हुई है और इसी वजह से यह सैन्य मिशन फिलहाल रोक दिया गया। लेकिन ज़मीन पर हालात अब भी बेहद नाज़ुक दिखाई दे रहे हैं।

होर्मुज आखिर इतना अहम क्यों है?

होर्मुज स्ट्रेट दुनिया की सबसे अहम ऑयल चोकपॉइंट्स में गिना जाता है। खाड़ी देशों से निकलने वाला बड़ा हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से एशिया और यूरोप तक पहुंचता है। अगर यहां तनाव बढ़ता है तो सिर्फ मिडिल ईस्ट नहीं, बल्कि भारत, चीन, जापान और यूरोप तक असर महसूस होता है।

इसी वजह से जब ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ा, तो कई कमर्शियल जहाज़ इस इलाके में फंस गए। रिपोर्ट्स के मुताबिक सैकड़ों जहाज़ और हजारों क्रू मेंबर्स लंबे समय तक अनिश्चितता में रहे।

ट्रंप का “प्रोजेक्ट फ्रीडम” क्या था?

अमेरिका ने दावा किया कि उसका मकसद फंसे हुए जहाज़ों को सुरक्षित रास्ता देना है। अमेरिकी नौसेना ने कुछ जहाज़ों को होर्मुज से निकालने की कोशिश भी की। लेकिन ईरान ने इसे अपने खिलाफ दबाव बनाने की कोशिश बताया।

वॉशिंगटन का कहना है कि ईरान ने ड्रोन, मिसाइल और छोटे सैन्य जहाज़ों के जरिए जवाबी कार्रवाई की। वहीं तेहरान कई अमेरिकी दावों को खारिज करता रहा है। यही वजह है कि दोनों देशों की बयानबाज़ी और वास्तविक हालात के बीच बड़ा फर्क दिखाई दे रहा है।

https://youtube.com/shorts/8pYVN5Zvf5s?feature=shared
https://shahtimesnews.com/shah-times-e-paper-6-may-2026-from-bengal-politics-to-hormuz-crisis/

क्या यह सिर्फ शिपिंग संकट है?

असल कहानी सिर्फ जहाज़ों की नहीं है। इसके पीछे न्यूक्लियर डील, रीजनल कंट्रोल और तेल राजनीति की बड़ी लड़ाई छिपी है।

ट्रंप प्रशासन लगातार यह कहता रहा है कि ईरान को न्यूक्लियर हथियार की तरफ बढ़ने से रोकना जरूरी है। दूसरी तरफ ईरान का आरोप है कि अमेरिका आर्थिक दबाव और सैन्य घेराबंदी के जरिए उसकी हुकूमत को कमजोर करना चाहता है।

यही वजह है कि हर बार जब बातचीत आगे बढ़ती दिखती है, उसी दौरान कोई नया सैन्य तनाव सामने आ जाता है।

क्या ट्रंप पीछे हट रहे हैं?

यह सवाल अब अमेरिकी राजनीति में भी उठ रहा है।

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप पूर्ण युद्ध से बचना चाहते हैं क्योंकि लंबी जंग का असर अमेरिकी इकॉनमी और चुनावी माहौल दोनों पर पड़ सकता है। दूसरी तरफ उनके समर्थकों का एक वर्ग मानता है कि ईरान पर दबाव बनाए रखना जरूरी है।

ट्रंप ने ऑपरेशन रोका जरूर है, लेकिन अमेरिकी ब्लॉकेड खत्म नहीं हुआ। इसका मतलब यह है कि सैन्य दबाव अब भी जारी है।

ईरान की स्थिति कितनी मजबूत है?

ईरान की स्थिति भी पूरी तरह आसान नहीं दिखती।

रिपोर्ट्स बताती हैं कि अमेरिकी प्रतिबंध और समुद्री दबाव की वजह से ईरानी तेल कारोबार पर असर पड़ा है। लेकिन दूसरी तरफ ईरान अब भी होर्मुज इलाके में अपनी सैन्य मौजूदगी और क्षेत्रीय नेटवर्क के जरिए दबाव बनाए हुए है।

यानी दोनों पक्ष खुली जंग से बचना भी चाहते हैं और पीछे हटना भी नहीं चाहते। यही इस पूरे संकट को और खतरनाक बनाता है।

भारत और दुनिया पर असर

भारत जैसे देशों के लिए यह संकट बेहद अहम है क्योंकि भारत बड़ी मात्रा में तेल आयात करता है। अगर होर्मुज में अस्थिरता बनी रहती है तो क्रूड ऑयल की कीमतें ऊपर जा सकती हैं। इसका असर पेट्रोल-डीज़ल से लेकर ट्रांसपोर्ट, महंगाई और शेयर मार्केट तक पहुंच सकता है।

दुनिया की शिपिंग कंपनियां भी फिलहाल पूरी तरह भरोसे में नहीं हैं। कई कंपनियां अब भी इस रूट को लेकर सावधानी बरत रही हैं।

क्या पीस डील संभव है?

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है।

अमेरिका दावा कर रहा है कि बातचीत आगे बढ़ रही है। पाकिस्तान समेत कुछ देशों की मध्यस्थता की भी चर्चा है। लेकिन ईरान की तरफ से कोई अंतिम सहमति सामने नहीं आई।

इसके अलावा ईरान के भीतर भी अलग-अलग ताकतों के बीच मतभेद की खबरें सामने आई हैं। इससे किसी अंतिम समझौते तक पहुंचना और मुश्किल हो सकता है।

आगे क्या?

फिलहाल हालात “नो वॉर, नो पीस” की स्थिति में दिखाई दे रहे हैं।

अगर बातचीत आगे बढ़ती है तो होर्मुज में तनाव कम हो सकता है। लेकिन अगर कोई नया हमला, मिसाइल स्ट्राइक या जहाज़ों पर कार्रवाई होती है, तो हालात दोबारा बड़े सैन्य टकराव में बदल सकते हैं।

मिडिल ईस्ट की राजनीति में अक्सर छोटी घटना भी बड़े युद्ध का ट्रिगर बन जाती है। इसलिए दुनिया की नज़र अब सिर्फ होर्मुज के पानी पर नहीं, बल्कि वॉशिंगटन और तेहरान के अगले कदम पर टिकी हुई है।

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शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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